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Published On : Wed, Oct 16th, 2019

जिले में भाजपा ९ तो कांग्रेस-एनसीपी ३ पर बढ़त

– विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र पहले सप्ताह के अंत में पक्ष-उम्मीदवार निहाय समीक्षा

नागपुर: राज्य में विधानसभा चुनाव शुरू हैं.इस क्रम में नागपुर जिले में कुल १२ विधानसभा क्षेत्र हैं.नागपुर टुडे ने चुनाव के मद्देनज़र चुनावी जंग में भाग ले रहे पक्ष-उम्मीदवार निहाय समीक्षा की.जिसमें अति आत्मविश्वासी भाजपा को पिछले चुनाव के बनस्पत २ सीटों का नुकसान तो कांग्रेस-एनसीपी को २ सीटों की कम से कम बढ़त नज़र आ रही हैं.सत्तापक्ष भाजपा को १२ विस क्षेत्रों में से शहर में कम से कम १ और ग्रामीण में कम से कम २ विस में हार का सामना करना पड़ सकता हैं.रामटेक विस क्षेत्र में मुकाबला तिकोना होने के आसार नज़र आ रहे,फ़िलहाल निर्दलीय जैस्वाल का पलड़ा भारी दिख रहा. पूर्व,पश्चिम,मध्य,दक्षिण-पश्चिम,कामठी,उमरेड में भाजपा अग्रणी,हिंगणा ,दक्षिण,रामटेक में भाजपा को मिल रहा स्पर्धा तो दूसरी ओर सावनेर व उत्तर नागपुर में कांग्रेस और काटोल में एनसीपी को बढ़त देखी जा रही.

पूर्व नागपुर

इस विधानसभा में भाजपा उम्मीदवार कृष्णा खोपड़े को कांग्रेस ने सरल विजयी बना दिया।इस तरह खोपड़े तीसरी बार विधानसभा में बड़े आसानी से पहुँच जायेंगे। कांग्रेस उम्मीदवार पुरुषोत्तम हज़ारे क्यूंकि वे नगरसेवक भी हैं,वे अपने प्रभाग तक सिमित हैं.उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि और अवैध धंधों को भाजपा अपने प्रचार-प्रसार में हथियार बनाए हुए हैं.हज़ारे के आका सतीश चतुर्वेदी जेम-तेम पक्ष में वापिस लिए गए। वे दावा कर रहे कि उन्होंने हज़ारे को कांग्रेस उम्मीदवार बनाने में अहम् भूमिका निभाई,जो कि असत्य हैं.चतुर्वेदी खुले तौर पर हज़ारे के लिए दिख रहे लेकिन तन-मन-धन मामले में खुद को सिकोड़ रखा हैं.कांग्रेस का पूर्व में संगठन भी नहीं।उम्मीदवारी के दावेदार वंजारी,लोंडे,अग्निहोत्री कांग्रेस उम्मीदवार से पूर्णतः दुरी बनाए हुए हैं.

दूसरी तरफ खोपड़े पिछले १० साल से इसी क्षेत्र के विधायक हैं.भाजपा की पेज प्रमुख से लेकर विधानसभा क्षेत्रीय संगठन सक्रिय हैं.इसलिए यह चुनाव पिछले २ चुनाव के बनस्पत खोपड़े को काफी आसान साबित हो रही हैं.

पश्चिम नागपुर

यह विधानसभा क्षेत्र कुनबी और उत्तर भारतीय हिंदी भाषी बहुल हैं.इस क्षेत्र में भाजपा व कांग्रेस ने कुनबी उम्मीदवार उतारा हैं.इस क्षेत्र से २ बार मुख्यमंत्री विधायक रह चुके हैं.भाजपा उम्मीदवार को तीसरी बार पुनः उम्मीदवारी देने का पुरजोर विरोध के बावजूद भाजपा नेतृत्व ने न सिर्फ सुधाकर देशमुख को उम्मीदवार बनाया बल्कि अन्य दावेदारों के साथ न्याय करने का ठोस आश्वासन भी दिया।

