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    Published On : Sun, Jun 11th, 2017

    “गोकुल” बना ‘ओला इ-कैब’ चार्जिंग का अवैध केंद्र (अड्डा)

    नागपुर – ये है आपके सामने “स्मार्ट सिटी” कॉलोनी एक ताजा बहुत निराशाजनक लेकिन वास्तविक उदाहरण “गोकुल जोरस हाउसिंग सोसाइटी”, बोरगाँव जो की गिट्टीखदान चौक से 2 किमी से भी कम दुरी पर है.

    यह सोसाइटी नागपुर के दूरस्थ और बाहरी कोने में, दिनशॉ आइसक्रीम कारखाने के बाद, गोरेवाड़ा झील / बांध के ठीक पहले स्थित है.

    उक्त सोसायटी संरक्षित प्राकृतिक जंगल से दोनों ओर घिरी हुयी है, जो की वन विभाग से संबंधित हैं, लेकिन फ़िलहाल लीज पर सेना के पास है.

    सोसाइटी का क्षेत्र 892 वर्ग मीटर है और इसमें 125 भूखंड हैं, इनमें से अधिकतर 5000 वर्ग फुट या इससे बड़े है ; इसलिए उनमें से अधिकांश में अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स बनाए गए हैं, केवल 2-3 स्वतंत्र घर हैं और कुछ खाली भूखंड हैं.

    हमें यकीन है कि जब विभिन्न बिल्डर्स ने अपनी ‘एक इमारत’ फ्लैट योजनाएं बेच दीं, तो उन्होंने इस क्षेत्र को ‘जंगल से घिरा हुआ, प्रकृति के करीब, शांत, शांतिपूर्ण, दर्शनीय आदि नामों से प्रचारित किया होगा.’ इसलिए इसका नाम “गोकुल” रखा गया.

    ठीक है, आईये देखते हैं की इस गोकुल के पास क्या है…और क्या नहीं ?

    “कल्पतरू” नामक एक ‘सभागृह’ (समारोह कक्ष), “ब्लू डायमंड” नामक एक छोटासा विद्यालय,जो की क्षेत्र के निवासियों में से एक द्वारा निर्मित और चलाया जाता है. लेकिन यंहा न कोई शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है, नाही कोई खेल का मैदान, सुबह-शाम चलने फिरने हेतु जॉगिंग पार्क भी नहीं है.

    बस एक संकीर्ण लेन है, जहां वहां रहने वाले सैकड़ों परिवारों के बच्चों को खेलते हैं और यहां तक ​​कि जहां बड़ों और अन्य लोग सुबह और शाम सैर के लिए जाते हैं.

    मांफ करें, क्या मैंने शाम की सैर कहा ? नहीं, मुमकिन नहीं क्योंकी पूरी तरह से स्वीकृत और अनुमोदित लेआउट होते हुए भी यहाँ के रास्तों पर अभी तक स्ट्रीट लाइट नहीं है. वो बतातें हैं, की इसके लिए कोई राशि नहीं हैं, दोनों तरफ से जंगल होने के कारन यहाँ बहुत सुरक्षित भी नहीं लगता हैं.

    समाजविरोधी तत्वों का पसन्दीदा अड्डा

    वास्तव में एक सूंदर स्थान होते हुए भी जंगल के किनारे असामाजिक तत्वों के
    हमेशा लगाने वाले जमावड़े के कारन यह एक भयावह स्थान में तब्दील हो गया है.

    वें अपनी कारों शराब, खाना और दोस्तों के साथ और ‘ख़ास जश्न’ के लिए तो अपनी ‘महिला-मित्रो’ के साथ यहाँ आते हैं, आपको अंदाजा लगा ना ? वो लोगों के घरों के आगे गाड़ियां लगते हैं, और किसीके टोकने पर उसको गालियां भी सुनते हैं. उसके बाद ये सोसायटी और जंगल के बिच की जगह पर बैठते हैं,और टूटी हुयी बियर की बोतलें, प्लास्टिक का कचरा, उपयोग में लाये गए कंडोम्स आदि भी छोड़ जाते हैं.

    नए पड़ोसी के कारण मुसीबत में और इजाफा

    और अब इस गोकुल सोसाइटी को एक नया उपहार मिला है, एक नया पड़ोसी जो की बहुत ‘शक्तिशाली’ है. ये सही मायनों में सचमुच ताकतवर है और इसने गोकुल के सभी परिवारों और निवासियों को निराशा, यहां तक ​​कि भय से भी एकजुट बनाया हुआ है.

