
नागपुर – काटोल नगर परिषद की नगराध्यक्ष अर्चना राहुल देशमुख के लिए जाति वैधता प्रमाणपत्र से जुड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ द्वारा अर्चना देशमुख को दी गई अंतरिम राहत पर रोक लगा दी है। इस आदेश के बाद नगराध्यक्ष पद को लेकर उनके खिलाफ आगे की वैधानिक कार्रवाई का रास्ता खुल गया है।
यह मामला अर्चना देशमुख के कुणबी जाति वैधता प्रमाणपत्र को लेकर चल रहे विवाद से जुड़ा है। जिला जाति प्रमाणपत्र जांच समिति ने 19 जून 2026 को उनके कुणबी जाति दावे को अमान्य कर दिया था। इसके बाद उन्होंने जांच समिति के निर्णय को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने फिलहाल जांच समिति के आदेश तथा उसके आधार पर जारी परिणामी आदेशों और अधिसूचनाओं के अमल पर रोक लगाते हुए उन्हें अंतरिम राहत दी थी।
अब इस राहत को नगराध्यक्ष पद की प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार कल्पना उमप और अन्य ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश पर रोक लगाकर मामले को एक नया मोड़ दे दिया है।
पुराने दस्तावेजों और विजिलेंस रिपोर्ट पर हाईकोर्ट ने उठाए थे सवाल
हाईकोर्ट के समक्ष अर्चना देशमुख की ओर से दलील दी गई थी कि जाति जांच समिति ने उनके परिवार से संबंधित पुराने महत्वपूर्ण दस्तावेजों तथा विजिलेंस/दक्षता दल की रिपोर्ट पर उचित विचार नहीं किया। उपलब्ध हाईकोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार, उनके परिवार के पुराने अभिलेखों में ‘कुणबी’ संबंधी प्रविष्टियों का भी हवाला दिया गया था। वहीं विरोध करने वाले पक्ष ने ऐसे दस्तावेजों की ओर ध्यान दिलाया जिनमें परिवार के कुछ रिकॉर्ड में ‘मराठा’ प्रविष्टियां होने का दावा किया गया था।
हाईकोर्ट ने प्रथमदृष्टया यह भी माना था कि जांच समिति द्वारा कुछ महत्वपूर्ण सामग्री पर समुचित विचार किए जाने की आवश्यकता है। इसी आधार पर समिति के निर्णय और उससे जुड़े परिणामी आदेशों के क्रियान्वयन पर अंतरिम संरक्षण दिया गया था।
चुनाव के बाद शुरू हुआ था जाति प्रमाणपत्र का विवाद
काटोल नगर परिषद के चुनाव में नगराध्यक्ष पद OBC महिला वर्ग के लिए आरक्षित था। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार, अर्चना देशमुख ने 2 दिसंबर 2025 को हुए नगर परिषद चुनाव में इसी आरक्षित वर्ग से नामांकन दाखिल किया था। चुनाव परिणाम 21 दिसंबर 2025 को घोषित हुए थे और वे लगभग 2,300 मतों के अंतर से निर्वाचित हुई थीं। नामांकन के समय उन्होंने OBC कुणबी जाति का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था तथा निर्धारित अवधि में जाति वैधता प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने का दायित्व स्वीकार किया था।
इसके बाद उनके जाति दावे की जांच प्रक्रिया आगे बढ़ी। जांच समिति के निर्णय के बाद पूरा मामला न्यायालय तक पहुंचा और नगराध्यक्ष पद की वैधता पर भी सवाल खड़े हो गए।
प्रतिद्वंद्वी पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
हाईकोर्ट से मिली राहत के खिलाफ कल्पना उमप और अन्य की ओर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ विधिज्ञ मुकुल रोहतगी, अधिवक्ता मोहित खजांची और महेश धात्रक ने पक्ष रखा।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम राहत पर रोक लगाते हुए मामले में संबंधित प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया है। अब इस प्रकरण की अगली सुनवाई 3 नवंबर को निर्धारित की गई है।
नगराध्यक्ष पद पर आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद अब काटोल नगर परिषद की नगराध्यक्ष अर्चना देशमुख के पद को लेकर प्रशासनिक और कानूनी स्तर पर आगे की कार्रवाई की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, मामले का अंतिम निपटारा अभी नहीं हुआ है। सुप्रीम कोर्ट में मूल विवाद पर सुनवाई जारी रहेगी और अगली सुनवाई में दोनों पक्षों की दलीलों तथा रिकॉर्ड पर आगे विचार किया जाएगा।
फिलहाल इस पूरे प्रकरण का केंद्र जाति वैधता प्रमाणपत्र, जांच समिति का निर्णय और नगराध्यक्ष पद के लिए उसके कानूनी प्रभाव पर है। अंतिम स्थिति न्यायालय के आगामी आदेशों के बाद ही स्पष्ट होगी।
काटोल की राजनीति में बढ़ी हलचल
नगराध्यक्ष पद से जुड़ा यह विवाद अब केवल जाति प्रमाणपत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सीधा प्रभाव नगर परिषद के नेतृत्व पर पड़ने की संभावना है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद काटोल नगर परिषद की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। सभी की नजर अब आगामी 3 नवंबर की सुनवाई पर टिकी है।




