
यवतमाल: आम नागरिकों के लिए सरकारी सुविधाओं का अभाव एक बड़ी समस्या हो सकता है, लेकिन अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील स्थिति में भी यदि लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़े, तो यह व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। घाटंजी तहसील के खापरी गांव में श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए पुल नहीं होने के कारण ग्रामीणों को शवों को कीचड़ भरे रास्ते से ले जाना पड़ रहा है।
नदी पार करने में उठाना पड़ता है जोखिम
खापरी गांव के पास बहने वाली नदी के दूसरी ओर श्मशान घाट और एक प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। ग्रामीणों के अनुसार, नदी में पानी कम या नहीं होने के बावजूद दूसरी तरफ जाने का रास्ता बेहद कीचड़युक्त हो जाता है। ऐसे में अंतिम यात्रा के दौरान लोगों को फिसलन भरे रास्ते से शव को लेकर गुजरना पड़ता है।
बारिश के मौसम में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। अत्यधिक कीचड़ और पानी के कारण इस रास्ते से गुजरना कई बार संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में ग्रामीणों को शव को अंतिम संस्कार के लिए करीब 3 से 4 किलोमीटर दूर घाटंजी शहर ले जाना पड़ता है।
वर्षों से पुल की मांग, समाधान का इंतजार
ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए पुल की आवश्यकता का मुद्दा कई वर्षों से उठाया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर राजनीतिक गुटबाजी और प्रशासनिक स्तर पर कथित उदासीनता के कारण यह समस्या अब तक बनी हुई है।
ग्रामीणों का आरोप है कि इस समस्या को लेकर समय-समय पर समाचार भी प्रकाशित हुए और जनप्रतिनिधियों तथा अधिकारियों के सामने मुद्दा रखा गया, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकला।
ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं कि यदि पुल बनाने के लिए प्रयास किए गए हैं, तो अब तक इसका निर्माण क्यों नहीं हो सका?
अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील जगह पर तुरंत समाधान की मांग
ग्रामीणों का कहना है कि विकास के अन्य कार्यों में देरी को किसी हद तक समझा जा सकता है, लेकिन श्मशान घाट तक सुरक्षित पहुंच का रास्ता एक बुनियादी और संवेदनशील आवश्यकता है। इसके लिए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को प्राथमिकता के आधार पर कदम उठाने चाहिए।
ग्रामीणों ने मांग की है कि खापरी गांव में श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए जल्द से जल्द पुल का निर्माण कराया जाए, ताकि बारिश के मौसम में अंतिम यात्रा के दौरान किसी को जान जोखिम में डालकर कीचड़ से होकर न गुजरना पड़े।
खापरी ही नहीं, बल्कि घाटंजी तहसील के अन्य क्षेत्रों में भी बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याएं होने का दावा ग्रामीणों की ओर से किया जा रहा है। अब देखना होगा कि प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस गंभीर समस्या को कितनी प्राथमिकता देते हैं और पुल निर्माण के लिए ठोस कदम कब उठाए जाते हैं।
रिपोर्ट: विनोद पत्रे, यवतमाल