भाजपाई देशमुख पिछले २ टर्म में किसी भी विवाद में नहीं रहे,इसे आधार बनाकर कांग्रेस उम्मीदवार विकास ठाकरे को चुन कर देने से होने वाले नुकसान गिनवाए जा रहे.उत्तर भारतीय हिंदी भाषी समुदाय दोनों पक्षों से हिंदी भाषी उम्मीदवार बनाए जाने की मांग कर रहे थे लेकिन जब मतदान करने की बारी आती हैं तो उच्च व ओबीसी हिन्दीभाषी भाजपा के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। कांग्रेस की गुटबाजी के कारण कांग्रेस के तथाकथित बड़े स्थानीय नेता इस क्षेत्र में ठाकरे को साथ देने से कन्नी काट रहे.क्षेत्र के मतदाताओं का एक तबका बदलाव के मूड में दिख रहा। कुल मिलाकर यहीं आलम रहा तो देशमुख ‘प्लस ‘ में नज़र आ रहे.

पश्चिम नागपुर में कांग्रेस उम्मीदवार विकास ठाकरे को भाजपा के नाराज प्रभाग स्तर के पक्षीय और चयनित पदाधिकारियों और उनके करीबी कार्यकर्ताओं के घर बैठने व चुनावी समय मे पलायन करने का फायदा मिलेंगा। इसके साथ ही सम्पूर्ण चुनावी समय में विवादास्पद छवि के करीबियों से तत्काल दूरियां बनाने से जनता का झुकाव-समर्थन मिलेंगा। वहीं पिछले 10 साल विस क्षेत्र से अप्रत्यक्ष रूप से दूरी बनाने व हर बार सभी से वादाखिलाफी करने वाले भाजपा उम्मीदवार को जनमत इस दफे घर बैठने का कोई कसर नहीं छोड़ेंगी। कुल मिला कर जिले में सबसे ज्यादा खर्चिला चुनाव कांग्रेस के इस उम्मीदवार ने लड़ रहा,ऐसी ही चर्चा गर्म हैं।

उत्तर नागपुर

इस विधानसभा क्षेत्र में बसपा उम्मीदवार के इर्द-गिर्द चुनाव का परिणाम परिक्रमा कर रहा हैं.भाजपा उम्मीदवार डॉक्टर मिलिंद माने सिर्फ सक्षम संगठन के भरोसे पुनः मैदान में नज़र आ रहे.तो पिछले ५ साल में किये गए विकासकार्यों की अपेक्षा पूर्व विधायक डॉक्टर नितिन राऊत ( कांग्रेस ) के कार्यकाल में विकसित उत्तर नागपुर की तुलना की जा रही.इस बार पुनः कांग्रेस ने राऊत को उम्मीदवार बनाया हैं.इसलिए पहले सप्ताह में राऊत के पक्ष में हवा हैं.चुनाव प्रबंधन मामले में कांग्रेस से कहीं ज्यादा सक्षम भाजपा का हैं.भाजपा का संगठन भी मुस्तैद हैं.

नागपुर टुडे सर्वे के अनुसार उत्तर नागपुर की बफर ज़ोन ( बीचोबीच के क्षेत्र में ) राऊत की मजबूत पकड़ तो बाहरी उत्तर नागपुर में भाजपा उम्मीदवार की पकड़ सख्त हैं.अब सवाल छवि,विकास के प्रति रुझान के मामले में भाजपा उम्मीदवार माने पीछे चल रहे हैं.वहीं दूसरी ओर बसपा उम्मीदवार ने जितना ज्यादा मत अपने पक्ष में किया ,उतना कांग्रेस उम्मीदवार राऊत के लिए नुकसानदायक साबित होंगा। वर्त्तमान में चल रही हवा कायम रही तो कांग्रेस इस क्षेत्र से पहले क्रमांक पर दिख सकती हैं.

दक्षिण नागपुर

जिले की एकमात्र सीट जहाँ कांटे की स्पर्धा कांग्रेस व भाजपा उम्मीदवारों के मध्य चल रही और अंतिम समय तक स्पर्धा बनी रहेंगी।जिसे हवा शिवसेना के बागी उम्मीदवार किशोर कुमेरिया,भाजपा के बागी उम्मीदवार सतीश होले और कांग्रेस से उम्मीदवारी के लिए अंतिम समय तक प्रयासरत रहे प्रमोद मनमोड़े ,जब इन्हें नहीं मिला तो निर्दलीय चुनावी जंग में कूद गए.

