
नागपुर: नागपुर शहर के बीचोंबीच स्थित ऐतिहासिक सीताबर्डी किला एक बार फिर आम नागरिकों के लिए खुलने जा रहा है। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर 15 अगस्त 2026 को भारतीय सेना की ओर से नागरिकों को किले के भीतर प्रवेश दिया जाएगा। आम लोग सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक इस ऐतिहासिक धरोहर का भ्रमण कर सकेंगे। किले में प्रवेश नागपुर रेलवे स्टेशन के पास स्थित एआरओ गेट से दिया जाएगा। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए आगंतुकों के लिए आधार कार्ड अथवा अन्य वैध पहचान पत्र साथ रखना जरूरी होगा।
शहर के बीचोंबीच ऊंची पहाड़ी पर स्थित सीताबर्डी किला केवल पत्थरों और दीवारों से बनी सैन्य संरचना नहीं है, बल्कि यह नागपुर के इतिहास के उस दौर का जीवंत साक्षी है, जब मराठा सत्ता और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष निर्णायक दौर में पहुंच चुका था। यही वह स्थान है, जहां 1817 में हुआ सीताबर्डी युद्ध नागपुर के राजनीतिक इतिहास में बड़ा मोड़ साबित हुआ। नागपुर जिला प्रशासन के अनुसार इस युद्ध में भोंसले शासक मुधोजी द्वितीय भोंसले (अप्पासाहेब) को ब्रिटिश सेना से पराजय मिली और इसके बाद नागपुर पर ब्रिटिश प्रभाव तेजी से बढ़ा।
दो पहाड़ियों पर बसा है किला
सीताबर्डी किला नागपुर के मध्य क्षेत्र में स्थित दो प्रमुख पहाड़ी टीलों पर बना है। इसी भौगोलिक स्थिति के कारण यह स्थान सैन्य दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता था। ऊंचाई पर होने के कारण यहां से आसपास के क्षेत्र पर नजर रखना आसान था।
आज किले के चारों ओर नागपुर का आधुनिक और व्यस्त शहर दिखाई देता है। एक ओर रेलवे स्टेशन और शहर का व्यावसायिक क्षेत्र है, तो दूसरी ओर टेकड़ी गणपति मंदिर सहित नागपुर के कई प्रमुख हिस्से दिखाई देते हैं। किले की ऊंचाई से शहर का विस्तृत दृश्य भी आकर्षण का केंद्र रहता है।
1817 का सीताबर्डी युद्ध क्यों हुआ?
19वीं सदी के शुरुआती वर्षों में नागपुर पर भोंसले राजवंश का शासन था। उस समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी मध्य भारत और दक्कन में अपना प्रभाव लगातार बढ़ा रही थी। मराठा शक्तियों और ब्रिटिशों के बीच तनाव भी बढ़ रहा था।
नागपुर के भोंसले शासक मुधोजी द्वितीय, जिन्हें अप्पासाहेब के नाम से भी जाना जाता है, ने 1817 में ब्रिटिशों के खिलाफ संघर्ष का रास्ता अपनाया। यह संघर्ष तीसरे आंग्ल-मराठा युद्ध का हिस्सा बना। सीताबर्डी की पहाड़ियों का रणनीतिक महत्व होने के कारण यहां दोनों पक्षों के बीच भीषण संघर्ष हुआ।
ब्रिटिश सेना ने सीताबर्डी की स्थिति का सैन्य लाभ उठाया और अंततः भोंसले सेना को पराजित किया। नागपुर जिला प्रशासन इस लड़ाई को भोंसले सत्ता के पतन और नागपुर में ब्रिटिश प्रभाव के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण मोड़ मानता है।
युद्ध के बाद बदली नागपुर की तस्वीर
सीताबर्डी की लड़ाई के बाद नागपुर की राजनीति पर ब्रिटिश प्रभाव मजबूत होता गया। भोंसले शासन कमजोर हुआ और ब्रिटिश रेजिडेंट का प्रभाव बढ़ा। आगे चलकर 1853 में रघुजी तृतीय की मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण ब्रिटिशों ने नागपुर पर सीधे नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद नागपुर ब्रिटिश प्रशासन के अधीन चला गया।
यानी सीताबर्डी की पहाड़ी पर हुआ संघर्ष केवल एक स्थानीय युद्ध नहीं था। इसका असर पूरे नागपुर राज्य की राजनीतिक दिशा पर पड़ा।
किले के निर्माण को लेकर इतिहास में मतभेद
सीताबर्डी किले के निर्माण को लेकर इतिहास में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। नागपुर जिला प्रशासन के आधिकारिक इतिहास पृष्ठ पर किले को 1817 के युद्ध से जोड़ते हुए इसे अप्पासाहेब भोंसले से संबंधित बताया गया है। दूसरी ओर भारत सरकार के Incredible India पर्यटन पोर्टल पर उपलब्ध विवरण में कहा गया है कि किले का वर्तमान स्वरूप 1822 के आसपास ब्रिटिश शासन के दौरान विकसित किया गया था और इसके निर्माण में कातोल क्षेत्र के काले पत्थर का इस्तेमाल किया गया था।
इसलिए किले के इतिहास को समझते समय यह अंतर ध्यान में रखना जरूरी है कि 1817 का सीताबर्डी युद्ध निर्विवाद रूप से इस स्थान की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है, जबकि वर्तमान किले के निर्माण और उसके विभिन्न चरणों को लेकर स्रोतों में मतभेद हैं।
ब्रिटिश सैनिकों की कब्रें भी मौजूद
