Published On : Sat, Jan 27th, 2018

रामदेव से सवाल : क्या हुआ तेरा वादा


नागपुर: सितंबर 2016 में योगगुरु रामदेव बाबा ने मिहान की 230 एकड़ जमीन में मेगा फूड पार्क लाने का ऐलान किया। इस व्यापार में क्षेत्र के 10 हजार लोगों को रोजगार और 50 हजार किसानों को शामिल करने का वादा भी किया। इस कम्पनी के माध्यम से बाबा रामदेव 1000 करोड़ रुपए का फूड पार्क विकसित करना चाहते हैं जिसमें संतरे के रस को पैकेज्ड रूप में एक ब्रांड के तौर पर पेश किया जाएगा।

हरिद्वार के बाद पतंजलि का यह पहला विस्तार है। यह परियोजना शुरू होते ही विवादों में घिरती चली गई, जब इसके लिए आवंटित व्यवसायिक भूमि दर 60 लाख रुपए प्रति एकड़ की बजाए 25 लाख रुपए प्रति एकड़ की दर से दी गई। इसके बाद एसईजेड और गैर एसईजेड के बीच भी विवाद पैदा हुआ था, जिसमें मिहान एसईजेड के विकास आयुक्तालय के यूनिट अप्रूवल कमिटी को यह बताना पड़ा कि पतंजलि के प्लाटों जो एसईजेड और गैर एसईजेड में है उसमें एक अंतर है। दोनों ही परियोजनाएं एक साथ साथ चल रही हैं। गैर एसईजेड की जमीन नीलामी के जरिए ली गई है। इसके तुरंत बाद 64 करोड़ रुपए का चेक एमएडीसी को दिया गया जिसे बाद में पतंजलि ने बैंक को स्टॉप पेमेंट का आदेश देकर भुगतान पर रोक लगा दी थी। ऐसे दो बार हो चुका है। पतंजलि के प्रबंध निदेशक बालकृष्ण कहते हैं कि एसईजेड की जमीन को लेकर किया गया भुगतान इसलिए रोका गया है क्योंकि कमेटी ने भी जमीन के बीच दीवार होने को लेकर ऐतराज जताया था।

इसके बाद उन्होंने विवाद खत्म होने और पेमेंट अदायगी की जानकारी दी। लेकिन शुरुआती चरणों में ही मीडिया और नेताओं के निशाने पर यह परियोजना आ गई थी। इस परियोजना के लिए निवेश कराने के लिए तैयार करानेवाले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि पतंजलि फूड विदर्भ के किसानों के लिए वरदान साबित होगी जो किसान आत्महत्या को खत्म कर नागपुर को विकास की पटरियों पर दौड़ाएगी। चंद्रपुर, गडचिरोली, गोंदिया जैसे जंगल के इलाकों में रहनेवाले ऐसे आदिवासियों के लिए भी यह परियोजना फलदायी साबित होगी जो जड़ी बूटियां जंगल से चुनकर लाते हैं। यही नहीं पतंजलि की ओर से किसानों को संतरा, अलोविरा, टमाटर और जड़ीबूटियों को पैदा करने का प्रशिक्षण व खरीदी की गारंटी भी दी जाएगी। मुख्यमंत्री फडणवीस ने पूर्व सांसद विलास मुत्तेमवार के उस आरोप को गलत करार दिया जिसमें मुत्तेमवार ने पतंजलि को जमीन कौड़ियों के दाम देने का आरोप लगाया था। उन्होंने जमीन खरीदी प्रक्रिया में पार्दर्शिता होने का दावा करते हुए बताया था कि केंद्रीय दक्षता आयोग के निर्देशों के अनुसार तीन बार आमंत्रित की गई निविदा में पतंजलि आयुर्वेद को उपयुक्त पाया गया था। इससे 50 हजार किसानों से माल खरीदने और सीधे 10 हजार लोगों को रोजगार प्राप्त होने की बात कही गई थी। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा था कि रामदेव की कम्पनी 100 करोड़ रुपए किसानों और आदिवासियों से माल खरीदने के लिए कहा था। साथ ही महाराष्ट्र के 2 हजार किसानों को प्रशिक्षित करने का भी वादा किया ताकि यहां के एग्रो बिजनेस को बढ़ावा दिया जा सके।

