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    Published On : Wed, Jul 26th, 2017
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    तकनीक, तेज़ी, ताकत के मामले में माझी मेट्रो-म्हारी मेट्रो से आगे


    नागपुर
    : नागपुर मेट्रो रेल परियोजना का काम तेज़ गति से जारी है। इस परियोजना को लेकर दावा किया जा रहा है की नागपुर मेट्रो देश भर में तैयार हुई सभी मेट्रो परियोजनाओं से बेहतर होगी। देश भर में अब तक तैयार हुई मेट्रो परियोजना का अध्ययन कर बेहतर तकनीक का इस्तेमाल नागपुर मेट्रो परियोजना में साकार किया जा रहा है। लगभग 32 किलोमीटर तक फ़ैली नागपुर मेट्रो में कई नई तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। b शहरों की श्रेणी में मेट्रो रेल की शुरुवात राजस्थान राज्य की राजधानी जयपुर से हुई। नागपुर की माझी मेट्रो की संकल्पना के जैसे ही जयपुर मेट्रो को म्हारी मेट्रो नाम देकर स्थानीय संस्कृति को उकेरा गया। महा मेट्रो की तरफ से नागपुर के पत्रकारों को अध्ययन के लिए जयपुर मेट्रो का दौरा कराया गया। इस दौरान जयपुर मेट्रो की बारीकियों से यहाँ के अधिकारियो द्वारा अवगत कराया गया।

    2044 करोड़ की लागत से वर्ष 2014 में मेट्रो साकार हुई। ख़ास है की पहले चरण में 9 .4 किलोमीटर के एलोवेटेड रूट पर दौड़ रही मेट्रो की पूरी लागत सरकार ने खुद लगाई है। जयपुर मेट्रो के शुरू होने को दो वर्ष पुरे हो जाने के बावजूद अब फ़ायदा पहुँचने के लायक राइडरशिप नहीं मिल पाई है। जयपुर मेट्रो का प्रति दिन का खर्चा करीब 10 लाख रूपए है जबकि आय के रूप में उसे सिर्फ 2. 5 लाख रूपए की हासिल हो पा रहे है। जिस रूट को शुरू किया गया है उसमे प्रति दिन करीब 45 हजार राइडरशिप अपेक्षित थी लेकिन हासिल महज 22 हज़ार हो रही है। जयपुर मेट्रो के अधिकारी भी घाटे की बात को कबूल करते हुए ईमानदारी से यह बात मान रहे है की मेट्रो परियोजना में मुनाफ़ा कमाने का आधार रीडरशिप नहीं हो सकती है इसके लिए अन्य चीजों पर ध्यान देना आवश्यक है जिस पर अब फ़ोकस किया जा रहा है। प्रॉपर्टी डेवलपमेंट पर दो वर्ष बाद ध्यान दिया जा रहा है,मेट्रो से ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी उपलब्ध न करा पाना भी नुकसान की बड़ी वजह साबित हो रही है नागपुर मेट्रो के लिए शुरुवाती दौर से ही आय के लक्ष को हासिल करना बड़ी चुनौती होगी। हालांकि महा मेट्रो के प्रमुख ब्रिजेश दीक्षित के मुताबिक नागपुर में ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी,प्रॉपर्टी डेवलप्मेंट,सोलर एनर्जी जनरेटर सिस्टम ध्यान दे रही है जिससे की आय के स्त्रोत विकसित हो सके।

    जयपुर में मेट्रो की जगह का कमर्शियल इस्तेमाल किये जाने का अब जाकर प्रयास किया जा रहा है। जयपुर पर्यटन और व्यापारिक दृस्टि से नागपुर से ज्यादा तरजीह रखता है। ऐसे में वहाँ हो रहा नुकसान से नागपुर मेट्रो को सबक लेकर आय के स्त्रोत को विकसित करने के प्रयास पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। जयपुर मेट्रो परियोजना के पहले फेज़ के लिए राज्य सरकार ने 3139 करोड़ की निधि उपलब्ध कराई है। इस नुकसान की भरपाई के लिए जनता पर अतिरिक्त सेज़ भी लगाया गया है। दूसरे फेज़ का काम पीपीपी मॉडल पर करने का विचार है जिसमे 60 फीसदी भागेदारी निजी क्षेत्र की रहेगी। जयपुर से उलट नागपुर मेट्रो का काम लोन लेकर किया जा रहा है ऐसे में यहाँ चुनौतियां ज्यादा ही रहेगी। नागपुर में अगस्त में एलोवेटेड रूट पर ट्रायल की तैयारी है हालांकि खपरी से विमानतल के बीच यात्री मिलने की कम संभावना को देखते हुए मेट्रो को औद्योगिक क्षेत्र बुटीबोरी तक ले जाया गया है। जयपुर से तुलनात्मक अध्ययन करने पर पता चलता है की नागपुर की चारो दिशाओं में मेट्रो का काम एक साथ शुरू है जिसका फायदा नागपुर मेट्रो को होगा। जयपुर में एक छोर पर ही जनता को मेट्रो की सुविधा उपलब्ध है मेट्रो ने किराये की दर को दो हिस्सों में विभाजित किया है। टिकिट के दर दो खंडो में विभाजित किया गया है। पीक अवर के तहत 5 -10 -15 और नॉन पीक अवर 10 -15 -20 रूपए किराया लिया जाता है।

