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    Published On : Mon, Nov 16th, 2020
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    ‘देव’ से ‘दानव’ बने डाक्टर : गंगा केयर अस्पताल की लापरवाही से हुई मौत

    पत्रकार मोनाल थूल ने दर्ज करवाई शिकायत

    नागपुर. डाक्टर को भगवान का रूप माना जाता है, लेकिन इलाज के नाम पर जब सिर्फ लापरवाही ही मिलती है तो इन डाक्टरों को भगवान की जगह राक्षस कहने में कोई संकोच बाकी नहीं रहता है. मरीजों की सेवा के नाम पर बड़े-बड़े अस्पताल अब पैसा कमाने का जरिया बनते जा रहे हैं. ऐसा ही कुछ अनुभव आया ‘युवा करियर’ के संपादक मोनाल थूल को. संपादक मोनाल थूल ने सीताबर्डी थाने में दर्ज शिकायत में डाक्टरों पर अपने सेवा धर्म से मुंह मोड़ने और इलाज के नाम पर मोटी रकम हड़पने का आरोप लगाया है. पत्रकार मोनाल ने ४ नवंबर को फोन संभाषण पर अस्पताल प्रशासन से इलाज के दस्तावेज एवं उपचार मे लगे बिल मांगे तो इस संदर्भ मे बात पर अस्पताल के कर्मचारी गणेश पवार और मेनेजर सतीश टाटा मे इनकार करते हुये कहा के आपको वे बिलिंग दस्तावेज एवं आईपिडी पेपर आपको हम नही देगे, आपको हम पोलीस और मेडिकल मे दे चुके है और आपको चाहिये तो हम कोर्ट मे देगे.

    इस तरह के जवाब अस्पताल की और से दिया गया. पत्रकार मोनाल के पिता अरुण थूल के उपचार में गंगा केयर के डाक्टरों ने लापरवाही बरती जिसकी वजह से अरुण थूल को अपनी जान गंवानी पड़ी. मरीज की सेवा धर्म से मुंह मोड़नेवालों में डॉ. वरुण भार्गव (संचालक गंगा केयर हास्पिटल लि.), डॉ. अश्विन कुमार खांडेकर, डॉ. मीनल गुप्ता, डॉ. शंकर झंवर और डॉ. विपुल सेठ का समावेश है. डॉ. वरुण भागर्व को छोड़ शेष सभी डॉक्टर बतौर विशेषज्ञ अपनी सेवा दे रहे हैं. विशेषज्ञ डाक्टरों द्वारा इस तरह की हरकत तब काफी सोचनीय हो जाती है जब वह इलाज में लापरवाही करें.

    शिकायतकर्ता पत्रकार मोनाल थूल ने अपने पिता अरुण लक्ष्मणराव थूल जो वरिष्ठ लेखापाल, महालेखापाल कार्यालय (नागपुर) के सेवानिवृत्त कर्मचारी थे उन्हें खाना पच नहीं पाने की शिकायत पर 17 अक्टूबर 2020 को गंगा केयर हास्पिटल में भर्ती कराया था. इससे पहले वह कई जगह इलाज करवा चुके थे लेकिन उन्हें राहत नहीं पहुंची थी. लेकिन गंगा केयर हास्पिटल ने इलाज में इस कदर लापरवाही बरती कि 28 अक्टूबर को श्री अरुण थूल का देहांत हो गया. पहले तो अरुण थूल को नियमानुसार सेमी डीलक्स रूम नहीं दिया गया. उसके बाद उन्हें कोविड वार्ड के समीप ही वार्ड में भर्ती किया गया. बाद में भी इलाज के नाम पर सिर्फ पैसे वसूले गए. शिकायतकर्ता मोनाल थूल के अनुसार डाक्टरों की सलाह के अनुसार अरुण तूल को सिटी स्कैन और एक्सरे इत्यादि के लिए उनके वार्ड से अन्य विभागों में ले जाते वक्त भी किसी प्रकार की कोई सावधानी नहीं बरती गई. श्री अरुण थूल को एक्सरे के लिए कोविड-19 वार्ड के क्षेत्र मे एक्सरे के लीये जाया गया. मोनाल थूल जब भी इसका विरोध जताते तो पहले वहाके रूम बॉय (भाऊ) बादमे सिस्टर उनके बाद डाक्टर भी बड़े ही रूखे तरीके से ‘हम डाक्टर हैं, हमें सब पता है, तुम हमें मत समझाओ’ कह कर उन्हें चुप करवा देते.

    22 अक्टूबर 2020 तक अरुण थूल का खाना-पीना सही हो गया था लेकिन पेशाब में खून आने के कारण वह कमजोरी महसूस कर रहे थे. अरुण थूल की जीभ पर छाले आने के कारण उन्हें भोजन करने और पानी पीने में भी तकलीफ हो रही थी. जब इस संबंध में डॉ. अश्विन को अवगत कराया तो उन्होंने पेशाब में आनेवाले खून और मुंह में छालों के लिए ‘ एण्डोस्कोपी’ करने की बात कही और ‘ईएनटी’ डाक्टर से उपचार की बात कही. हालांकि डॉ. मीनल गुप्ता व डॉ. शंकर झंवर बार-बार बुलाने के बावजूद चेकअप के लिए नहीं आए. एण्डोस्कोपी के लिए कहा तो जवाब मिला कि एण्डोस्कोपी रूम में ले जाने के लिए रूम में स्ट्रेचर नहीं आ सकता और एण्डोस्कोपी विभाग का मॉनीटर खराब होने जैसे छोटे कारण बताकर अरुण थूल की एम्डोस्कोपी भी नहीं की गई.

