Published On : Mon, Oct 26th, 2026
By Nagpur Today Nagpur News

विदर्भ में पानी पर दोहरी नीति ? जनता की कटौती, उद्योगों को लबालब आपूर्ति पर उठे सवाल

- रक्षा, ऊर्जा और सीमेंट/स्टील सह खनिज सम्पदा के साफ सफाई जैसे बड़े प्रकल्पों के लिए विदर्भ सबसे मुफीद, भरपूर पानी और संतुलित पर्यावरण का हवाला, सूखे में सरकार का 'पानी बचाओ' अभियान, सवाल - क्या रक्षा-ऊर्जा जैसे जल-आधारित उद्योगों पर भी होगी कटौती या आम आदमी और खेत-खलिहान ही सहेंगे मार ?
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Double Standards on Water in Vidarbha? Public Faces Cuts While Industries Get Uninterrupted Supplyनागपुर: महाराष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र आज देश के औद्योगिक मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण हब के रूप में उभरा है। यहाँ रक्षा सामग्री निर्माण, ऊर्जा उत्पादन (ताप विद्युत), सीमेंट उत्पादन,स्टील सह खनिज सम्पदा के साफ सफाई जैसे बड़े-बड़े प्रकल्प वर्षों से सफलतापूर्वक स्थापित और संचालित हैं। वर्तमान और भविष्य में भी इन्हीं क्षेत्रों के नए प्रकल्पों को विदर्भ में लाने की मंशा सरकार और उद्योग जगत की है।

इसके पीछे दिया जाने वाला सबसे बड़ा तर्क है – विदर्भ में पानी भरपूर है और पर्यावरण संतुलित व उद्योग के अनुकूल है। रक्षा, ऊर्जा और सीमेंट, स्टील सह खनिज सम्पदा के साफ सफाई जैसे क्षेत्रों को उत्पादन के लिए अत्यधिक पानी की आवश्यकता होती है। इसीलिए इस प्रकार के जल-गहन (Water Intensive) उद्योग विदर्भ में स्थापित हैं और भविष्य में भी यहीं आने की कतार में हैं।

दूसरी तरफ जमीनी हकीकत – सूखे से हाहाकार

इन दावों के उलट इन दिनों महाराष्ट्र सहित पूरे देश में सूखा-अकाल जैसी स्थिति है। हर तरफ पानी के लिए हाय-तौबा मची है। जलाशयों का स्तर नीचे पहुंच गया है। सरकार और प्रशासन बार-बार ‘पानी बचाओ, पानी की कटौती’ का आह्वान कर रहा है। शहरों में जलापूर्ति एक दिन आड़े कर दी गई है, तो ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी के साथ-साथ खेत-खलिहान सूख रहे हैं। इस कटौती का सीधा असर आम जन-जीवन पर दिखना शुरू हो गया है।

ऐसे में सबसे बड़ा और ज्वलंत सवाल खड़ा होता है –

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क्या सरकार रक्षा और ऊर्जा,स्टील सह खनिज सम्पदा के साफ सफाई जैसे पानी पर आधारित प्रकल्पों के लिए भी ‘कम पानी उपयोग’ की नीति लागू करेगी ? क्या उनकी भी पानी कटौती होगी ?

यदि सरकार की नीति ‘सबके लिए एक नियम’ की है, तो जो उद्योग पूरी तरह पानी पर निर्भर हैं, उनका पानी कम होने पर निश्चित रूप से उत्पादन पर असर पड़ेगा। ताप विद्युत संयंत्रों को ठंडा रखने, सीमेंट प्लांट और आयुध निर्माणियों में हजारों लीटर पानी रोज लगता है। पानी घटा तो उत्पादन घटेगा, बिजली संकट गहराएगा।

और जो सैकड़ों नए प्रकल्प अभी केवल कागजों पर हैं – जैसे नए डिफेंस कॉरिडोर, सोलर और थर्मल पावर के विस्तार और नए सीमेंट क्लस्टर – वे कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे, क्योंकि निवेशक पानी की अनिश्चितता वाले क्षेत्र में पूंजी नहीं लगाएंगे।

नीति और नीयत की परीक्षा –

अब देखना यह है कि इस कठिन परिस्थिति में सरकार की नीति और नीयत की गुणवत्ता उसे किस मुकाम पर पहुंचाती है। क्या सरकार इस संकट में साहसिक और समान निर्णय लेकर सभी क्षेत्रों में पानी की कटौती का न्यायसंगत फॉर्मूला लागू करेगी ?

या फिर वह दोहरी नीति अपनाएगी – जहाँ एक तरफ जनता, किसान और खेत-खलिहान की पानी कटौती कर उन्हें त्याग के लिए कहा जाएगा, और दूसरी तरफ उद्योगों को निर्वाध, लबालब पानी देकर उत्पादन जारी रखने दिया जाएगा ?

विदर्भ के पानी का सच और सरकार की मंशा, दोनों की परीक्षा की घड़ी है। क्योंकि पानी पर ही तय होगा – विदर्भ का भविष्य उद्योगों का होगा या खेतों का, या दोनों के बीच संतुलन का ?

– राजीव रंजन कुशवाहा

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