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    Published On : Thu, Sep 6th, 2018

    आयुक्त पर बवाल तो महापौर पर मौन!

    नागपुर: नागपुर महानगर पालिका में इन दिनों आयुक्त वीरेंद्र सिंह के छुट्टी पर जाने को लेकर सत्ता पक्ष ने बवाल मचा रखा है। मनपा में सत्ता पक्ष के नेता संदीप जोशी के हमले के बाद अब मनपा की स्थायी समिति ने आयुक्त से इस बात के लिए स्पष्टीकरण मांगा है कि वे समिति से अनुमति लिए बिना इतनी लंबी छुट्टी पर कैसे चले गए।

    अब गौर करने वाली बात ये है कि जहां आज सत्तापक्ष भाजपा के नेता आयुक्त के छुट्टी पर जाने के मुद्दे पर राई का पहाड़ बना रहे हैं, वहीं सत्तापक्ष की महापौर के बार-बार दौरे पर जाने को लेकर किसी के कानों में जूं तक नहीं रेंगी थी। गौरतलब है कि मनपा आयुक्त वीरेंद्र सिंह की माताजी का स्वास्थ्य अचानक गंभीर हो जाने से वे राजस्थान में अपने गृह नगर गए हैं।

    बेरोकटोक देश-विदेश घूम आईं महापौर

    याद रहे कि मनपा में तीसरी बार भाजपा की सत्ता आई.इस कार्यकाल में सत्तापक्ष से बनी महापौर लगभग दर्जन दफे शहर के बाहर ( अन्य राज्य सह विदेश ) गई.किसी भी बाहरी दौरे के पूर्व उन्होंने उपमहापौर को महापौर का प्रभार खुद नहीं सौंपा। महापौर के जाने के बाद उनके सहायक ही उपमहापौर को टेलीफोनिक सूचना देकर मामला निपटाते रहे. महापौर के बाहरी दौरे का कारण भी उपमहापौर को बताना मुनासिब नहीं समझा जाता रहा. महापौर के उक्त दौरे से मनपा(शहर) को क्या फायदा हुआ, यह आज भी चिंतन का विषय हैं.

    कौन-सा लक्ष्य साध रहा है सत्ता पक्ष?

    दूसरी ओर वर्त्तमान आयुक्त की माँ की अचानक तबियत नासाज होने के कारण वे अचानक कुछ दिनों पूर्व राजस्थान गए थे.संभवतः वे संबंधितों को टेलीफोनिक सूचना दे गए थे.लगभग ८ दिनों बाद लौटे थे कि ३ दिन पूर्व उन्हें माँ की तबियत ज्यादा ख़राब होने की सूचना मिली,क्यूंकि उन्हें बड़ी छुट्टी चाहिए थी इसलिए उन्होंने मुंबई स्थित शहरी विकास मंत्रालय से २१ सितम्बर तक की छुट्टी मंजूर करवा कर एवं मनपा में संबंधितों को टेलीफोनिक जानकारी देकर रवाना हो गए.

    ५ सितम्बर को आमसभा होनी थी,एक दिन पूर्व ४ सितम्बर की शाम सत्तापक्ष नेता खुद विपक्ष नेता के कक्ष में आये और उनके विशेष कक्ष में गुप्त मंत्रणा की. समझा जाता है कि सत्तापक्ष मनपायुक्त पर सीधा हमला करने के बजाय विपक्ष नेता के लेटरबम का इस्तेमाल कर आयुक्त पर संयुक्त हमला किया।जाते-जाते सत्तापक्ष नेता ने मीडिया के सवालों पर यह कह गए कि २४ सितम्बर की सभा में आयुक्त अनुपस्थित रहे तो मनपा से छुट्टी कर दी जाएगी।

    आयुक्त ने शुरू किया ‘मद’

    सत्तापक्ष की रणनीत के हिसाब से आयुक्त पर किया गया वॉर सटीक लगा,और आयुक्त ने लेखा व वित्त अधिकारी के मार्फ़त बंद किये गए आज के हिसाब से अति जरुरी ‘मद’ को शुरू करने का आदेश ४ सितम्बर की शाम दिया।इस आदेश के सार्वजानिक होते ही विपक्ष सह पक्ष उत्साहित दिखे।

    पहला सवाल यह हैं कि सत्तापक्ष ने कभी महापौर पर उनके कारनामों के लिए उंगलियां नहीं उठाई,जबकि उन्हीं के पक्ष की महापौर हैं.क्यूंकि सत्तापक्ष में बिखराव हैं.महापौर सह सत्तापक्ष के वरिष्ठ नगरसेवक और पूर्व पदाधिकारियों में आपस में शिष्टाचार के साथ तनातनी गहरी हैं.किसी भी विशेष अवसर ( बैठक या सभा आदि ) पर सत्तापक्ष की प्रमुख नेताओं की बैठक नहीं होती हैं,क्यूंकि महापौर उन्हें तवज्जों नहीं देती।

    यहाँ तक की महापौर निधि या महापौर से सिफारिश पूर्व,वरिष्ठ नगरसेवक से सलाह ली जाती हैं. दूसरा सवाल ये है कि मनपायुक्त से पिछले दिनों समझौता होने के बाद सत्तापक्ष नेता ने ४ सितम्बर को विपक्ष नेता के कंधों का सहारा लेकर उन पर हमला क्यों बोला ? क्या सत्तापक्ष के किसी दिग्गज की प्रमुख फाइल आयुक्त के हस्ताक्षर के लिए अटकी पड़ी हैं.

    राजनैतिक दबाव में विकास कार्य को मिली गति

    तीसरा सवाल यह है कि आयुक्त ने मनपा के बजट पर आखिर मंजूरी बाद अधिकांश ‘मदो’ पर रोक क्यों लगाई। वजह साफ़ हैं कि पिछले लेखा व वित्त अधिकारी पर सत्तापक्ष सह विपक्ष के दिग्गज नगरसेवक,पदाधिकारी अपने अपने परिचित ठेकेदारों के भुगतानों के लिए दबाव बनाया जाता था और तात्कालीन उक्त अधिकारी खुद के कमीशन के चक्कर में मनपा खजाने में जमा ‘विशेष मद’ की निधि खर्च करते रहे.जबकि उनके द्वारा किया गया कारनामा गैरकानूनी था.

    इस ग़ैरकृत से मनपा पर होने वाली कार्रवाई से बचाने के लिए पिछले आयुक्त से लेकर वर्त्तमान आयुक्त ने वर्त्तमान मुख्य वित्त व लेखाधिकारी को सख्त निर्देश दिए गए.साथ ही मनपा को राज्य व केंद्र सरकार से मिलने वाला अनुदान नियमित न होने के साथ अल्प होने के कारण मनपा की आर्थिक स्थिति चरमरा गई.मनपा की आर्थिक स्थिति को दयनीय बनाने में सफेदपोशों की भूमिका उल्लेखनीय हैं.

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