16 माह बाद भी नहीं फूड पार्क का कोई अता पता
जब नागपुर टुडे की टीम पतंजलि फूड पार्क को आवंटित की गई जमीन को देखने पहुंची तो पाया परिसर में कांटों की तार लगी सुरक्षा दीवार तैयार की गई है। लेकिन इसमें एक फांका भी रख छोड़ा गया है ताकि लोग भीतर- बाहर आ जा सके। कुछ तारों के बंडल और मशीनरी व स्टाफ के हेलमेट रखे दिखाई दिए। लेकिन परिसर में कोई भी दिखाई नहीं दिया जिससे यह साबित हो रहा था कि परिसर में कोई निर्माण कार्य नहीं हो रहा था। एक चौकीदार जैसा दिखाई देनेवाला शक्स उस दीवार के फांके से आ – जा रहा था। इस फूड पार्क की दीवार से सटकर ही एक महिला की चाय टपरी है, जो इस उम्मीद में शायद बैठी है कि यहां उद्योग कभी लगेगा और उसके दूकान में भी ग्राहकी बढ़ेगी। फिलहाल उसे एचसीएल में काम करनेवाले कर्मचारियों से ही रोजगार मिल रहा है। महिला बताती हैं कि रोज मैन्यु बदल बदल कर वे समोसा, ब्रेड पकोड़, मैगी, कचोरी, पकौड़ियां आदि बनाती हैं। इस समूचे ‘फूड पार्क’ एरिया में यह एकमात्र स्थल है जहां खाद्य पदार्थ मिल रहा था। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा था कि कहां है वह फूड पार्क जो हजारों लोगों को रोजगार देनेवाली थी और किसानों को प्रशिक्षण के साथ उनके माल की खरीदी की गारंटी भी।

क्या परियोजना मध्यप्रदेश चले जाएगी?
मिहान के इस हिस्से में छाए विराने का क्या यह अर्थ है कि यहां लगनेवासी फूड फैक्ट्रियां अब यहां नहीं आएंगी? क्या इस कौड़ियों के दाम आवंटित इस जगह को केवल गोदाम के रूप में माल भंडारण के लिए रखा जाएगा, जिसका उत्पादन कहीं और किया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि यह मध्य प्रदेश में उत्पादन किया जाएगा। बताया जा रहा है कि मध्य प्रदेश सरकार परियोजना के लिए कम्पनी को मुफ्त में जगह के साथ मिहान के बनिस्बत आधे दामों में बिजली मुहैय्या कराएगी। इसी तरह की पेशकश पड़ोसी तेलंगाना सरकार द्वारा भी दिए जाने की जानकारी सूत्रों ने दी है। बालकृष्ण एक पेशेवर व्यापारी भी हैं। अगर उन्हें कहीं और सस्ते में माल उत्पाद करने में सफलता मिलेगी तो वे मिहान और एसईजेड में क्यों आएंगे। यही नहीं एसईजेड में बननेवाली चीजें एक्सपोर्ट की जाएंगी तो ऐसे में यह अटकलों की तरह ही देखी जा रही है। (शायद यही वजह है गैर एसईजेड की जमीन एक ही ट्रैक्ट पर ली गई हो।)

फिर मेक इन महाराष्ट्र का क्या हुआ
बीते सप्ताह की ही बात है जब पतंजलि को एक और सहूलियत प्रदान की गई। महाराष्ट्र सरकार ने पतंजलि के सारे उत्पादों को सरकार के ई-सेवा केंद्रों में उपलब्ध कराने का ऐलान किया है। यह वह केंद्र है जहां से पैनकार्ड, डोमिसाइल सर्टिफिकेट, आधार कार्ड, पासपोर्ट संबंधित डॉक्यूमेंट द्वार तक उपलब्ध कराया जाता है। इसके पीछे का तर्क दिया जा रहा है कि चूंकि इन उत्पादों को मेक इन महाराष्ट्र के तहत तैयार किया जाएगा तो उनकी बिक्री के लिए जगह भी उपलब्ध कराने की गारंटी सरकार को ही देनी होगी। लेकन इन पर सस्ते पानी, बिजली, लेबर आदि के आगे महंगे महाराष्ट्र का विकल्प फीका साबित हो रहा है जो पड़ोसी राज्यों के पास जाता दिखाई दे रहा है। इन कमियों और प्रतिस्पर्धाओं को हम केवल और केवल विदर्भ बनने के बाद ही पूरा कर पाएंगे। शायद तब हम यह साबित कर पाएंगे कि हमारे पास उनसे भी सस्ती बिजली है। … मगर ये हो ना सका और अब यह आलम है कि तू नहीं तेरा गम तेरी जुस्तुजू भी नहीं।