Published On : Thu, Sep 18th, 2014

वाशिम : एमआईडीसी का फलक तो है, पर उद्योग नहीं

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तीस साल पहले खुला था ग्रोथ सेंटर, पर ग्रोथ नहीं हो पाई

विनायक उज्जैनकर

वाशिम । करीब तीस साल पहले वाशिम और वाशिम के आसपास के व्यावसायिकों के उद्योग-धंधों को बढ़ाने के उद्देश्य से हिंगोली मार्ग पर एम. आई. डी. सी. के एक ग्रोथ सेंटर की स्थापना की गई थी. वहां एक फलक भी लगाया गया था. आज तीस साल बाद भी यह फलक जैसा का वैसा खड़ा है, लेकिन इन सालों में यहां एक भी उद्योग नहीं खुल सका है. खुलता भी कैसे. न बिजली, न पानी और न ही संचार की कोई सुविधा यहां उपलब्ध कराई गई है.

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तीस साल में बस 12 प्लॉट
तीस साल पहले कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में यहां के लोगों ने गुलाम नबी आजाद को चुनकर दिया था. आजाद ने वाशिम के विकास के मद्देनजर यहां एक ग्रोथ सेंटर मंजूर करवा दिया. इस एमआईडीसी में इंडस्ट्रियल प्लॉट की दर 50 रुपए प्रति वर्ग मीटर, रेसीडेंशियल प्लॉट की दर 75 रुपए प्रति वर्ग मीटर और कमर्शियल प्लॉट की दर 100 रुपए प्रति वर्ग मीटर है. अब तक केवल 12 प्लॉट का ही आबंटन किया जा सका है. हालांकि प्लॉट की मांग के लिए 26 आवेदन आए हैं, मगर अब लालफीताशाही में अटके पड़े हैं. उद्यमी यहां कोई उद्योग लगाना ही नहीं चाहते, क्योंकि यहां पर बिजली, पानी और संचार की कोई सुविधा आज तीस साल बाद भी उपलब्ध नहीं थी.

संचार, बिजली तो ठीक; पर पानी का क्या
संचार की समस्या अकोला-पूर्णा रेल मार्ग के ब्रॉडगेज में परिवर्तित होने के बाद कुछ हद तक दूर हो गई है. बिजली वितरण कंपनी ने अब जाकर यहां पर एक पावर स्टेशन भी खोल दिया है. इससे बिजली की समस्या भी शीघ्र दूर होने वाली है. रही बात पानी की तो उसकी कमी अभी भी एमआईडीसी को है ही. एजबुर्जी परियोजना सालों पहले बनी थी, जो वाशिम को पानी पिलाती थी. सिंचाई के लिए भी पानी देती थी. मगर अब वाशिम की आबादी कई गुना बढ़ गई है. अब हालत यह है कि सिंचाई को पानी दो तो पीने को पानी नहीं मिलता और पीने को पानी दो तो सिंचाई को पानी नहीं मिलता. ऐसे में एमआईडीसी को पानी कहां से मिलेगा.

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बढ़ती बेरोजगारी
ऐसे में शहर की बेरोजगारी कैसे दूर होगी. वाशिम सोयाबीन के लिए मशहूर है और उसे गोल्ड सेक्टर कहा जाता है. सोयाबीन पर आधारित प्रक्रिया उद्योग यहां की बेरोजगारी दूर करने की क्षमता रखते हैं. मगर लाख टके का सवाल यही है कि यह सब करेगा कौन ?

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