भाजपा उम्मीदवार मोहन मते की १५ साल बाद पुनः भाजपा राजनीत में एंट्री हुई.इनके उम्मीदवारी का विरोध कोहले,भोयर,शिंगारे कर रहे तो समर्थन में सेना व तेली समाज में अपना प्रभुत्व रखने वाले सावरबांधें सह तेली समाज के एक वरिष्ठ कांग्रेसी नगरसेवक पूर्ण साथ दे रहे.वहीं दूसरी ओर कांग्रेस उम्मीदवार गिरीश पांडव से शहर के सभी तथाकथित दिग्गज कांग्रेस नेताओं ने दुरी बना रखी,पिछले चुनाव कांग्रेस कोटे लड़ चुके चतुर्वेदी तो आजतक क्षेत्र में भटके ही नहीं। पांडव को साफ़-सुथरी छवि के कारण युवा वर्ग का साथ मिल रहा.भाजपा उम्मीदवार को कुमेरिया -होले लगभग १५ हज़ार तो कांग्रेस उम्मीदवार को मानमोड़े १० हज़ार मतों का नुकसान पहुंचाएंगे.अर्थात दोनों उम्मीदवारों को बराबरी का नुकसान होने वाला हैं,इसलिए संगठन मजबूत होने के कारण भी अंतिम समय तक स्पर्धा बनी रहेंगी,और बाजी के करीब मते नज़र आ रहे.

मध्य नागपुर

मध्य नागपुर में ओबीसी के बाद हलबा और हिंदी भाषी समुदाय बराबरी में हैं.इसके बाद मुस्लिम और अनुसूचित जाति के नागरिक सह मतदाता निवास करते हैं.इस चुनाव में भाजपा ने पुनः हलबा समाज को उम्मीदवारी दी.अर्थात विकास कुंभारे को लगातार तीसरी बार उम्मीदवार बनाया,पिछले २ टर्म से विकास विधायक हैं.इनका भी पुरजोर विरोध हुआ और ओबीसी उम्मीदवार देने हेतु भाजपा नेतृत्व पर दबाव बनाया गया.लेकिन आजतक हलबा समाज का मसला नहीं सुलझाया गया और एकमात्र हलबा विधायक का टिकट काटने का भाजपा जोखिम नहीं उठा पाई इसलिए ओबीसी समुदाय के विरोध के बावजूद कुम्भारे को ही उम्मीदवारी दी गई.यह भी सत्य हैं कि ओबीसी समुदाय से उम्मीदवारी न दिए जाने से खफा समर्थक आजतक भाजपा पक्ष में सक्रिय नहीं हुए.समुदाय व परंपरागत मतों के हिसाब से भाजपा उम्मीदवार ६० हज़ार समाज के और कांग्रेस उम्मीदवार को ३० हज़ार मुस्लिम समुदाय के मत मिलना तय हैं अर्थात यहीं से इनकी शुरुआत होंगी।इस क्षेत्र के हिन्दीभाषी मतदाता १ लाख के आसपास हैं,वे जिधर रुख करेंगे,पलड़ा उनका ही भारी होगा।फ़िलहाल भाजपाई जीत के प्रति सकारात्मक तो कांग्रेस उम्मीदवार के प्रति नगरसेवकों,पूर्व नगरसेवकों,कोंग्रेसियों में नाराजगी को नज़रअंदाज कर कांग्रेस उम्मीदवार अपने उद्द्येश्पुर्ति हेतु सक्रिय हैं.

मध्य नागपुर का कांग्रेसी उम्मीदवार बंटी शेलके को बुजुर्गों,पक्ष के वरिष्ठ नगरसेवकों ,पूर्व नगरसेवकों से दूरियां बनाने का हर्जाना भुगतना पड़ सकता हैं। इस चुनाव में वे ऐसे उम्मीदवार होंगे जो हार के भी आर्थिक मामले में काफी सबल हो जाएंगे ताकि भविष्य में पूर्ण समय राजनीति में दे तो तंगी से पिछड़ न जाए।

दक्षिण-पश्चिम

इस चुनाव क्षेत्र से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पुनः बतौर भाजपा उम्मीदवार हैं.इनके विपरीत कांग्रेस ने आशीष देशमुख को उम्मीदवार बनाया। इनके मध्य चुनाव सिर्फ रोचक रहेंगा,जहाँ तक अंकगणित का सवाल हैं मुख्यमंत्री सुरक्षित हैं.समाज निहाय कांग्रेस उम्मीदवार मुख्यमंत्री से दोगुणा की संख्या में हैं लेकिन भाजपा उम्मीदवार देवेंद्र फडणवीस,बतौर मुख्यमंत्री,भाजपा संगठन और पिछले ५ वर्षों में विकासकार्यों की तुलना में कांग्रेस उम्मीदवार काफी पीछे हैं.वहीं कांग्रेस उम्मीदवार को स्थानीय कोंग्रेसियों की व्यक्तिगत अंदरूनी निष्क्रियता से होने वाले नुकसान की मार झेलनी होंगी,जिसका उन्हें पूर्व से ही अंदाजा हैं.