    नागपुर मेट्रो की 5 डी बीम टेक्नोलॉजी की सराहना
    देश में किसी भी मेट्रो परियोजना के तहत पहली बार 5 डी बीम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है। दौरे के दौरान पत्रकारों से मुलाकात में नागपुर मेट्रो द्वारा इस्तेमाल की जा रही इस तकनीक को जयपुर मेट्रो के प्रोजेक्ट डायरेक्टर अश्विन सक्सेना ने इस तकनीक की न सिर्फ सराहना की बल्कि इसकी आवश्यकता पर भी बल दिया उन्होंने कहाँ कि तरह के शुरू कामों की निगरानी के लिए ऐसी तकनीक का होना मदतगार साबित होता है।

    डबल डेकर की तकनीक मूलतः जयपुर की
    नागपुर में छत्रपति चौक से प्राइड होटल के दरमियान डबल डेकर ब्रिज का निर्माण किया जा रहा है। ब्रिज में सड़क के ऊपर एक सड़क और उसके ऊपर से मेट्रो दौड़ेगी। यह प्रयोग देश में पहली बार जयपुर मेट्रो द्वारा किया गया। पहले फेज में ही बनाए गए इस ब्रिज के ऊपर से ही मेट्रो दौड़ रही है। जयपुर मेट्रो के अधिकारी अपने इस काम पर गर्व करते है उनके अनुसार बीते दो वर्षो से उनकी मेट्रो इसी रूट से फ़र्राटे से दौड़ रही है। इस ब्रिज को शुरू करने से पहले उन्हें रेलवे सेफ्टी बोर्ड की कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ा।


    जयपुर मेट्रो को उम्मीद की विस्तार के बाद बढ़ेगी रीडरशिप और आय

    जयपुर मेट्रो फ़िलहाल शहर के बाहरी भाग में ही दौड़ रही है। परियोजना के दूसरे चरण के दौरान 23 किलोमीटर का रूट तैयार किया जाने वाला है। 14 किलोमीटर में अंडरग्राउंड मेट्रो चलेगी यह इलाका पिंक सिटी कहे जाने वाले जयपुर का मुख्य भाग होगा। इस वजह से जयपुर मेट्रो को उम्मीद है की इस रूट के तैयार हो जाने के बाद राइडरशिप बढ़ेगी। जिस रूट पर फ़िलहाल मेट्रो दौड़ रही है वहाँ रडरशिप 6 हजार से 22 हज़ार पर पहुँची है। विस्तारित रूट पर शहर के सभी प्रमुख व्यावसयिक केन्द्रो और सरकारी कार्यालयों को कवर किया जा।

    जयपुर मेट्रो में स्थानीय संस्कृति का प्रदर्शन नदारद,नागपुर का हर स्टेशन दर्शाए है शहर का इतिहास
    ऐतिहासिक शहर होने की वजह से अब तक म्हारी मेट्रो शहर से इतर अपनी पहचान को स्थापित करने में नाकामियाब ही साबित हुई है। राइडरशिप को देखा जाये तो साफ़ पता चलता है की जनता निजी वाहनों के इस्तेमाल पर ज्यादा तवज्जों दी जा रही है इससे उलट माझी मेट्रो को इसी रूप में तैयार किया जा रहा है जिससे की सड़को का दबाव कम कर उसे मेट्रो में शिफ़्ट किया जा सके। जयपुर मेट्रो में अब तक स्थानीय संस्कृति को दर्शाने का प्रयास नहीं किया गया है। अधिकारियो के मुताबिक दूसरे फेज में यह काम किया जायेगा जबकि नागपुर मेट्रो के अंतर्गत बनाए जाने वाले हर स्टेशन को स्थानीय संस्कृति के कलेवर में ढाला जा रहा है। राइडरशिप को मेट्रो तक लाने के लिए कनक्टिविटी उपलब्ध कराया जाना जयपुर के मुकाबले नागपुर मेट्रो का तकनिकी पक्ष है। इसके अलावा जयपुर के मुकाबले नागपुर में सड़के चौड़ी है जिस वजह से काम करने में आसानी हो रही है। मेट्रो के जारी काम को देखने पर निर्धारित समय में लक्ष हासिल कर लेने की उम्मीद भी है।