    यह एक ओला कैब्स चार्जिंग सेंटर हैं, जो प्लॉट नं.79 पर सुपरसॉनिक गति की तेजी से निर्मित किया गया है. यहाँ पर एकसाथ 16 कैब्स चार्ज कीये जाने की सुविधा हैं. एक कैब चार्ज होने के लिए लगभग ढाई से दो घंटे का समय लगता है, और यह स्टेशन 24 * 7 चलाया जा रहा है इसलिए यह 24 घंटों में करीब 200 कैब चार्ज कर सकता हैं.

    निवासियों को इसपर आपत्ति

    यह पूरी तरह आवासीय क्षेत्र है, किसी भी तरह की वाणिज्यिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

    इतने सारे ई-टैक्सी के साथ निवासियों की गलियों से चलते हैं, जिसके कारण वे बच्चों को खेलने के लिए और बड़ों को चलने और सैर के लिए असुरक्षित हो जाते हैं.

    यहाँ पूरी सोसायटी को सिर्फ आने-जाने का एकही संकीर्ण मार्ग हैं, जो की गोरेवाड़ा रोड की ओर से होने के साथ रिंग रोड से कुछ ही मीटर की दुरी पर है. कैब्स की सतत आवाजाही अड़चन और ट्रैफिक जाम का सबब बन सकती है.

    चार्जिंग के लिए आने वाली कारों के साथ, कई ड्राइवर ज्यादा समय चार्जिंग सेंटर के आसपास व्यतीत करेंगे. उनके मनोरंजन के लिए पान के ठेले आएंगे जो और भी अधिक नापाक तत्वों को आकर्षित करेंगे.

    ध्वनि प्रदूषण को शांत करना

    ई-कैब रखने के पीछे वायुमंडलीय प्रदूषण को रोकना एक मकसद है. लेकिन अधीर ड्राइवरों से संचालित इन कैब्स के द्वारा लाये जाने वाले ध्वनि प्रदूषण क्या ?

    यहां तक ​​कि आज सुबह जब लेखिका गोकुल में थी, तब उन्होंने चार्जिंग सेंटर की तरफ बढ़ने के लिए रस्ते के मोड़ पर टैक्सी ड्राइवरों को बहुत ज़ोर जोर से हॉर्न बजाते सुना. उन्होंने कहा कि वे आने के बाद पहले हॉर्न बजाते हैं ताकि चार्जिंग सेंटर के द्वार उनके लिए खोले जाएँ और वे अंदर आ सकें. इन कैबों के आने का कोई निर्धारित समय नहीं है, वें आधी रात 12 बजे और सुबह तड़के 4 बजे भी आ सकते हैं. वास्तव में, जब उन्हें काम नहीं होता तो वें चार्जिंग के लिए आना पसंद करते हैं.

    अवैध निर्माण होते हुए भी होती है बिजली की तुरंत आपूर्ति

    इस व्यावसायिक सुविधा को अविश्वसनीय गति से मिलाने वाले ‘फायदें’ यहां रहने वाले पुरुषों और महिलाओं को परेशान करते हैं. पूरे मामले में सभी नागरी संस्थाओं के नियमों को ‘तोडा-मरोड़ा’ जा रहा हैं.

    आईये इस समूचे घटनाक्रम पे एक नजर डालें

    15 अप्रैल, 2017 के आसपास, निवासियों ने प्लॉट नं. 79 पर कोई गतिविधि देखी. गडकरी और फड़नवीस द्वारा नागपुर में ई-परिवहन क्रांति का उदघाटन करने से ठीक 11 दिन पहले. जिसके लिए ओला सीएमडी सहित अन्य लोग नागपुर आए थे.

    जांच करने पर, उन्हें पता चला कि ओला के कैब के लिए वहां एक चार्जिंग सेंटर बनाया जा रहा था ; और वो भी 2 या 3 कारों के लिए नहीं, बल्कि एक समय में कुल 16 कारों के लिए.

    इतने सारे चार्जिंग पॉइंट्स को समाहित करने के लिए, एक ‘अवैध’ डिज़ाइन बनाया गया जिसके तहत भूखंड के बाहरी परिधि के हिस्से का भी उपयोग करते हुए जमीन एक कतरे को भी बक्शा नहीं गया. क्या ऐसा एफ.एस.आई. हर किसीको मिलता है ?

    लोगों ने प्रभागा के दो प्रमुख नगरसेवकों से शिकायत की, जो भाजपा के भूषण शिंगे और संदीप जाधव हैं. शिंगे एक एनआईटी ट्रस्टी भी हैं और जाधव स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं. उन्हें इन अनियमितताओं के बारे में एनएमसी में शिकायत दर्ज करने की सलाह दी गई थी, और उन्होंने बिना समय गंवाए तुरंत ऐसा ही किया.