सावनेर विधानसभा

सावनेर विधानसभा से पुनः प्रस्थापित कांग्रेस विधायक सुनील केदार को उम्मीदवार बनाया गया,पिछले विस चुनाव में जिले से कांग्रेस की इन्होंने ही जीत दर्ज कर लाज बचाई थी.इस बार इनका सामना भाजपा उम्मीदवार डॉक्टर राजीव पोतदार से हैं.सावनेर विधानसभा चुनाव शुरुआत से ही जातिगत समीकरण के आधार पर होता रहा हैं.इस क्षेत्र धनुज कुनबी बहुल हैं और कांग्रेस उम्मीदवार भी इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं.भाजपा उम्मीदवार पोतदार ब्राम्हण समाज से हैं,इनकी जनसंख्या अल्प हैं लेकिन इनके पास भाजपा का प्रभावी संगठन हैं.पिछले २ विधानसभा चुनाव भांति यह चुनाव भी आखिर ( अंतिम ५ बूथों के मतों की गिनती ) तक रोचक रहेंगा। दोनों उम्मीदवारों की छवि और इर्द-गिर्द के वातावरण का चुनाव परिणाम पर दिखेंगा .सावनेर विस में कांग्रेस अस्तित्व ही नहीं ,यहाँ केदार ही कांग्रेस हैं, लेकिन जातिगत अंकगणित के अनुसार कांग्रेस उम्मीदवार ही करीब नज़र आ रहा हैं।

काटोल विधानसभा

काटोल विधानसभा क्षेत्र में एनसीपी का अपना कोई अस्तित्व नहीं,यहाँ के एनसीपी उम्मीदवार अनिल देशमुख ही एनसीपी हैं.क्यूंकि राज्य में एनसीपी व कांग्रेस का गठबंधन हुआ,जिसके तहत नागपुर ग्रामीण की हिंगणा व काटोल विधानसभा क्षेत्र एनसीपी के खाते में हैं.एनसीपी उम्मीदवार देशमुख का सीधा मुकाबला भाजपा के चरणसिंह ठाकुर से हैं.ठाकुर की उम्मीदवारी आवेदन भरने के अंतिम समय पर घोषित की गई.चर्चा थी कि इस क्षेत्र से राज्य के ऊर्जा मंत्री बावनकुले को पार्टी उतारने पर विचार कर रही थी,लेकिन अंततः ठाकुर को भाजपा ने वक़्त पर सबसे बड़ा स्थानीय दावेदार के रूप में उम्मीदवारी दी.यहाँ ठाकुर बनाम देशमुख के मध्य मुकाबला होने वाली हैं.यह सम्पूर्ण विधानसभा क्षेत्र कुनबी बहुल हैं.देशमुख ने बतौर निर्दलीय व एनसीपी उम्मीदवार तीन दफे क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.काटोल के शहरी भाग में ठाकुर तो ग्रामीण सह बाहरी भाग में देशमुख का प्रभाव देखने लायक हैं.आज की सूरत में एनसीपी उम्मीदवार की विधानसभा में पुनः वापसी के आसार नज़र आ रहे.

हिंगणा विधानसभा

यह विधानसभा क्षेत्र भी काटोल की तर्ज पर एनसीपी बनाम भाजपा में सीधा मुकाबला हैं.पिछले चुनाव में तत्कालीन भाजपा विधायक विजय घोड़मारे की टिकट काटकर समीर मेघे को उम्मीदारी दी गई थी.जिसमें मेघे ने एनसीपी के रमेश बंग को शिकस्त दी थी.यह चुनाव मराठी भाषी बनाम हिंदी भाषी हो गया था.इस दफे घोड़मारे ने चुनाव से ठीक पहले एनसीपी में प्रवेश कर उम्मीदवारी हासिल की ,तो भाजपा ने पुनः समीर मेघे को उम्मीदवारी दी.घोड़मारे व मेघे दोनों कुनबी हैं.लेकिन घोड़मारे तिरले तो मेघे धनुज कुनबी हैं.सम्पूर्ण विस क्षेत्र में धनुज कुनबी के बनस्पत तिरले कुनबी निर्णायक संख्या में हैं.जातिगत मतदान हुई तो भाजपा उम्मीदवार अड़चन में आ सकता हैं.घोड़मारे को को बंग समर्थक तो मेघे को वाड़ी के पूर्व नगराध्यक्ष झाड़े की नाराजगी चुनाव में प्रभावी भूमिका निभाते नज़र आ सकती हैं.

