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    Published On : Mon, May 3rd, 2021
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    सब ज्ञान गुरु और जिनवाणी से मिलता हैं- वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदीजी

    नागपुर : सब ज्ञान गुरु और जिनवाणी से मिलता हैं. सत्य को जानने के लिए वैज्ञानिक पढ़ रहे हैं. श्रद्धा, भक्ति, समर्पण भाव से मंत्र जाप करेंगे तो आप स्वस्थ ही नहीं होंगे, आपके भावात्मक तरंग अच्छे हो जायेंगे, वहां तक उसका प्रभाव पड़ता हैं यह उदबोधन वैज्ञानिक धर्माचार्य कनकनंदीजी गुरुदेव ने विश्व शांति अमृत ऋषभोत्सव के अंतर्गत श्री. धर्मराजश्री तपोभूमि दिगंबर जैन ट्रस्ट और धर्मतीर्थ विकास समिति द्वारा आयोजित ऑनलाइन धर्मसभा में दिया.

    आचार्यश्री कनकनंदीजी गुरुदेव ने कहा धर्म ने श्रद्धा, आस्था, विश्वास को महत्व दिया हैं और रोग भी दूर हो जाते हैं. भगवान की पूजा स्वयं के लिए कर रहे हैं, स्वयं मानसिक, शारीरिक आधार के लिए दुख संकट दूर करें परम् सुख को प्राप्त करते हैं. देव, शास्त्र, गुरु पर श्रद्धान नहीं हैं तो आत्म तत्व का श्रद्धान हो नहीं सकता. जैन धर्म परम विज्ञान हैं, सूक्ष्मता से वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जैन धर्म हैं. हमारे धर्मज्ञनो कहा और आचार्यो ने लिपिबद्ध किया, आधुनिक ज्ञान, विज्ञान के अनुसार जैन धर्म हैं. सर्वज्ञ भगवान बताते हैं संसारी ज्ञान, विपरीत श्रद्धान आचरण से परे विभिन्न प्रकार के पाप करते हैं. संसार में अनादिकाल से अनंत बार शारीरिक, मानसिक आघात उत्साह हैं. समस्त धर्म का मूल उद्देश्य सांसारिक दुखों से मुक्त होकर आध्यात्मिक अनंत सुखों को पाना हैं. उसके लिए प्रथम इकाई हैं सम्यग दर्शन, सम्यग दर्शन के बाद सम्यग ज्ञान होता हैं, सम्यग ज्ञान से युक्त सम्यग चारित्र से होता हैं.

    सम्यग दर्शन पहले सबसे पहले नहीं तो सम्यग ज्ञान, सम्यग चारित्र नहीं होगा. सम्यग ज्ञान, सम्यग दर्शन के बिना सम्यग चारित्र नहीं होता. ग्रंथवाद नहीं हैं, संतवाद नहीं हैं, पंथवाद नहीं हैं. आगम के विरुद्ध सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित रचित ग्रंथ के अतिरिक्त आपके स्वार्थ के लिए बोले, आपकी रूढ़ि, पंथ, कुल भी बोले तो ग्राह्य नहीं हैं. सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित सत्य हैं, गणधर द्वारा कंठित पूर्वाचार्यों द्वारा लिपिबद्ध जो आचार्य, साधु, पंथ के अनुसार नहीं बोलते, नहीं मानते वह सम्यग दर्शन नहीं आयेगा. जैन धर्म के अनुकूल नहीं होगा, जिनवाणी नही होगी, वह सार्थ वाणी होगी. हमारे सर्वज्ञ द्वारा प्रतिपादित सत्य हो, आचार्य कुंदकुंद द्वारा लिखित उसके आधार पर, पूर्वाचार्यों द्वारा प्रमाणित ग्रंथ के अनुसार नहीं मानकर जो स्वछंदता से, स्वार्थ से ग्रसित होकर या दबाव तंत्र से ग्रसित होकर के शुद्ध बोले वह मिथ्या हैं, असम्यक हैं. अपने अपने मत के अनुसार, विचार के मत करो. जब तक श्रद्धा नहीं,सम्यक्त्व नहीं, श्रद्धा, विश्वास सम्यक्त्व हैं. अपने लक्ष्य के अनुसार आगे बढ़े, लक्ष्य के विपरीत नहीं चले. सम्यग दर्शन, सम्यग ज्ञान, सम्यग चारित्र से परमात्मा बन सकते हैं. श्रद्धा से केवली बनेंगे. भक्तों को कुतर्क तोड़ मरोड़ कर के लोग धर्म की अवहेलना करते हैं. जो मत ज्ञान, श्रुत ज्ञान याद कर लिया उससे कविता बना लिया यथार्थ ज्ञानी सुदृष्ट होगा. सुपर कंप्यूटर करोड़ो ग्रंथ मेमरी में रख लेता हैं. जो मनमानी बोलते हैं, मनमानी करते हैं और आगम का सहारा लेता हैं और जिनमार्गी नहीं हैं. आधुनिक विज्ञान में बुद्धि को महत्व नहीं हैं. श्रद्धा भक्ति से पूजा करो, समय का दुरुपयोग नहीं हैं, ढोंग नहीं हैं, आडंबर नहीं हैं, पाखंड नहीं हैं.

