विदर्भ में पड़ रही भीषण गर्मी अब जानलेवा होती दिखाई दे रही है। नागपुर में पिछले कुछ दिनों के भीतर बड़ी संख्या में अज्ञात लोगों के शव मिलने से उष्माघात (Heatstroke) को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। कई रिपोर्ट्स में आशंका जताई गई है कि तेज गर्मी और लू की वजह से ये मौतें हुई हो सकती हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार नागपुर में लगातार 44°C से 46°C तक तापमान दर्ज किया जा रहा है। सड़क किनारे रहने वाले बेघर, मजदूर और भिक्षुक सबसे ज्यादा प्रभावित बताए जा रहे हैं। मेडिकल और मेयो अस्पतालों के मॉर्चरी में लगातार अज्ञात शव पहुंचने की घटनाओं ने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
कुछ मामलों में मृतकों के शव सड़क किनारे, फुटपाथ और सार्वजनिक स्थानों पर मिले। कई मृतक बेघर या दिहाड़ी मजदूर बताए जा रहे हैं। हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने सभी मौतों को आधिकारिक रूप से हीटस्ट्रोक नहीं माना है और अंतिम पुष्टि पोस्टमॉर्टम व डेथ ऑडिट के बाद ही संभव बताई गई है।
इसी बीच नागपुर महानगरपालिका ने Heat Action Plan लागू होने का दावा किया है। प्रशासन की ओर से लोगों को दोपहर 12 बजे से 4 बजे तक बाहर न निकलने, अधिक पानी पीने और बच्चों व बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी गई है। शहर के अस्पतालों में विशेष “कोल्ड वार्ड” भी तैयार किए गए हैं।
लेकिन अब बड़ा सवाल यही उठ रहा है —
अगर प्रशासन को गर्मी की गंभीरता का अंदाजा था, तो क्या निजी संस्थानों, कोचिंग क्लासेस और कॉलेजों में नियमों के पालन की निगरानी के लिए कोई विशेष टीम बनाई गई?
कई अभिभावकों और छात्रों का आरोप है कि कलेक्टर कार्यालय के निर्देशों के बावजूद कई निजी संस्थान अब भी बच्चों और युवाओं को भीषण गर्मी में ऑफलाइन बुला रहे हैं।
लोग पूछ रहे हैं:
- क्या आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?
- क्या किसी संस्थान पर कार्रवाई हुई?
- क्या छात्रों और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जमीनी स्तर पर मॉनिटरिंग हो रही है?
नागपुर में बढ़ती गर्मी और लगातार सामने आ रही मौतों की घटनाओं के बीच अब प्रशासन की वास्तविक तैयारी और अमल दोनों पर सवाल खड़े होने लगे हैं।








