Published On : Fri, Mar 21st, 2014

३ हजार करोड़ का उत्पन्न दे सकता है कल्पवृक्ष

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साकोली – विदर्भ की भुमिपर हमखास मिलने वाला मोहवृक्ष उसके फुल से बनाई गई शराब की वजह से बदनाम हुआ है। सरकारी उपेक्षा तथा सर्वसामान्य नागरिक के अनदेखी से यह वृक्ष बाली जा रहा है। विदर्भ की एक संस्था ने किये सर्व्हे के नुसार विदर्भ के ११ जिले में करीबन ५ करोड़ मोहवृक्ष है। एक मोहवृक्ष से ५० किलो फुल मिलता है जो की ५ से २५ रूपये किलो बेचा जाता है। पुरे विदर्भ के ५ करोड़ वृक्ष से २५० करोड़ किलो ( कीमत ५ रु. नुसार १२५० करोड़ ) मोहफुल मिलता है। उसके बाद इसी वृक्ष से ५० किलो फल ( ग्रामीण में टोळी कहते है। ) प्राप्त होता है। जो ५ से १० रु. किलो बेचा जाता है। ५ करोड़ वृक्ष से २५०. करोड़ किलो फल मिलते है, जिनकी कीमत १२५० करोड़ होती है।
विदर्भ के ५ करोड़ मोहफुलों पर प्रक्रिया उद्योग आये तो उससे पशुखाद्य तथा उचा प्रति की सेंद्रिय शराब ( organic wine ) बनाई गई तो सरकार को किमान १००० करोड़ का उत्पन्न मिल सकता है। इसी प्रकार ५ करोड़ मोहफुलों से खाद्य तेल निकालने से १.५ करोड़ तेल मिल सकता है। जिसकी कीमत ५०० करोड़ होती है। इस १.५ करोड़ तेल से बायोडिसेल निर्माण किया गया तो इससे भी ५०० करोड़ का लाभ मील सकता है। इस प्रकार एक मोहवृक्ष से मोहफुल, फल, पशुखाद्य, शराब, खाद्यतेल तथा बायोडिसेल ऐसे विविध माध्यम से हर वर्ष सरकार को करीबन ३ हजार करोड़ से भी अधीक उत्पन्न मील सकता है।
मोहफुल तथा फल जमा करना तथा प्रक्रिया उद्योग के माध्यम से हजारों बेरोजगारों को रोजगार मिल सकता है। इस वृक्ष का वैशिष्ट यह है की इसके फुल तोडे नहीं जाते वह अपने आप ही गिरते है। पडित जगह पर वृक्ष लगाने गए तो एक एकड़ में १०८ वृक्ष लागाये जा सकते है। गरीब किसानो को इस वृक्ष के पत्तो से पत्रावली बनाने का घरगुती उद्योग शुरू किया जा सकता है। इस वृक्ष को फल व फुल देने के लिए ७ से १० साल लगते है। वृक्ष की आयु ४० से भी अधिक होने से भावी पीढ़ी के लिए यह कल्पवृक्ष बनता है।
शुरू में यह वृक्ष हर साल १० किलो फुल व १० किलो फल देता है। बाद में यह वृक्ष ५० किलो फुल व ५० किलो फल देता है। वृक्ष सुक जाने से जलाने तथा इमारती काम के लिए महत्वपुर्ण होता है। एक एकड़ १०८ वृक्ष में से १००. वृक्ष भी जीवित रहे तो भी १ हजार किलो फल ऐसे २ हजार किलो फुल – फलों से ५ रु. किलो दर से १० हजार रूपये उत्पादन तथा आगे चलके २० से २५ हजार रूपये मिल सकते है।
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सरकारी उपेक्षा का बली
 वन विभाग ने जिन वृक्ष के कटाई पर बंदी लगाई उस में मोहवृक्ष का समावेश नहीं है। पश्चिम महाराष्ट्र के मंत्री तथा प्रशासकीय अधिकारीयों ने इस वृक्ष की जानकारी न होने से उन्होंने १९८३ में मोहवृक्ष तोड़ो व टोरी का वृक्ष लगाओं ऐसा अध्यादेश निकला था। विदर्भ में कल्पवृक्ष नाम से जाननेवाले इस वृक्ष के फुलों में प्रोटीन १.४०, खनिज ७०, कार्बोहाइड्रेड २२.७०, कॅलरीज १११, कॅल्शिअम ४५, लोह २३, विटामिन ए. ३०७, विटामिन सी ४० रहता है। किसानों का यह कल्पवृक्ष सरकारी उपेक्षा का बली बन रहा है। ईंधन के लिए इस वृक्ष की बड़े पैमाने पर कटाई हो रही है। इस वजह से  अस्तिव धोके में है। इस वृक्ष का लकड़ा गर्म तथा पत्तो से पत्रावली, द्रोण बनते है। फुलों से उत्तम अलकोहल, पशुखाद्य , दवाईया तथा अकाल में आहार में उपयोग किया जाता है। फल मुलायम, मीठा होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी सब्जी की जाती है। फलो से तेल, साबुन बनाई जाती है। वनो को गती देने के लिए राज्य सरकार ने सामजिक वनीकरण की स्थापना की परंतु इस विभाग के नर्सरी से मोहवृक्ष तयार नहीं किये जाते। विदर्भ के वनों में जैविक विविधता बढ़ाने वृक्ष ऐसी मान्यता है। इस वृक्ष का बड़े पैमाने पर रोपाई की गई तो ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को इस वृक्ष से रोजगार मिल सकता है। परंतु सरकारी यंत्रणा ने इस वृक्ष की दखल नहीं ली है। इस वृक्ष को संरक्षण न होने से इसके भारी मात्रा में अवैध कटाई हो रही है।
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