Published On : Thu, Sep 20th, 2018

याचिका : ऑटोरिक्शा भी हों जीपीएस और आरएफआईडी लैस

Nagpur Bench of Bombay High Court

नागपुर: आटोरिक्शा के माध्यम से यात्रियों की होनेवाली लूट और सुरक्षा की दृष्टि से आटोरिक्शा में भी जीपीएस और रेडियो फ्रिक्वेंसी आइडेन्टीफिकेशन (आरएफआईडी) प्रणाली लागू करने के आदेश विभाग को देने का अनुरोध करते हुए परमजीत सिंह कलसी की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई. याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश भूषण धर्माधिकारी और न्यायाधीश मुरलीधर गिरटकर ने ओला और उबेर की तर्ज पर अन्य आटोरिक्शा में भी जीपीएस सिस्टम लागू करने के लिए 6 माह के भीतर प्रक्रिया पूरी करने के आदेश परिवहन विभाग को दिए. याचिकाकर्ता की ओर से अधि. हर्नेष गढिया और सरकार की ओर से सहायक सरकारी वकील एन.पी. मेहता ने पैरवी की.

मुंबई में हो रहा क्रियान्वयन
याचिकाकर्ता ने याचिका में बताया कि आटोरिक्शा से यात्रा करनेवाले लोगों को सुरक्षा प्रदान करने हेतु मुंबई में आटोरिक्शा में जीपीएस प्रणाली लगाई जानी है. जिसमें एक पैनिक बटन होगा. किसी भी तरह की अनहोनी घटना होने की संभावना से बटन दबाए जाते ही प्रशासन को इस खतरे की सूचना मिल जाएगी.

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इस संदर्भ में निर्णय होने की जानकारी देते हुए याचिकाकर्ता ने इसी तर्ज पर उपराजधानी में भी आटोरिक्शा में जीपीएस के साथ ही आरएफआईडी प्रणाली लागू करने के आदेश देने का अनुरोध किया था. अदालत के आदेशों के अनुसार परिवहन विभाग की ओर से दायर किए गए हलफनामा में बताया गया कि ट्राफिक के नियमों का उल्लंघन करनेवालों पर नजर रखने के उद्देश्य से ‘वाहन 4.0’ नामक साफ्टवेयर का क्रियान्वयन मुंबई आरटीओ द्वारा किया जा रहा है.

शहरी और ग्रामीण आटोरिक्शा के लिए कलर कोड
याचिकाकर्ता का मानना था कि कुछ आटोरिक्शा को केवल ग्रामीण में चलाने की अनुमति है. लेकिन शहर के आसपास से धड़ल्ले से आटोरिक्शा शहर में पहुंचते हैं. जबकि इनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होती है. चूंकि इन आटोरिक्शा की पहचान नहीं हो पाती, अत: गैरकानूनी ढंग से आटोरिक्शा शहर में संचालित हो रहे हैं.

इस संदर्भ में परिवहन विभाग का मानना था कि शहर और ग्रामीण क्षेत्र के आटोरिक्शा की पहचान के लिए छत पर कलर कोड लागू किया जा सकता है. जिसमें शहर के आटोरिक्शा की छत का कलर अलग और ग्रामीण के आटोरिक्शा का अलग होगा. इस संदर्भ में नियमों में सुधार की पहल भी शुरू की जा चूकी है. दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद अदालत का मानना था कि प्रतिवादियों को नोटिस जारी करने के बाद डेढ़ वर्ष का समय बीत गया है. जिससे अब उक्त मसलों का हल 31 मार्च 2019 तक करने के आदेश भी जारी किए.

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