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    Published On : Fri, Jan 24th, 2020

    शिक्षा के गिरते स्तर को समझना अत्यावश्यक – डॉ.प्रीतम गेडाम

    अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस विशेष

    नागपुर– शिक्षा मनुष्य के जीवन का ऐसा आधार है जो समाज के सभी क्षेत्रो मे सर्वोच्च पद पर अग्रसर होने के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। शिक्षा केवल पढ़ना और लिखना नहीं है, बल्कि अधिकारों, जिम्मेदारी, कर्तव्य भावना, कौशल विकास, सुजान नागरिक, समुदाय के विकास में भागीदारी की भावना पैदा करना है। गरीबी से बाहर निकलने और पुरुषों महिलाओं में समानता, सुरक्षा लाने के लिए शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान है। संयुक्त राष्ट्र महासभा 24 जनवरी से (2019 से शुरू) हर साल अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा दिवस मनाती है। आज के इस दिन विशेष पर शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और छात्रों की शिक्षा की रक्षा करने की उम्मीद है। इस वर्ष 2020 की थीम “शिक्षा यह लोगो के, पृथ्वी के, समृद्धि के, शांति के लिए सिखना जो सशक्त बना सकते है पृथ्वी की रक्षा कर सकते है साझा समृद्धि और शांति का निर्माण कर सकते है”। पेरिस समारोह में युवा नेताओ सहित दुनियाभर के शिक्षा नेताओ के साथ चर्चा होगी।

    शिक्षाव्यवस्था का व्यापार ना हो :- इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार किस कदर फैला हुआ है, नौकरी लगाने के नाम पर वित्तीय लेनदेन, सिफारीश होती है ऐसा हम अक्सर समाचार पत्रों या अन्य स्रोतों के माध्यम से देखते-सुनते हैं। कई विश्वविद्यालय और शैक्षणिक संस्थान की फिस सुनकर इतनी ज्यादा हैरानी होती है की ये व्यापार के रूप में काम कर रहे हैं ऐसा प्रतित होता है जबकी इनका कार्य समाज मे सभी वर्ग को समान शिक्षा का अवसर देना है और उन्नत व काबील कौशल्यपुर्ण नागरिक तयार करना है। क्या महंगी शिक्षा गुणवत्ता की गैरंटी हो गई है? क्या सिर्फ महंगे संस्थान से शिक्षा प्राप्त करके ही अच्छी नौकरी मिलती है या अच्छा व्यवसाय करने के काबील बन जाते है? गरीब तबके के लोगो ने फिर कौनसी शिक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए? आये दिन शिक्षण क्षेत्र मे व्याप्त खामियाँ, घोटालो की जानकारी उजागर होती रहती है। साथ ही शिक्षण क्षेत्र की भरती यह संपुर्ण रूप से केंद्रिय पद्धती द्वारा ही होनी चाहीए।

    शिक्षा बजट हो ज्यादाः– सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च की रिपोर्ट अनुसार वर्ष 2014-15 मे शिक्षा क्षेत्र पर बजट मे 70550 करोड रूपये का प्रावधान था जिसका जीडीपी 2.80 प्रतिशत था वर्ष 2015-16 मे जीडीपी 2.40 प्रतिशत रहा फिर वर्ष 2016-17 मे 2.60 प्रतिशत जीडीपी रहा उसके बाद मे वर्ष 2017-18 अंर्तगत जीडीपी का प्रतिशत 2.70 रहा, वर्ष 2018-19 मे जीडीपी 2.90 प्रतिशत रहा एंवम वर्ष 2019-20 के लिए 93848 करोड रूपये का प्रावधान किया गया लेकिन जीडीपी का केवल 2.70 प्रतिशत है। दुनियाभर मे शिक्षा पर सर्वाधिक खर्च अमेरिका जीडीपी के 7.30 प्रतिशत करता है इसके बाद दक्षिण अफ्रिका 6.9 प्रतिशत, ब्राजील 5.30 प्रतिशत, रूस 4.40 प्रतिशत, चीन 4.30 प्रतिशत और भारत 2.70 प्रतिशत जीडीपी है। जिस देश का शिक्षा बजट ज्यादा है वो देश तरक्की के मार्ग पर है, केवल सर्वश्रेष्ठ शिक्षाप्रणाली वाला देश ही विश्व गुरु होगा।

    शैक्षणिक मूल्यों में गिरावट:– शिक्षा प्रणाली में बढ़ती अनियमितताओं के कारण गुणवत्ता लगातार बिगड़ रही है साथ ही शैक्षिक मूल्यों में गिरावट के पिछे कई कारण भी हैं जैसे सुदृढ अर्थव्यवस्था की कमी, सख्त नियम और दूरदर्शिता की कमी, उच्च शिक्षित कर्मचारियों की कमी, शिक्षा में नई तकनीकों के उपयोग की कमी, निजी शिक्षण संस्थानों द्वारा शासकिय नियमों की अवहेलना, शिक्षा में बढ़ता भ्रष्टाचार, छात्रों से मनमानी फीस वसुली, शिक्षा संस्थानों का बाजारीकरण, निजी कोचिंग कक्षाओं की बाढ़ एंवम अन्य। हमारे पास अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रणाली का अभाव है, जिससे हमारे देश के छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाते हैं। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने एक भाषण में कहा था कि देश से हर साल लाखों छात्र यूएसए और यूके के साथ ही अन्य दूसरे देशो मे अध्ययन करने के लिए जाते हैं और यह हर साल बढ़ ही रहा है। हमें देश में ही उच्चशिक्षा हेतु छात्रों के लिए विश्वस्तर के गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने में सक्षम होने की आवश्यकता है।