    जब मोनाल ने अपने पिता की असहनीय तकलीफ के चलते अन्य विशेषज्ञ डाक्टरों से सलाह लेने के लिए डॉ. अश्विन खांडेकर से अनुमति मांगी तो डॉ. वरुण भार्गव व अश्विन खांडेकर दोनों ने ही कहा कि किसी विशेषज्ञ से सलाह लेने की कोई जरूरत नहीं है. मरीज को हो रही तकलीफ का इलाज हास्पिटल के डाक्टर ही कर सकते हैं. इसलिए किसी प्रकार की सैकंड ओपिनियन की जरूरत नहीं है. बड़ी ही मुश्किलों के बाद डॉ. अश्विन कांडेकर ने 26 अक्टूबर 2020 को न्यूरोलाजिस्ट, आर्थो, ईएनटी , कार्डियोलॉजिस्ट और गेस्ट्रो की जांच व उपचार के लिए रैफर करने के निर्देश दिए. इसके बावजूद डॉ. मीनल गुप्ता, डॉ. शंकर झंवर और डॉ. विपुल सेठ ने उपचार नहीं किया जिसके चलते श्री अरुण थूल को अपनी जान गंवानी पड़ी.

    मोनाल ने बताया कि 27 अक्टूबर 2020 से 28 अक्टूबर 2020 की दोपहर तक अरुण थूल का ब्लड प्रेशर कम हो गया था और शरीर में रक्त की कमी होने के बावजूद डाक्टरों ने किसी प्रकार का कोई इलाज नहीं किया. परिणामस्वरूप 28 अक्टूबर 2020 को रात्रि 10.55 पर अरुण थूल का निधन हो गया. मृत्यु से पहले आईसीयू इनचार्ज ने श्री अरुण थूल की जांच की और अपने वरिष्ठ डाक्टर (नाम नहीं मालूम) को बुलाया. इसके बाद उस अनाम डाक्टर ने अरुण थूल को मृत घोषित किया. उस अनाम डाक्टर ने कहा कि अरुण थूल को ‘हार्ट अटैक’ आया था और इसी कारण उनका निधन हुआ. दिनांक 17 अक्टूबर 2020 से 28 अक्टूबर 2020 तक 11 दिन हास्पिटल में भर्ती रहने के बावजूद श्री अरुण थूल की मौत हार्ट अटैक से होना संदेहास्पद है. इसे देखते हुए मोनाल थूल ने अपने पिता के पार्थिव का पोस्ट मार्टम करवाने की विनती की. मोनाल ने श्री अरुण थूल की डेथ समरी व एसएलसी मंगाई गई. जिसमें श्री अरुण थूल की मौत मल्टीपल आर्गन फेलियर के कारण निधन की बात सामने आई. मौत का कारण स्पष्ट होते ही मोनाल को लगा कि उनके पिता की मौत संदेहास्पद है.

    मोनाल ने कहा सीसीटीवी उगलेगा हास्पिटल की कारगुजारी डॉक्टरों का निकम्मापन और हास्पिटल की लापरवाही जानने के लिए पुलिस को अपनी जांच में गंगा केअर हास्पिटल नागपुर के सीसीटीवी फुटेज जब्त करने चाहिए. इन फुटेज में 11 दिनों तक दोनों हास्पिटल ने जो नाटक किया वह दर्ज है. इसके द्वारा स्टाफ की बदगुमानी और बदतमीजी सामने आएगी. इन्हीं फुटेज में छिपी है डॉक्टरों के डाकू बनने की गाथा जिसे पुलिस को ढूंढ निकालना है. पुलिस के सामने डाक्टर अपनी सफाई पेश करेंगे लेकिन इन फुटेज को वह झुठला नहीं सकेंगे. ऐसे में पुलिस को सबसे पहले इन फुटेज को जब्त करना चाहिए ताकि पीड़ित को न्याय मिल सके. इन सीसीटीवी फुटेज से पुलिस को न सिर्फ श्री अरुण थूल व उनके परिवार के साथ की गई बदमाशी पता चलेगी बल्कि हॉस्पिटल में अन्य कोविड और नॉन कोविड के साथ की जा रही कारगुजारी भी मालूम चल सकेगी. इन फुटेज से पुलिस को वो सबकुछ मिलेगा जिससे पुलिस गंगा केयर हॉस्पिटल के काले कारनामे उजागर कर सके.

    मोनाल ने थाने में दर्ज अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि अरुण थूल को पेशाब में रक्त आने की समस्या कैथेटर लगाने के बाद शुरू हुई, उन्हें भर्ती किए जाने से पूर्व व पोस्टमार्टम करने से पहले कोविड टेस्ट भी करवाया गया जिसकी रिपोर्ट निगेटिव आई थी. उपचार के दौरान मुंह में छाले दिनोदिन बढ़ रहे थे. एण्डोस्कोपी, ईएनटी व कार्डियोलाजिस्ट उपलब्ध होने के बावजूद अक्षम्य लापरवाही के चलते अरुण थूल के उपचार में कोताही बरती गई. 11 दिनों कर सिर्फ बिल बनाने के उद्देश्य से अरुण थूल को भर्ती किया गया. हास्पिटल के स्टाफ ने किसी भी प्रकार की शिकायत पर ध्यान नहीं देते हुए मोनाल को वार्ड से बाहर कर दिया. इतनी परेशानियों और अपमान को मोनाल थूल ने सिर्फ इसलिए सहन किया ताकि उनके पिता का इलाज उचित तरीके से हो सके. डाक्टर और उसके इलाज के बीच में कोई व्यवधान नहीं हो इसलिए मोनाल थूल खून का घूंट पीकर चुपचाप रहे. परंतु इतना सबकुछ सहने के बावजूद भी अरुण थूल को नामांकित हास्पिटल में समय पर उपचार नहीं मिला और उनका दुखद निधन हो गया

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