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    Published On : Wed, Aug 1st, 2018

    सरकार के लिए गले की हड्डी बना मराठा आरक्षण और धार्मिक स्थल बचाओ आंदोलन

    नागपुर: सरकार में शामिल दल काफी दशक तक विपक्ष में रहा. आंदोलन दर आंदोलन करता रहा. आज सत्ता में आकर भी वह उसी भूमिका में नज़र आ रहा है. इसे जनता हजम नहीं कर पा रही है. राज्य भर में हो रहे मराठा आरक्षण आंदोलन ने सरकार के पसीने छुड़ा दिए. वहीं दूसरी ओर नागपुर में मनपा में इसी दल की सत्ता है. जिन्हें धार्मिक स्थल बचाव आंदोलन छेड़ने की नौबत आन पड़ी. उक्त दोनों मामले में भाजपा को न उगलते बन रहा और न ही निगलते बन रहा है.

    मराठा आरक्षण :- याद रहे कि राज्य का एक तबका,जिसमें मुख्यमंत्री विरोधी भी शामिल है, ने बीते साल भी मराठा आरक्षण आंदोलन रचकर सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी थीं. तब शांति से पश्चिम महाराष्ट्र व मराठवाड़ा में मूक आंदोलन हुए. सरकार को संभालने में तब उतनी दिक्कत नहीं आई. इससे संभाले ही नहीं थे कि राज्य भर के किसानों का कर्ज माफ़ी और किसान आत्महत्या की जिम्मेदारी लाद सरकार को अड़चन में लाया गया और अब लोकसभा व विधानसभा चुनाव समीप आता देख पिछले माह से मराठा, धनगर, लिंगायत, मुस्लिम समाज के आरक्षण के नाम पर आंदोलनों को हवा दी गई. मानसून अधिवेशन के दौरान मराठा आंदोलन को न्याय नहीं मिलने से अधिवेशन ख़त्म होने के बाद खासकर मराठा आंदोलन काफी उग्र हो गया.

    आंदोलन में तीव्रता के साथ ही साथ आंदोलनकारियों में से कुछ जानें चली गईं. तीव्रता में तब इजाफा आया जब सर्वपक्षीय विधायकों ने इस्तीफा देने का क्रम शुरू किया. सरकार को प्रत्येक सिरे से बदनाम करने का सिलसिला जारी है. लेकिन एक भी दिग्गज मराठा जनप्रतिनिधि फिर चाहे लोकसभा हो या फिर विधानसभा सदस्य, उन्होंने आंदोलन को मजबूती देने के लिए इस्तीफा नहीं दिया अर्थात दाल में काला है.

    दूसरी ओर सरकार को मराठा सह अन्य आरक्षण के सम्बन्ध में चर्चा सह सरकार का पक्ष रखने और भविष्य में किए जाने वाले नियोजन हेतु विधानसभा का विशेष अधिवेशन बुलाने हेतु सोचने पर मजबूर कर दिया. दरअसल सरकार के बस में कुछ भी नहीं. न्यायालय के निर्देशों को पूर्ण करने के बाद ही सरकार मराठा सह अन्य समाज को आरक्षण देने की घोषणा ताल ठोक कर सकती है.

    धार्मिक स्थल बचाव :- नागपुर स्थित उच्च न्यायालय की नागपुर खंडपीठ के निर्देश पर विगत कुछ सप्ताह से मनपा व नासुप्र ने शहर भर के अनाधिकृत धार्मिक स्थलों को ढहाने का क्रम शुरू किया. वर्ष २०१४ में मनपा ने ही न्यायालय में अनाधिकृत धार्मिक स्थल की १३०० से अधिक की सूची बनाकर पेश किया था. उसी सूची के आधार पर न्यायालय ने अवैध धार्मिक स्थल तोड़ने का निर्देश दिया था.तब से अब तक मनपा में भाजपा की सत्ता है.

    न्यायालय के आदेश के बाद करीब १८० से अधिक धार्मिक स्थल तोड़े गए, जिनका विरोध नागरिकों समेत सामाजिक कार्यकर्ताओं सह संगठनों ने किया. तब तक भाजपा के शहर के तथाकथित बड़े नेता चुप्पी साधे बैठे रहे. जैसे ही उनके क्षेत्र के तरफ मनपा-नासुप्र दल ने रुख किया सभी को एकत्र कर दस्ते का न सिर्फ विरोध किया और लौटने पर मजबूर किया बल्कि न्यायालय के निर्देशों की अवमानना भी की. इसके बाद जोश-जोश में उक्त मामले को लेकर मनपा की ३ अगस्त को विशेष सभा बुलाने की घोषणा कर दी. लेकिन आज समाचार लिखे जाने तक मनपा आयुक्त ने महापौर कार्यालय से आये इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किया. विशेष सभा के लिए ७२ घंटे पूर्व सदस्यों को कार्यालय मार्फ़त सूचना दिया जाना अनिवार्य है.

    अर्थात सत्तापक्ष ने जनता और श्रद्धलुओं को गुमराह किया. यह भी कड़वा सत्य है कि महापौर और सत्तापक्ष की मांग पर आयुक्त का हस्ताक्षर भी न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आएंगे. इसलिए मनपा आयुक्त ने मांग को नाकार दिया.

    इसके पूर्व न्यायालय के आदेश के बाद कुछ बजरंग दल के कार्यकर्ता सम्बंधित न्यायाधीश के निवास के निकट पहुंच आरती करने जैसा आंदोलन करने की योजना बना ही रहे थे कि उनके संपर्क में आए पुलिस ने इसके बाद की क़ानूनी कार्रवाई का विवरण बताकर उन्हें लौटा दिया. बाद में कुछ श्रद्धालुओं संग नगरसेवक वर्ग भाजपा के एक दिग्गज के घर कार्रवाई रोकने की मांग की गई तो उन्होंने मुंबई में किसी जनप्रतिनिधि को संपर्क कर कहा कि .. इसे मुंबई ले जाओ.

    उल्लेखनीय यह है कि मनपा से लेकर केंद्र तक एक ही पक्ष की सरकार है. उक्त कार्रवाई को रुकवाना ही है तो सरकार एक अध्यादेश जारी कर सकती है. लेकिन इस ओर पहल न करना अंदरूनी राजनीत का हिस्सा तो नहीं?


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