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    Published On : Wed, May 26th, 2021

    णमोकार महामंत्र से संकट दूर होते हैं- आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी

    नागपुर : णमोकार महामंत्र से संकट दूर होते हैं यह उदबोधन वात्सल्य सिंधु दिगंबर जैनाचार्य गुप्तिनंदीजी गुरुदेव ने विश्व शांति अमृत ऋषभोत्सव के अंतर्गत श्री. धर्मराजश्री तपोभूमि दिगंबर जैन ट्रस्ट और धर्मतीर्थ विकास समिति द्वारा आयोजित ऑनलाइन धर्मसभा में दिया.

    गुरुदेव ने धर्मसभा में कहा णमोकार महामंत्र से 84 लाख मंत्र की उत्पत्ति हुई हैं. आज णमोकार महामंत्र हैं और जैन लोग मृत हो रहे हैं तो कही न कही श्रद्धा की कमी हैं, जहां श्रद्धा कम पड़ती हैं वहां मंत्र काम नहीं करता. णमोकार महामंत्र में बहुत बड़ी ताकत हैं, जिन आराधना में बहुत बड़ी ताकत हैं. श्रद्धा, समर्पण लगाए आपको बहुत कुछ मिलेगा. णमोकार महामंत्र से संकट दूर होते हैं.

    भक्ति से मुक्ति प्राप्त होती हैं- क्षुल्लक डॉ. योगभूषणजी

    धर्मसभा में क्षुल्लक डॉ. योगभूषणजी ने कहा प्रभु की भक्ति हमारे मन को, हमारे अंतरंग को, हमारे चेतना को सशक्त बनाती हैं. चेतना सशक्तिकरण कार्य प्रज्ञायोगी आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी गुरुदेव कर रहे हैं. कोरोना महामारी के संकट के काल को उत्सव बना दिया हैं. भक्ति से मुक्ति की प्राप्ति होती हैं. संकट से जूझ रहे हैं, वर्तमान में जिन बीमारियों से त्रस्त हैं इससे छूटने का कारगर उपाय हैं तो प्रभु की भक्ति हैं. चिकित्सा विधि काम करेगी, औषधी काम करेगी जब पुण्य का उदय हो तब काम करेगी यह सब खेल पाप पुण्य का हैं. व्यक्ति तब बीमार पडता हैं उसके असाता कर्म का उदय रहता हैं, स्वस्थ जब रहता हैं उसके पुण्य कर्म का उदय रहता हैं. असाता कर्म के उदय से अच्छे अच्छे लोग बीमार पड़ जाते हैं. भक्ति करने के लिए, कर्म करने के लिए प्रभु की आराधना करने के लिए हमें निरोगता का रहना जरूरी हैं. शरीर अस्वस्थ हैं, शरीर बीमार हैं हम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाते. जीवन को सत्य, आनंदमय बनाना चाहते हैं तो बीमारी से मुक्त होना चाहते हैं उसके लिए सबसे बढ़िया उपाय हैं वैयावृत्ति, हम बीमारी से मुक्ति चाहते हैं, निरोगी शरीर चाहते हैं तो हमें साधुओं की वैयावृत्ति करनी चाहिए. साधु के आहार विहार की व्यवस्था करना वैयावृत्ति हैं. जिनके मन सहज हैं, शांत हैं उनके कोई बीमारी पैदा नहीं होती. वैयावृत्ति के सदाचार होना बहुत जरूरी हैं. हमारा जीवन कुटिलता से रहित होना चाहिए, विकल्पों से रहित होना चाहिए. मन में व्याकुलता रखते हैं तो मन अशांत रहता हैं. कोई भी बीमारी पहले मन को पकड़ती हैं, बाद में तन को पकड़ती हैं. कोरोना महामारी से लोग कम मृत हुए लेकिन डर से ज्यादा मृत हुए हैं. कभी अपने मन को निराश मत करना, कभी अपने मन को दुखी मत करना, कभी अपने मन को निराश मत करना. मन को स्वस्थ रखने का माध्यम हैं प्रभु की भक्ति. मंत्र विज्ञान, मंत्र साधना, मन की रक्षा करे वह मंत्र हैं, मन को साधने का कोई उपाय हैं तो मंत्र साधना हैं. किसी भी भक्ति के कार्य से जुड़ते हैं तो मन सशक्त बनता हैं. बीमारी से मुक्त रहना हैं तो पाप से मुक्त रहो. तपस्या से निर्जरा होती हैं. जो तपता हैं वह गिरता नहीं हैं. जो बाहर तपो की साधना करता हैं वह कभी बीमार नहीं पड़ता. धर्मसभा का संचालन स्वरकोकिला गणिनी आर्यिका आस्थाश्री माताजी ने किया. धर्मतीर्थ विकास समिति के प्रवक्ता नितिन नखाते ने बताया गुरुवार 27 मई को सुबह 7:20 बजे शांतिधारा, सुबह 9 बजे आचार्यश्री अनुभवसागरजी गुरुदेव का उदबोधन होगा. शाम 7:30 बजे से परमानंद यात्रा, चालीसा, भक्तामर पाठ, महाशांतिधारा का उच्चारण एवं रहस्योद्घाटन, 48 ऋद्धि-विद्या-सिद्धि मंत्रानुष्ठान, महामृत्युंजय जाप, आरती ऑनलाइन होगी.

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