उमरेड विधानसभा

उमरेड विधानसभा क्षेत्र में भाजपा से तीसरी बार लड़ रहे सुधीर पारवे ( लगातार २ बार विधायक रह चुके हैं ) का मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार राजू पारवे से हैं.राजू पारवे का उमरेड शहर तो सुधीर पारवे का ग्रामीण में पकड़ मजबूत हैं.इस चुनावी क्षेत्र में भाजपा को बड़ी मेहनत की दरकार महसूस नहीं हो रही.

उमरेड कांग्रेस मूलक परिवार का गढ़ रहा,इस विस क्षेत्र में कांग्रेस की नैय्या पर के लिए पूर्वतः मूलक परिवार के नेतृत्वकर्ता राजेन्द्र मूलक को पूर्ण ताकत झोंकनी होंगी। मूलक जिला कांग्रेसाध्यक्ष भी हैं और उनके पास इस चुनाव में शक्तिप्रदर्शन के लिए एकमात्र जगह भी हैं, जिससे उनके राजनैतिक भविष्य को सकारात्मक बल मिलेंगा।

कामठी विधानसभा

कामठी-मौदा-कोराडी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा ने प्रस्थापित भाजपा उम्मीदवार चंद्रशेखर बावनकुले को घर बैठाकर कर इस दफे उनके ही जुझारू कार्यकर्ता टेकचंद सावरकर को मैदान में उतारा तो उनके खिलाफ कांग्रेस ने कुनबी समुदाय से सुरेश भोयर को मैदान में उतारा।

सावरकर की नैय्या पार करवाने का दारोमदार बावनकुले पर सौंपा गया.वहीं कांग्रेस उम्मीदवार ऊर्जावान न होने से क्षेत्र के कांग्रेस संभ्रम में हैं.संगठन क्षमता और बावनकुले प्रभाव के साथ बरिएमं का साथ सावरकर का विधानसभा में प्रवेश का मार्ग प्रसस्त कर रही हैं.इसके साथ ही बावनकुले को पक्ष का महत्वपूर्ण जिम्मा/प्रभावी महामंडल का मुखिया बनाकर राजनैतिक रूप से सक्रिय रखने का आश्वासन दिए जाने की जानकारी मिली हैं.वही कांग्रेस उम्मीदवार को कामठी के मुस्लिम समुदाय का परंपरागत मतों से शुरुआत करनी होंगी।

रामटेक विधानसभा

रामटेक विधानसभा में तिकोना मुकाबला नज़र आ रहा.इस क्षेत्र से भाजपा ने वर्त्तमान विधायक मल्लिकार्जुन रेड्डी तो कांग्रेस ने नए नवेले गज्जू यादव को खड़ा किया।क्यूंकि शिवसेना को पहली दफे जिले में एक भी सीट नहीं दी गई इसलिए शिवसेना के पूर्व विधायक आशीष जैस्वाल ने बागी उम्मीदवार के रूप में चुनावी जंग में कूद कर मुकाबला तिकोना बना दिया। निर्दलीय जैस्वाल के साथ सर्वपक्षीय समर्थकों के साथ ही साथ सम्पूर्ण शिवसेना खड़ी हैं.भाजपा उम्मीदवार रेड्डी के साथ देवलापार के आदिवासी समुदाय व भाजपा संगठन होने से दोनों के मध्य ही सीधा मुकाबला नज़र आ रहा.कांग्रेस उम्मीदवार पक्ष अंतर्गत गुटबाजी,बगावती तेवर का शिकार हो रही हैं.इस तिकोना मुकाबले का परिणाम भाजपा या फिर निर्दलीय हो सकता हैं.

राजीव रंजन कुशवाहा ( rajeev.nagpurtoday@gmail.com )

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