नागपुर टुडे – नागपुर संभाग के इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रवेश प्रक्रिया से जुड़ा एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। भाषाई अल्पसंख्यक कोटे के तहत दाखिला लेने वाले करीब 320 विद्यार्थियों के प्रवेश पर महाराष्ट्र प्रवेश नियामक प्राधिकरण (ARA) ने बड़ा फैसला लिया है। जांच के दौरान इन विद्यार्थियों द्वारा हिंदी भाषाई अल्पसंख्यक होने के दावे को साबित करने के लिए पेश किए गए दस्तावेजों में कई तरह की विसंगतियां सामने आईं। इसके बाद एआरए ने इन प्रवेशों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया।
मामला नागपुर संभाग के छह इंजीनियरिंग कॉलेजों से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि कुछ विद्यार्थियों ने भाषाई अल्पसंख्यक कोटे का लाभ हासिल करने के लिए ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत किए, जिनमें उनकी मातृभाषा और पहचान से संबंधित जानकारी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए। दस्तावेजों की जांच के दौरान नाम और उपनाम की स्पेलिंग में अंतर समेत कई गड़बड़ियां अधिकारियों के सामने आईं।
दस्तावेजों की जांच में सामने आईं गड़बड़ियां
शैक्षणिक सत्र 2025-26 में हुए इंजीनियरिंग प्रवेश के सत्यापन के दौरान इस पूरे मामले की परतें खुलनी शुरू हुईं। विद्यार्थियों ने हिंदी भाषाई अल्पसंख्यक कोटे के तहत प्रवेश के लिए पात्रता का दावा किया था। इसके समर्थन में विभिन्न दस्तावेज प्रस्तुत किए गए थे।
जांच एजेंसी ने दस्तावेजों का मिलान किया तो कई मामलों में जानकारी एक-दूसरे से मेल नहीं खाती मिली। विशेष रूप से सरनेम की स्पेलिंग, दस्तावेजों में दर्ज विवरण और मातृभाषा से संबंधित प्रमाण को लेकर सवाल उठे। इससे अधिकारियों को संदेह हुआ कि अल्पसंख्यक कोटे के तहत प्रवेश हासिल करने के लिए दस्तावेजों में हेरफेर अथवा गलत जानकारी का इस्तेमाल किया गया हो सकता है।
एआरए ने छात्रों और कॉलेजों को सुनवाई का मौका दिया
मामले को लेकर जून में एआरए की बैठक हुई। इसमें संबंधित छह इंजीनियरिंग कॉलेजों के साथ लगभग 320 विद्यार्थियों को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया गया था। विद्यार्थियों से कहा गया कि वे हिंदी भाषाई अल्पसंख्यक होने के अपने दावे को साबित करने वाले वैध दस्तावेज प्रस्तुत करें।
बताया गया कि सुनवाई के दौरान 301 विद्यार्थी और चार अभिभावक उपस्थित हुए, जबकि 15 विद्यार्थी सुनवाई में अनुपस्थित रहे। उपस्थित विद्यार्थियों से उनके दावों के समर्थन में आवश्यक प्रमाण मांगे गए। हालांकि, कई विद्यार्थी अपने अल्पसंख्यक दर्जे को साबित करने के लिए अपेक्षित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके।
दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाने और उपलब्ध कराए गए रिकॉर्ड में विसंगतियां पाए जाने के बाद एआरए ने संबंधित प्रवेशों को मंजूरी देने से इनकार कर दिया।
सिर्फ दाखिला रद्द होने तक सीमित नहीं रहेगा मामला?
इस पूरे घटनाक्रम ने इंजीनियरिंग प्रवेश प्रक्रिया में अल्पसंख्यक कोटे के इस्तेमाल को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जांच में दस्तावेजों के साथ जानबूझकर छेड़छाड़ या फर्जी दस्तावेज तैयार करने की पुष्टि होती है, तो संबंधित विद्यार्थियों अथवा उनके अभिभावकों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई होगी या नहीं।
फिलहाल इस संबंध में आपराधिक मामला दर्ज किए जाने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। हालांकि, अधिकारियों की पहले की टिप्पणियों से संकेत मिला था कि मामले में गंभीर अनियमितता पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
कॉलेजों की भूमिका पर भी उठे सवाल
इस मामले में केवल विद्यार्थियों के दस्तावेज ही जांच के घेरे में नहीं हैं, बल्कि संबंधित कॉलेजों की प्रवेश प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आ गई है। यदि किसी विद्यार्थी ने गलत दस्तावेजों के आधार पर अल्पसंख्यक कोटे का लाभ लिया, तो प्रवेश के समय कॉलेज स्तर पर दस्तावेजों की जांच किस तरह की गई, यह भी जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन सकता है।
अल्पसंख्यक कोटे के तहत सीमित सीटों पर प्रवेश दिया जाता है। ऐसे में यदि अपात्र विद्यार्थियों ने गलत तरीके से इन सीटों पर कब्जा किया है, तो वास्तविक पात्र विद्यार्थियों के अवसर प्रभावित होने की आशंका भी जताई जा रही है।
प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता पर फिर बहस
320 विद्यार्थियों के प्रवेश से जुड़े इस घटनाक्रम ने महाराष्ट्र की इंजीनियरिंग प्रवेश व्यवस्था में दस्तावेज सत्यापन और अल्पसंख्यक कोटे की निगरानी को लेकर बहस छेड़ दी है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित कॉलेजों और विद्यार्थियों के खिलाफ आगे क्या कार्रवाई होती है तथा क्या इस मामले में दस्तावेजों की फोरेंसिक या अन्य स्तर पर जांच कराई जाती है।
एआरए के फैसले के बाद उन विद्यार्थियों के भविष्य पर भी सवाल खड़ा हो गया है, जिन्होंने इन प्रवेशों के आधार पर इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू कर दी थी। अब आगे की प्रक्रिया और छात्रों को उपलब्ध कानूनी अथवा प्रशासनिक विकल्पों पर भी नजर रहेगी।





