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    Published On : Mon, Sep 3rd, 2018

    त्योहारी सीजन में सब्ज़ी मंडियों में सेस के नाम पर लूट

    नागपुर: जन्माष्टमी के साथ ही त्योहारों की शुरुआत हो गई है. त्योहारों में शहर में कई लोग महाप्रसाद और खाने का आयोजन करते हैं. इस आयोजन के लिए बड़ी मात्रा में सब्जियों की खरीदी होती है. अधिक क्वांटिटी में सब्जी खरीदने के लिए ग्राहक थोक मार्केट का रुख अपनाते हैं, लेकिन वहां पर भी उन्हें सेस के नाम पर लूट लिया जाता है.

    माल के नाम पर सेस तो लिया जा रहा है, लेकिन न तो उसकी कोई रसीद दी जाती है और न ही सेस लिखा कोई बिल दिया जाता है. जब सेस के बारे में व्यापारियों से पूछा जाए, तो उनका दो टूक जवाब रहता है कि यह सेस के रूप में लिया जा रहा है और यह एपीएमसी में जमा किया जाता है.

    एक तरफ ग्राहकों को कम वजन मिलने की शिकायत तो आ रही थीं, ऊपर से अब सेस के नाम पर लूट की भी शिकायतें आने लगी हैं. जानकारी के अनुसार आढ़तियों द्वारा लिया जाने वाला सेस तो मार्केट में जाता है, लेकिन इन मार्केट में चिल्लर में जो व्यापार करते हैं, वे भी सेस के नाम पर ग्राहकों से अतिरिक्त पैसों की मांग करते हैं.

    आधा मन पर 10 रु. सेस
    महाप्रसाद के लिए काटन मार्केट में सब्जियों की खरीदी के लिए गये एक व्यक्ति ने बताया कि उन्होंने जब मार्केट से प्याज और बैंगन लिये तो आधा मन बोलकर व्यापारी ने 10 रुपये और 1 मन के लिए 20 रुपये सेस लिया. लेकिन यह सेस के रूप में ली जाने वाली राशि का लिखित में कोई प्रमाण या रसीद नहीं दी गई.

    सुबह से कई ग्राहकों से सेस के रूप में इसी तरह की अतिरिक्त राशि लेकर लूट का खेल मार्केट में खुलेआम चल रहा है. किसी तरह का प्रमाण या रसीद नहीं दिए जाने से यह हकीकत में एपीएमसी की तिजोरी तक सेस पहुंच रहा है या अपनी जेबें गरम करने और ग्राहकों की जेब काटने पर व्यापारी तुले हुए हैं.

    जारी है कमीशन का खेल

    जिस तरह सेस का खेल चल रहा है, वैसा ही खेल कमीशन का जारी है. मार्केट में किसानों या ग्राहक से कमीशन पर बंदी है, लेकिन इसके बावजूद व्यापारियों द्वारा दोनों तरफ से कमीशन लिया जा रहा है. सूत्रों के अनुसार इस पर किसी का ध्यान नहीं होने के वजह से काटन और फुले मार्केट में कमीशन का खेल धड़ल्ले से जारी है. कोई इसकी शिकायत नहीं करता है, जिसके चलते बैखोफ इस तरह से कार्य किया जा रहा है. किसानों को अपना माल मार्केट में बेचने के लिए रोज आना पड़ता है, जिसके चलते वे इस तरह की ज्यादती सहन करते हैं. प्रशासक को इस पर ध्यान देते हुए कार्रवाई करने की मांग जागरूक नागरिकों द्वारा की गई है.

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