Published On : Tue, Apr 20th, 2021

घर घर में मंदिर में बन जाये- आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी

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नागपुर : घर घर में मंदिर बन जाये. व्यक्ति को जैसी संगति मिलती व्यक्ति वैसा होता हैं. संगति का बहुत फरक पड़ता हैं यह उदबोधन प्रज्ञायोगी दिगंबर जैनाचार्य गुप्तिनंदीजी गुरुदेव ने विश्व शांति अमृत वर्धमानोत्सव के अंतर्गत श्री. धर्मराजश्री तपोभूमि दिगंबर जैन ट्रस्ट और धर्मतीर्थ विकास समिति द्वारा आयोजित ऑनलाइन समारोह में दिया.

गुरुदेव ने कहा गुणवान व्यक्ति के साथ रहकर व्यक्ति सम्मान प्राप्त करता हैं. घर घर मंदिर बन जायें, घर घर में गृह चैत्यालय बनाये. सूरज से प्रेरणा लेना चाहिये, सूरज रोज डूबता है, अस्त होता हैं फिर दूसरे दिन आ जाता हैं, प्रकाश देता हैं अपना काम कर चला जाता हैं. हमें अपने उत्साह बनाये रखना चाहिये.

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घर में घी के साथ दीपक धूप लगाने से सकारात्मक उर्जा रहती हैं- अनुमानसागरजी मुनिराज
श्री अनुमानसागरजी मुनिराज ने धर्मसभा में कहा घर में घी के साथ दीपक, धूप लगाने से सकारात्मक उर्जा मिलती हैं. वहां का वातावरण शुद्ध रहता हैं. गाय के घी के दीपक से ऑक्सिजन मिलती हैं. हमारे घर में दीप, धूप हमेशा जलते रहना चाहिये. जिन मंदिरों में अखंड ज्योति जलती हैं, वहां सकारात्मक ऊर्जा मिलती हैं. जैन धर्म के नियमों का पालन करें तो यह बीमारी कुछ नहीं कर सकती. भोजन शुद्ध होगा तो बीमारी हमारे पास नहीं आती हैं. जितनी हो सके जिनेन्द्र भगवान की आराधना करना चाहिये. जो दबा दबा कर खाता हैं वह दवा खाता हैं. भोजन दवा की तरह लेना चाहिये. गुरु के अंदर करुणा होती हैं. घर में रहकर भगवान महावीर के संदेश को जन जन तक पहुँचाना हैं. भगवान महावीर के सिद्धांतों को अपनायेंगे तो हमारे जीवन में स्वस्थ रहें. गुरूदेव के कार्य से स्वयं जुड़े और दूसरों को भी जोड़े.

जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों का महात्म्य बताते हुए मुनिराज ने कहा आप भगवंत आज के आदि हुए हैं इसलिए आदिनाथ हो, शत्रुओं के जीत लिया इसलिए अजितनाथ हो, आपने असंभव को संभव कर किया इसलिए आप संभवनाथ हो, जो भी आता हैं उसका अभिनंदन हो जाता हैं इसलिए आप अभिनंदननाथ हो, आपके चरणों में कुमति हैं आती हैं वह सुमति हो जाता हैं इसलिए आप सुमतिनाथ हो. आपके कुटो की नीति लोगों में फैल रहीं हैं इसलिए आप पदमप्रभु हो. आपके चरणों में लोहा आ जाता हैं तो वह सोना बन जाता हैं इसलिए आप सुपार्श्वनाथ हो. चंद्रमा की तरह शीतलता देनेवाले हो इसलिए आप चंद्रनाथ हो. सबके हृदय कमल में विराजमान हो इसलिए आप पुष्पदंत हो. आपके चरणों में जो भी आता हैं उससे शीतलता मिलती हैं इसलिए आप शीतलनाथ हो. आपके चरणों में जो भी आता हैं उसका कल्याण हो जाता हैं इसलिए आप श्रेयांसनाथ हो. आपके चरणों में जो भी आता हैं पूज्य हो जाता हैं इसलिए आप वासुपूज्य हो. आप कर्म, मल से रहित हो इसलिए आप विमलनाथ हो, आपके गुण अनंत हैं इसलिए अनंतनाथ हो. आपके चरणों में धर्म हैं इसलिए आप धर्मनाथ हो. आप चरणों में जो झुक जाता हैं इसलिए आप शांतिनाथ हो.

छोटे से छोटा जीव आपके चरणों में आता हैं इसलिए उसका कल्याण हो जाता हैं इसलिए आप कुंथुनाथ हो. आप अंतरंग और बहिरंग जानते हो इसलिए आप अरहनाथ हो. कर्मो को पछाड़ लिया इसलिए आप मल्लीनाथ हो. सुवर्तो को धारण कर लिया इसलिए आप मुनिसुव्रतनाथ हो. आपके चरणों में तीन लोक के जीव नमन करते हैं इसलिये नमिनाथ हो. लोको में आप एक हो इसलिए नेमिनाथ हो. आपके समीप जो आता हैं उसका कल्याण हो जाता हैं इसलिए आप पार्श्वनाथ हो. वीरों में वीर आप महावीर हो.

जिनेन्द्र भगवान की आराधना करने के लिये पुण्य चाहिये. गुरुदेव के माध्यम से पूजा, अनुष्ठान, विधान, जाप्य अनुष्ठान हो रहे हैं. विधान, पूजा अनुष्ठान ऐसा साधन हैं जो विपदा से बचा सकता हैं. धर्मसभा का संचालन स्वरकोकिला गणिनी आर्यिका आस्थाश्री माताजी ने किया.

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