किले के परिसर में ब्रिटिश सैनिकों की कब्रें भी बताई जाती हैं, जो 1817 के संघर्ष और उसके बाद के सैन्य इतिहास की याद दिलाती हैं। किले का इस्तेमाल लंबे समय तक सैन्य महत्व वाले परिसर के रूप में होता रहा। आज भी यह स्थान रक्षा प्रतिष्ठान से जुड़ा हुआ है।
गांधीजी से जुड़ी कहानी भी, लेकिन इतिहास में विवाद
सीताबर्डी किले को महात्मा गांधी से जोड़कर भी कई वर्षों से एक कहानी कही जाती रही है कि गांधीजी को यहां कैद रखा गया था। हालांकि भारत सरकार के Incredible India पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी इस दावे को सही नहीं मानती और बताती है कि गांधीजी के सीताबर्डी किले में बंद रहने की बात ऐतिहासिक रिकॉर्ड से पुष्ट नहीं होती।
इस तरह किला केवल युद्ध की कहानियों का केंद्र नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी कई ऐतिहासिक मान्यताएं और किंवदंतियां भी नागपुर की लोकस्मृति का हिस्सा बन चुकी हैं।
आज सेना की निगरानी में ऐतिहासिक धरोहर
सीताबर्डी किला लंबे समय से सैन्य परिसर के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। सरकारी पर्यटन जानकारी के अनुसार यहां भारतीय सेना की टेरिटोरियल आर्मी से जुड़ी सैन्य उपस्थिति रही है। सुरक्षा कारणों से आम दिनों में किले में प्रवेश सीमित रहता है।
यही वजह है कि आम नागरिकों के लिए किले का खुलना हमेशा विशेष आकर्षण का विषय रहता है। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसरों पर लोगों को इस ऐतिहासिक सैन्य धरोहर को करीब से देखने का अवसर मिलता है। नागपुर जिला प्रशासन भी किले के बारे में यही जानकारी देता है कि यह आम जनता के लिए विशेष राष्ट्रीय अवसरों पर खोला जाता है।
15 अगस्त को क्या देख सकेंगे नागरिक?
स्वतंत्रता दिवस पर किले में आने वाले नागरिकों को ऐतिहासिक परिसर, पुराने सैन्य ढांचे और युद्ध से जुड़ी स्मृतियों को करीब से देखने का अवसर मिलेगा। पहाड़ी पर स्थित होने के कारण यहां से नागपुर शहर का विहंगम दृश्य भी दिखाई देता है।
किले की दीवारें और सैन्य संरचना आज भी उस दौर की याद दिलाती हैं, जब आधुनिक नागपुर का स्वरूप विकसित नहीं हुआ था और यही पहाड़ियां शहर की रणनीतिक सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
108 फीट ऊंचा तिरंगा बना नया आकर्षण
सीताबर्डी किले की ऐतिहासिक पहचान को हाल के दिनों में एक और राष्ट्रीय प्रतीक मिला है। जून 2026 में किले के ऊपर 108 फीट ऊंचा राष्ट्रीय ध्वज स्थापित किया गया। यह पहल मुख्यालय उत्तर महाराष्ट्र एवं गुजरात सब एरिया और फ्लैग फाउंडेशन ऑफ इंडिया की संयुक्त पहल के रूप में की गई। इससे किले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक भी जुड़ गया है।
नागपुर के इतिहास को करीब से जानने का मौका
सीताबर्डी किले का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यहां 1817 में युद्ध हुआ था। यह स्थान नागपुर के भोंसले शासन से ब्रिटिश शासन की ओर हुए सत्ता परिवर्तन का प्रत्यक्ष साक्षी है। इसी कारण इतिहास, सैन्य विरासत और नागपुर की पहचान को समझने के लिए सीताबर्डी किला बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
15 अगस्त को जब तिरंगे की छाया में नागरिक इस किले में प्रवेश करेंगे, तो उनके सामने नागपुर के इतिहास का वह अध्याय भी होगा, जिसमें मराठा सत्ता, ब्रिटिश विस्तार, युद्ध और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों की पूरी कहानी छिपी है।
15 अगस्त 2026 को प्रवेश की प्रमुख जानकारी
– अवसर: स्वतंत्रता दिवस
– दिन: शनिवार, 15 अगस्त 2026
– समय: सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक
– प्रवेश: आम नागरिकों के लिए
– प्रवेश द्वार: रेलवे स्टेशन के पास स्थित एआरओ गेट
– जरूरी दस्तावेज: आधार कार्ड अथवा वैध पहचान पत्र
– मुख्य आकर्षण: ऐतिहासिक किला, सैन्य विरासत, 1817 के युद्ध से जुड़ा परिसर और नागपुर शहर का विहंगम दृश्य
– महत्व: 1817 के सीताबर्डी युद्ध का ऐतिहासिक स्थल
एक किला, जिसने नागपुर का इतिहास बदल दिया
सीताबर्डी की पहाड़ी आज भले ही आधुनिक नागपुर के बीचोंबीच खड़ी नजर आती हो, लेकिन करीब दो शताब्दी पहले यही स्थान सत्ता संघर्ष का रणक्षेत्र था। 1817 की लड़ाई ने नागपुर की राजनीतिक दिशा बदल दी और आने वाले दशकों में ब्रिटिश सत्ता के विस्तार का रास्ता तैयार किया। यही कारण है कि सीताबर्डी किला नागपुर के लिए केवल एक पुराना सैन्य परिसर नहीं, बल्कि शहर के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जिसे हर पीढ़ी को जानना चाहिए।
– रविकांत कांबले