    जयपुर मेट्रो में दिल्ली मेट्रो की झलक
    जयपुर मेट्रो परियोजना को को देखने पर यह दिल्ली मेट्रो की कॉपी नज़र आती है। इसकी मुख्य वजह की परियोजना में पूणर्तः तकनिकी सहयोग दिल्ली मेट्रो का है यहाँ के स्टेशनों और निर्माण हुई इमारतें दिल्ली मेट्रो से मिलती जुलती है। जबकि नागपुर मेट्रो अपने खुद के संसाधनों को विकसित कर अपनी परियोजना को साकार कर रहा है। मेट्रो के प्रमुख लंबे समय तक नागपुर में काम कर चुके है इसलिए वह शहर से अवगत है जिसका फायदा परियोजना को हो रहा है। उधार की तकनीक के इस्तेमाल की बजाए अपने शहर में संसाधन के विकास और और उसे रोजगार सृजन का प्रयास किया जा रहा है।


    खर्च में कटौती करना नागपुर मेट्रो के लिए फायदेमंद

    जयपुर मेट्रो के लिए आवश्यक बिजली स्थानीय सरकार की बिजली वितरण कंपनी से खरीदी जा रही है। अब जाकर सोलर पावर से बिजली के निर्माण और इस्तेमाल का प्लान बनाया गया है। इससे ठीक उलट नागपुर मेट्रो में सोलर पवार से बिजली के निर्माण की तैयारी है। नागपुर मेट्रो का प्लान है की आवश्यक बिजली के 60 फीसदी बिजली का उत्पादन सोलर के माध्यम से वह खुद करेगी। भविष्य में बिजली बेचने की भी तैयारी नागपुर मेट्रो ने अभी से कर रखी है।

    ग्रीन मेट्रो की संकल्पना दूसरे शहरों के लिए पथ प्रदर्शक
    जयपुर मेट्रो के दौरे के दौरान यह बात साफ़ हो जाती है की नागपुर द्वारा ग्रीन मेट्रो निर्माण के किये जा रहे दावे में दम है। जयपुर में इस तरह की कोई संकल्पना ही नहीं है जबकि नागपुर मेट्रो को पर्यावरण अनुकूल बनाया जा रहा है। जिससे साफ़ है की नागपुर मेट्रो आगामी दौर में देश के कई शहरों में तैयार होने वाली मेट्रो परियोजनाओ के लिए पथप्रदर्शक की भूमिका में होगी।


    जयपुर मेट्रो का दूसरे फेज़ में निवेश निजी क्षेत्र का,लोन लेना नागपुर मेट्रो के लिए फायदेमंद

    जयपुर मेट्रो के दूसरे फेज के लिए निजी क्षेत्र की मदत ली जा रही है। दूसरे चरण के लिए जयपुर मेट्रो में करीब 60 फ़ीसदी निवेश निजी क्षेत्र का होगा इस निवेश के बाद अगले 30 वर्षो के लिए संचालन निवेश करने वाली कंपनी के हाँथ में चला जायेगा जबकि नागपुर मेट्रो लोन लेकर अपनी परियोजन को तैयार कर रही है जिस वजह से संचालन का अधिकार नागपुर मेट्रो के हाँथो में ही रहेगा।

    जयपुर मेट्रो से मंहगे है नागपुर मेट्रो के ड़िब्बे
    जयपुर मेट्रो की तुलना में नागपुर मेट्रो की डिब्बे महँगे है जयपुर मेट्रो की एक ट्रेन में करीब 4 बोगियां है। भारतीय कंपनी बीईएमएल द्वारा तैयार इन डब्बों में से प्रत्येक की कीमत करीब 8.5 करोड़ रूपए है जबकि नागपुर मेट्रो चाइना रोलिंग स्टॉक कॉर्पोरेशन द्वारा डिब्बे ख़रीदेगी जिसमे एक डब्बे की कीमत करीब 12 करोड़ रूपए होगी। फ़िलहाल जयपुर मेट्रो में 10 ट्रेन उपलब्ध है। नागपुर मेट्रो की डिब्बे महँगे होने के बावजूद इसके तकनिकी रूप में बेहतर होने के दावे किये जा रहे है।




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