    भगवंतों की भक्ति से विश्व में आती हैं शांति- गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी
    जैन धर्म की सर्वोच्च साध्वी ज्ञानचंद्रिका गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी ने उदबोधन देते हुए कहा भगवान की भक्ति से विश्व में शांति आती हैं, भक्ति में आज भी शक्ति हैं, आगे भी रहेगी. देशभर के जैन समाज से अपील करते हुए कहा देशभर के जैन समाज अपने घरों में एक घंटे णमोकार महामंत्र का पाठ करें जिससे रोगों से शांति मिलेगी. तीर्थंकर भगवान के नाम से हमारे मन में शांति होती हैं. हमारे मुख से निकले शब्दों का नाम स्मरण होता हैं, अशुभ कर्मों का क्षय होता हैं. भगवान का नाम भी संसार से मुक्ति पार करनेवाला हैं. नाम में इतनी शक्ति हैं, शांति आती हैं. भगवान की भक्ति, स्तुति, पूजा से ही, जाप से शांति होती हैं. भगवान ऋषभदेव ने असी-मसी-कृषि का उपदेश हैं, विवाह परंपरा बनाई. भगवान ऋषभदेव बाल अवस्था में 1008 कलशों से अभिषेक करते थे, हजारो इंद्र, इंद्राणी, शची इंद्राणी ने भी अभिषेक किया. तीर्थंकर भगवान के गर्भ में आने से छह महिने पहले रत्नों की वृष्टि होती हैं. जन्म के समय तीर्थंकरों के पंचकल्याणक के समय उपस्थित रहना चाहिये. निर्वाण के समय निर्वाण लाडू चढ़ाकर निर्वाण महोत्सव मनाये. भगवान महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं हैं, भगवान ऋषभदेव से चला आ रहा हैं धर्म. अनंत काल से जैन धर्म चला आ रहा हैं.

    भगवान ऋषभदेव की कितनी भी चर्चा करें वह विश्व शांति के लिए ही होगी. विश्व शांति के लिए अहिंसा परमो धर्म एक धर्म हैं. भगवान ऋषभदेव, भगवान महावीर का नाम विश्व शांति के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि हैं, अमोघ शक्ति हैं. भगवान ऋषभदेव के शासन का प्रचार करें, भगवान महावीर के शासन का प्रचार करें, अहिंसा परमो धर्म का प्रचार करें. वर्तमान में जितने साधु हैं, आज पंचम काल के अंत तक दिगंबर साधु रहेंगे. साधुओं के दर्शन से, साधुओं के विहार से विश्व में शांति होती हैं. दिगंबर साधु, भगवान ऋषभदेव की भक्ति से कोरोना महामारी को भगाने में सफल होंगे. विश्व की शांति के लिए हमेशा कार्यक्रम आयोजित करते रहे. आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी गुरुदेव के सानिध्य में यह विश्व शांति का आयोजन किया यह हमारे लिए गौरव की बात हैं. तीर्थंकर भगवान की प्रभावना, अहिंसा परमो धर्म की प्रभावना करते रहें. अपने शक्ति अनुसार भक्तामर का पाठ, विधान करते रहें. महामारी दूर करनेवाला महामृत्युंजय विधान इन विधानों के माध्यम से महामारी दूर करने का बहुत बड़ा अभियान अपने समय, शक्ति का सदुपयोग करते हुए करें. प्रज्ञायोगी दिगंबर जैनाचार्य गुप्तिनंदीजी गुरूदेव ने उदबोधन दिया. धर्मसभा का संचालन स्वरकोकिला आस्थाश्री माताजी ने किया.


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