    एनएमसी ने 29 अप्रैल को एक ‘नोटिस’ भेजा – लेकिन गलत प्लॉट नंबर और व्यक्ति को !! प्लॉट नंबर 78 के बजाय 79 – जानबूझकर तो नहीं ?

    प्राप्तकर्ता द्वारा ‘गलती’ की ओर इशारा किया गया था, तो 16 मई को नोटिस ’79’ पर भेज दिया गया था – इस तरह जवाब देने के लिए 17 और दिन मिल गए थे.

    एनएमसी नोटिस सेंटर की दीवारों पर चिपकाया गया है, जिसका जवाब 15 जून दिया जाना चाहिए. लेकिन इससे एसएनडीएल के 100 केवी ट्रांसफार्मर मंजूरी नहीं रुकी. जो तब दो दिनों के रिकार्ड समय में लगाया गया था और 2 दिन के भीतर बिजली कनेक्शन भी दिया गया था !! ( ये उस समय के एकदम विपरीत है जो सामान्य लोगों को बिजली कनेक्शन मिलने में लगता है.)

    जख्म पे और नमक छिड़कते हुए, इस ट्रांसफार्मर को सेंटर की सरंक्षक दीवार के बाहर खुले सार्वजनिक स्थान पर बनाया गया है ! (क्या एसएनडीएल को इतनी मूर्खतापूर्ण और गैरजिम्मेदाराना हरकत करने से कुछ समय पहले हुआ एक भयंकर हादसा जिसमे छोटे बच्चे इलेक्ट्रिक करंट लगने से घायल हो गए थे, क्या पर्याप्त नहीं है?)

    इसलिए सडकों पर लाइट्स के लिए इनके पास बिजली नहीं हैं, जहां बच्चे खेलते हैं और वरिष्ठ नागरिक चलते हैं, लेकिन ओला कैब के रिचार्जिंग के लिए तत्काल बिजली उपलब्ध होती है, कैसे ???

    और अब हम यह देखते हैं कि यह प्लॉट नं. 79 किसके पास है?

    अजय पाटिल की मां के पास, जो एक राकांपा नेता हैं, लेकिन जिनकी पत्नी हाल ही में भाजपा में शामिल हो गई और एक नगरसेविका के रूप में भी चुनी भी गयीं !

    क्या उनमे से कोई “बेरोजगार विद्युत अभियंता था ?” हमारे जानकारी के मुताबिक तो कोई नहीं. तो फिर हमारे माननीय केंद्रीय परिवहन मंत्री और मुख्यमंत्री द्वारा की गई घोषणाओं का क्या हुआ, जिसमे कहा गया था की, “बेरोजगार इलेक्ट्रिकल अभियंताओं को चार्जिंग सेंटरों का निर्माण करने तथा किराए पर देने, और स्व-नियोजित करने के लिए परमिट दिए जाएंगे?”

    लेकिन गोकुल के लोग इस निजतावाद से बिल्कुल भी चिंतित नहीं हैं. वे चाहते हैं कि चार्जिंग सेंटर को मुख्य सड़क पर स्थानांतरित किया जाए, या फिर किसी व्यावसायिक क्षेत्र में, जैसे की रिंग रोड, जो यहांसे बहुत करीब है !

    जब एनटी ने नगर निगम भूषण शिंगा से बात की, तो उन्होंने पुष्टि की कि ‘वह नैतिक रूप से गोकुल के लोगों के साथ खड़े थे. (फिर केंद्र पहले से ही क्यों शुरू हो गया है?)

    “एनएमसी घोषित करें कि यह अवैध है, मैं इन लोगों की स्वयं सहायता करूँगा,” वे कहते हैं.

    जिस विश्वास के साथ वे कहते हैं, यह निवासियों को डराता है कि एनएमसी का निर्णय क्या होगा? क्या होगा अगर बहुत सारे नियमों को तोड़कर भी वे इस निर्माण को अनुमति देते हैं, और कहते हैं की यह एक “अस्थायी निर्माण” है, तो ?

    इसपर निवासियों ने कहा, “की हम किसी भी सूरत में इस मामले को शांत नहीं होने देंगे, हम सब एकजुट हैं और अब चाहे जो भी हो, इस समस्या से लड़ने का पूरा मन बना चुकें हैं. यहाँ हम सब रहने वालों में ज्यादातर खुद घर-मालिक हैं, यह हमारा एकलौता घर है, और हम अपने परिवार की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे.”

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