
नागपुर – डॉक्टर से विवाद के एक मामले में दोषसिद्ध ठहराए गए पांच आरोपियों को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने राहत दी है। शिकायतकर्ता डॉक्टर और आरोपियों के बीच स्वेच्छा से समझौता होने तथा मामले के अपराध गंभीर अथवा जघन्य श्रेणी में नहीं आने के आधार पर हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि और उसके बाद के अपीलीय फैसले को रद्द कर दिया। न्यायमूर्ति मेहरोज पठान ने यह आदेश सुनाया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को दोषी ठहराए जाने के बाद भी, यदि उस दोषसिद्धि के खिलाफ अपील या पुनरीक्षण जैसी कानूनी कार्यवाही लंबित है और पीड़ित पक्ष स्वेच्छा से समझौता करता है, तो उपयुक्त मामलों में न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर सकता है। हालांकि, ऐसी शक्ति का इस्तेमाल प्रत्येक मामले के तथ्यों और अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए सावधानी से किया जाना आवश्यक है।
2016 में सुनाई गई थी तीन साल की सजा
मामला हिंगणघाट न्यायालय से जुड़ा है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, हिंगणघाट ने 26 फरवरी 2016 को नितिन उर्फ बंटी जांगले, कुनाल जावड़े, सुभाष सोयाम, विकास उर्फ विक्की मुनेश्वर और अनिल मून सहित आरोपियों को विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। न्यायालय ने आरोपियों को तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी।
मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 143, 147, 452, 448, 294, 323, 506 के साथ धारा 149 तथा महाराष्ट्र मेडिकेयर सेवा संस्थान अधिनियम की धारा 4 के तहत आरोप शामिल थे।
सत्र अदालत ने भी बरकरार रखी थी दोषसिद्धि
निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आरोपियों ने सत्र न्यायालय में अपील दायर की थी। सुनवाई के बाद सत्र अदालत ने उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा, हालांकि सजा को घटाकर एक वर्ष के सश्रम कारावास कर दिया। साथ ही प्रत्येक आरोपी पर 5 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया।
सत्र अदालत के इस फैसले से असंतुष्ट आरोपियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ का रुख किया और पुनरीक्षण आवेदन दायर किए।
डॉक्टर ने कहा- समझौता पूरी तरह स्वेच्छा से किया
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता डॉक्टर और आरोपियों के बीच हुए समझौते को न्यायालय के समक्ष रखा गया। डॉक्टर ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने किसी दबाव या मजबूरी के बिना अपनी इच्छा से समझौता किया है। उन्होंने कहा कि वह पुराने विवाद को हमेशा के लिए समाप्त कर शांतिपूर्वक आगे बढ़ना चाहते हैं। समझौते के लिए उनकी ओर से कोई शर्त भी नहीं रखी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी हवाला
हाईकोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के रामावतार मामले में दिए गए फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि दोषसिद्धि के बाद समझौते के आधार पर कार्यवाही समाप्त करने की शक्ति का इस्तेमाल बेहद सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए।
न्यायालय को अपराध की प्रकृति, चोट या घटना की गंभीरता, पक्षकारों के बीच समझौता स्वैच्छिक है या नहीं तथा आरोपियों के आचरण जैसे विभिन्न पहलुओं पर विचार करना होता है। इसके साथ ही ऐसी शक्ति का इस्तेमाल उस स्थिति में किया जा सकता है, जब दोषसिद्धि के खिलाफ अपील या अन्य वैधानिक उपाय न्यायालय के समक्ष लंबित हो।
पांचों आरोपियों की दोषसिद्धि और अपीलीय आदेश रद्द
मामले के तथ्यों और पक्षकारों के बीच हुए समझौते को देखते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि समझौता स्वेच्छा से किया गया है और संबंधित अपराध गंभीर अथवा जघन्य अपराधों की श्रेणी में नहीं आते। इसके बाद हाईकोर्ट ने अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए वर्ष 2016 में हुई दोषसिद्धि तथा वर्ष 2022 में सत्र अदालत द्वारा दिए गए अपीलीय फैसले को रद्द कर दिया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने राहत को एक शर्त से जोड़ा है। आदेश के अनुसार प्रत्येक आरोपी को 10 हजार रुपये हाईकोर्ट विधिक सहायता उपसमिति में जमा करने होंगे। यह राशि दो सप्ताह के भीतर जमा करनी होगी। आदेश के अनुपालन को लेकर मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर को होगी।




