गोंदिया/भंडारा: कहते हैं राजनीति और सत्ता सिर्फ और सिर्फ अंकगणित का खेल है। जहां नंबर नहीं, वहां कोई रिस्क नहीं , गोंदिया-भंडारा विधान परिषद (MLC) सीट को लेकर कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। कांग्रेस के पास जीत के लिए पर्याप्त बहुमत का आंकड़ा नहीं था, लिहाजा पानी बहुत गहरा भांपकर कांग्रेस समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार प्रफुल्ल गोपालदास अग्रवाल ने एक कदम आगे बढ़ाने के बाद अब दो कदम पीछे खींच लिए हैं। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी जीत की कोई गारंटी न देखकर उन्होंने अपना नामांकन पत्र (पर्चा) वापस ले लिया है।
इतना ही नहीं, एमएलसी चुनाव के लिए कांग्रेस की ओर से आधिकारिक पर्चा दाखिल करने वाले पूर्व विधायक और पूर्व गोंदिया जिला कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष दिलीप बंसोड़ ने भी अपना नामांकन वापस उठा लिया है।
महाविकास आघाड़ी का मैदान खाली, निर्दलीयों के भरोसे साख!
इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहें कि जो महाविकास आघाड़ी (MVA) गठबंधन कल तक क्रॉस वोटिंग के बूते जीत का डंका पीट रहा था, आज मौजूदा चुनावी स्थिति में उस एमवीए गठबंधन का कोई भी अधिकृत कैंडिडेट मैदान में ही नहीं है! अब महायुति के भाजपा उम्मीदवार अविनाश ब्राह्मणकर का सीधा मुकाबला दो निर्दलीयों-नरेश माणिक ईश्वरकर (निवासी मोहड़ी, जिला भंडारा) तथा सचिन यशवंत कुंभलकर (निवासी खात रोड, भंडारा) से हो रहा है। अपने हाथ जलाने के बाद अब कांग्रेस मैदान से हटने पर मजबूर होकर निर्दलीय नरेश ईश्वरकर को अपना समर्थन जता रही है।
नाना पटोले का बड़ा आरोप: प्रशासन बना सरकार की कठपुतली
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नाना पटोले ने सत्तारूढ़ दल पर प्रशासनिक मशीनरी के घोर दुरुपयोग का आरोप लगाया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर उन्होंने कहा कि अलोकतांत्रिक तरीके से उम्मीदवारों को धमकाया जा रहा था। पुलिस और प्रशासन निष्पक्ष कार्य करने की बजाय सरकार की कठपुतली के तौर पर काम कर रहा है, उन्होंने पूरे मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की है।
नगरसेवक बोले- ‘दिल के अरमां आंसुओं में बह गए..
गोंदिया-भंडारा विधान परिषद चुनाव आगामी 18 जून को बैलेट पेपर पर (गुप्त मतदान प्रक्रिया से) संपन्न होने जा रहा है। क्रॉस वोटिंग, दलबदल या पार्षदों की खरीद-फरोख्त (हॉर्स ट्रेडिंग) को रोकने तथा वोटों के बिखराव और बंटवारे से बचने के लिए महायुति और महाविकास आघाड़ी ने अपने वोटरों को सुरक्षित रखने के लिए भारी-भरकम “होटल पॉलिटिक्स” और “रिसॉर्ट पॉलिटिक्स” का खेल शुरू किया था , इसके तहत MVA (कांग्रेस) अपने नगरसेवकों को सीधे शिमला की ठंडी वादियों में सैर-सपाटे के लिए भेज दिया।
महायुति (NCP अजीत गुट) नागपुर के जामठा इलाके में स्थित लग्जरी होटल “रानी कोठी” के सभी 90 रूम बुक कर 125 नगरसेवकों के ठहरने की वीआईपी व्यवस्था 1 जून से की। बीजेपी और शिवसेना (शिंदे गुट) ने अपने नगरसेवकों को 2 जून से नागपुर के अमरावती रोड स्थित ‘चोकर धानी’ (राजस्थानी विलेज रिजॉर्ट) में ठहराया।
4 जून को नामांकन वापसी की समय सीमा खत्म होने के ठीक बाद यानी 5 जून को महायुति के इन नगरसेवकों को दक्षिण भारत के विभिन्न खूबसूरत पर्यटन क्षेत्रों की सैर पर निकलना था। लेकिन दमदार उम्मीदवार प्रफुल्ल अग्रवाल द्वारा मैदान छोड़ दिए जाने के बाद अब इस चुनाव का पूरा रोमांच ही खत्म हो चुका है, जिससे प्रस्तावित भ्रमण (टूर पैकेज) कार्यक्रम खटाई में पड़ गया है और नगरसेवकों के दिल के अरमां आंसुओं में बह चुके हैं।
पाषर्द- ए- दर्द : किसका रस्ता देखे.. ए दिल ए सौदाई
नामांकन दाखिल करने से पहले और अभी के हालात में जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। जो राजनीतिक दल कल तक नगरसेवकों के नखरे उठा रहे थे, उनकी खुशामद कर रहे थे, उन्होंने अब भाव देना बंद कर दिया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि होटल और रिसॉर्ट पॉलिटिक्स को तुरंत खत्म कर सभी नगरसेवकों को वापस गोंदिया और भंडारा जिले के अपने-अपने क्षेत्रों में लौटने का फरमान सुनाया जा सकता है।
लाखों खर्च कर पार्षद बने थे, सोचा था MLC चुनाव में ‘ भाग्य चमकेगा ‘
विशेष उल्लेखनीय है कि हाल ही में संपन्न हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों में इन नगरसेवकों ने चुनाव प्रचार पर लाखों रुपए पानी की तरह बहाए थे। उन्हें उम्मीद थी कि आने वाले इस एमएलसी चुनाव में उनके द्वारा किए गए पिछले चुनावी खर्च का आधा भार हल्का हो जाएगा (मोटी मलाई मिलेगी )लेकिन अब उम्मीदवारों के भागने से चुनाव पूरी तरह नीरस मोड में जा चुका है।
कोई बड़ी अपेक्षा या बड़ी ख्वाहिश पूरी होती दिखाई नहीं दे रही, इसलिए नगरसेवक भयंकर रूप से निराश हैं और सबके चेहरे लटके हुए हैं।
अब क्या होगा ? ‘खुन्नस वोट’ तय करेंगे निर्दलीयों का भविष्य!
चूंकि महायुति गठबंधन के पास जीत के लिए जरूरी मैजिक फिगर (संख्या बल का आंकड़ा) पर्याप्त मात्रा में मौजूद है, इसलिए भाजपा उम्मीदवार अविनाश ब्राह्मणकर का पलड़ा बेहद भारी और एकतरफा नज़र आ रहा है।
अब बतौर निर्दलीय मैदान में डटे दोनों उम्मीदवारों की झोली में वह “खुन्नस वोट” गिर सकते हैं, जो नगरसेवक इस पूरे घटनाक्रम से नाराज हैं । जिन नगरसेवकों के हाथ कुछ नहीं लगा है या जिनके हिस्से में कुछ भी नहीं आएगा, वे अपना गुस्सा और खुन्नस निकालने के लिए मतदान के दौरान इन्हीं निर्दलीयों के नाम पर मुहर लगा सकते हैं।
रवि आर्य








