नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि भारत का विभाजन पिछले शताब्दी की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक था। उन्होंने दावा किया कि जब देश को स्वतंत्रता मिली, उस समय संघ आज जितना मजबूत नहीं था। यदि संघ उस दौर में अधिक मजबूत होता, तो देश का विभाजन नहीं होता।
शुक्रवार को नागपुर में आयोजित एक पत्रकार वार्ता में आंबेकर ने यह वक्तव्य दिया। सिविल लाइंस स्थित चिटणवीस केंद्र में आयोजित कार्यक्रम में विदर्भ प्रांत संघचालक दीपक तामशेट्टीवार और नागपुर महानगर संघचालक राजेश लोया भी उपस्थित थे।
आंबेकर ने कहा कि वर्ष 1947 में संघ की संगठनात्मक शक्ति सीमित थी, लेकिन इसके बावजूद संघ के स्वयंसेवकों ने हिंदुओं की सुरक्षा और विस्थापित परिवारों के पुनर्वास के लिए पूरी ताकत से काम किया। उन्होंने कहा कि विभाजन के बाद तत्कालीन व्यवस्था के प्रति लोगों में व्यापक नाराजगी थी, जिसके कारण स्वतंत्रता आंदोलन के कई नेताओं की छवि प्रभावित हुई।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दलों ने संघ को अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानना शुरू कर दिया था। इसी कारण विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को संघ से संबंधित रिकॉर्ड एकत्र करने के निर्देश दिए गए और राजनीतिक कारणों से संघ पर पहली बार प्रतिबंध लगाया गया।
संघ सभी को अपना मानता है
आंबेकर ने कहा कि राजनीतिक स्वार्थ के चलते समय-समय पर संघ के खिलाफ दुष्प्रचार किया जाता है, जबकि संघ किसी से द्वेष नहीं रखता और न ही किसी को अपना शत्रु मानता है। उन्होंने कहा कि संघ समाज के सभी वर्गों के साथ संवाद स्थापित करने में विश्वास रखता है और चर्चा के लिए हमेशा तैयार रहता है।
‘कम्युनिस्ट और समाजवादी संविधान के सबसे बड़े विरोधी’
पत्रकार वार्ता के दौरान आंबेकर ने कहा कि आज कुछ समूहों द्वारा “जय भीम-लाल सलाम” जैसे नारे लगाए जाते हैं, लेकिन डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने स्वयं गौतम बुद्ध के शांति मार्ग को सर्वोत्तम बताया था। उन्होंने कहा कि डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधाराओं को संविधान के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था और यह बात आज भी प्रासंगिक है।
संकट के समय राजनीति नहीं, सहयोग जरूरी
वैश्विक संघर्षों के कारण विभिन्न क्षेत्रों में चुनौतियां पैदा होने का उल्लेख करते हुए आंबेकर ने कहा कि ऐसे समय में देशवासियों के सहयोग की आवश्यकता है। उन्होंने स्वदेशी को बढ़ावा देने पर जोर देते हुए कहा कि विदेशी वस्तुओं पर निर्भरता कम करने के प्रयास होने चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि संवेदनशील और संकटपूर्ण परिस्थितियों में राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।