    शिक्षा केंद्र कंपनी की भांती उत्पादन केंद्र न बन जायेः- हमारा देश विश्व स्तर पर सर्वोच्च शैक्षणिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों वाला देश है अर्थात अमेरिका, चीन के बाद तीसरा सबसे बड़ा शिक्षासंस्थान वाला देश भारत है। हमारे देश से हर साल 50 लाख से अधिक छात्र पदवीधर होते है और यह विश्व मे सबसे बडी संख्या हैं। अकेले नागपुर विद्यापीठ से इस वर्ष 18 जनवरी 2020 के दीक्षांत समारोह मे कुल 64,993 पदवी और 746 छात्रो को पिएचडी की पदवी बांटी गई। छात्र यहा बडी-बड़ी डिग्री लेते है, लेकिन विडंबना यह है कि इतनी पढाई के बाद भी इसका क्या महत्व? क्योंकि यहा बड़े पैमाने पर बेरोजगारी हैं। इस देश में केवल नाम की शिक्षा देकर कोई मतलब नही है, बल्कि सरकार की जिम्मेदारी लोगों को कुशल बनाना है, विद्यार्थी का सर्वांगीन विकास करना है, इसमें रोजगार और स्वरोजगार के नए अवसरों और कौशल विकास पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए, जिसमे अच्छे प्रशिक्षण केंद्रों और अनुसंधान केंद्रों की प्रत्येक शहर और तहसिल मे आवश्यकता है। प्रत्येक तहसिल मे केंद्रिय विद्यालय व नवोदय विद्यालय की आवश्यकता हैं। स्कुली शिक्षा से ही छात्रो को औद्योगीक शिक्षा की जानकारी देनी चाहीए। शिक्षाप्रणाली को सक्त व कडे नियमो की जरूरत है। शिक्षाप्रणाली ऐसी सुदृढ हो जिसमे लिपापोती, सिफारीश या भ्रष्टाचार जैसी समस्या के लिए कोई जगह न हो।

    शिक्षा क्षेत्र मे बढता बेरोजगारी का विकराल रूप :- वर्तमान मे समाज का बहुत बडा तबका उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए आगे बढ रहा है लेकिन इस क्षेत्र की एक और कटु सत्यता है वो बेरोगारी का विकराल स्वरूप। बि.एड, एम.एड, एम. फिल., पिएचडी नेट/स्लेट जैसी उच्च शिक्षा हासील करने के बाद 20-25 वर्ष दर-दर भटकने के बाद भी नौकरी का कुछ भी ठिकाना नही मिलता। कई ऐसी शिक्षा संस्थाये है, जहा पर शिक्षको को दिहाडी मजदूर से भी बहुत कम वेतन पर कार्य करना पडता है एंवम कई-कई जगह तो सालो-साल वेतन बकाया रखा जाता है ऐसी स्थिती मे शिक्षक कैसे जिये? कैसे परिवार का भरन-पोषण करे? समाज मे हजारो ऐसे उदाहरण देखने को मिल जायेंगे जिनका पुरा जिवन शिक्षा क्षेत्र मे एक साधारण नौकरी मिलने के ख्वाहिश मे बर्बाद हो गया मतलब आधा जिवन उच्च शिक्षा पाने मे और आधा जिवन उचित नौकरी पाने मे गया।

    इस समस्या मे भी गरीब वर्ग सबसे ज्यादा ग्रसीत है क्योकि पैसा और समय शिक्षा मे लगाने के बाद कुछ दूसरा पर्याय नही रहता। सहायक प्राध्यापक पद हेतु नेट/स्लेट, सेट जैसी स्पर्धात्मक परीक्षाओ को बडे पैमाने पर परिणाम घोषित होता है लेकीन परिक्षा उत्तीर्ण विद्यार्थीयो को इतने बडे पैमाने पर शिक्षा विभाग मे भरती नही होती है जिससे बेरोजगारी का दायरा लगातार बढ रहा है अगर उच्च शिक्षीत वर्ग का ऐसा हाल होगा तो देश की उच्च शिक्षा का उद्देश्य सही मायने मे सफल हो पायेगा? यह समस्या भ्रष्टाचार, सिफारीश जैसी दूसरी समस्या को जन्म देती है ग्रामिण क्षेत्र की परिस्थिती तो और भी ज्यादा खराब है। शिक्षा विभाग की ऐसी गंभीर समस्या पर त्वरित ठोस कदम उठाना अत्यावश्यक है। शिक्षा क्षेत्र की सभी नियुक्तीयाँ स्पर्धात्मक परीक्षाओ से सरकार द्वारा भरती होनी चाहीए। शिक्षा क्षेत्र मे सक्त नियम कानून की जरूरत है। सेंटर फाॅर माॅनिटरिंग इंडियन इकोनाॅमी की सर्वे रिपोर्ट ने दर्शाया है की मई-अगस्त 2017 के बाद लगातार सातवी बार बेरोजगारी बढी है, मई-अगस्त मे बेरोजगारी की दर 3.8 फिसदी थी और आज यह दर बढकर 7.5 फिसदी पद पहुचं गई है अर्थात 60 प्रतिशत पढे-लिखे बेरोजगार है। शहर मे बेरोजगारी की दर 9 फिसदी पर पहुंच गई है। रिपोर्ट मे बताया गया है की शहरो मे खासकर उच्च शिक्षीत युवाओ मे बेरोजगारी की दर बहुत ही ज्यादा है।

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