Published On : Tue, Jul 14th, 2015

WCL Nagpur : जमीन किसी की, नौकरी मिली किसी और को

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सवांददाता / दिव्येश द्विवेदी, प्रियंका दुबे, फौजिया शेख

नागपुर। जिस जमीन के भीतर दबे कोयले को निकाल निकालकर वेकोलि करोड़ों-अरबों रुपया कमा रही है, उसी जमीन के पूर्व मालिक एक अदद नौकरी और अपने हक के मुआवजे के लिए पिछले 21 साल से भी अधिक समय से बस भटक रहे हैं. वेकोलि यानी वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड ने गोंडेगांव ओपरकास्ट माइंस के लिए किसानों की जमीन का अधिग्रहण करते समय जो करार किया था उसे भी अब वह भूल गया है.

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120 लोगों का यह संघर्ष पिछले कई सालों से इसी तरह जारी है. दर्जनों नेताओं के आश्वासन और अधिकारियों के वादों के भरोसे तो जिंदगी कट नहीं सकती. नौकरी दी भी गई है तो उन्हें नहीं जिनकी जमीन ली गई है, बल्कि भारी भरकम घूस लेकर दूसरे लोगों को नौकरी दी गई है. कई मृत व्यक्ति भी वेकोलि में काम कर रहे हैं. जाहिर है कि मृत व्यक्तियों के नाम पर दूसरे लोगों को काम पर रखा गया है.

परियोजना के पीड़ित अब इस मामले की सीबीआई जांच की मांग भी कर रहे हैं. प्रकल्पपीड़ितों का आरोप है कि कि अब तक कुल 500 लोगों को नौकरी दी गई है, जिनमें 250 बोगस कागजात के आधार पर नौकरी कर रहे हैं. ये नौकरी रिश्वत लेकर दी गई है.

भ्रष्टाचार का बड़ा अड्डा
नागपुर का वेस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड भ्रष्टाचार का बड़ा अड्डा बन चुका है. यहाँ के अधिकारियों के हौसले इतने बुलंद हैं न तो वे कानून की मानते हैं और न ही सरकार की. क्या आप यकीन कर सकते हैं कि पैसों के दम पर 150 लोगों की भर्ती इसी विभाग में हो जाये और जो लोग मर भी जाएं तब भी उनकी जगह कोई शख्स न सिर्फ काम करे, बल्कि तनख्वाह भी उठाये. बात चौंकाने वाली और यकीन करने वाली न भी हो, पर है हकीकत. वैसे, ये किसी एक जमीन का मामला नहीं है. हर जमीन के अधिग्रहण के समय वेकोलि जो करार करता है वह भूल ही जाता है.

फिलहाल हम बात कर रहे हैं गोंडेगांव कोयला खदान के लिए ली गई जमीन के उन किसानों की जिनकी रोजी-रोटी का साधन हुआ करती थी यह जमीन. यहां से कोई 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पारसिवनी तहसील के ग्राम गोंडेगांव में कोयला खदान के लिए वर्ष 1993-94 में गोंडेगांव, जूनी कामठी और घाट रोहणा के 262 किसानों की 1465 एकड़ जमीन वेकोलि ने अधिग्रहित की थी. करार के अनुसार किसानों को झुनझुने के तौर पर 35,000 रुपए प्रति हेक्टेयर बतौर एडवांस दिया गया था.

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साथ ही तय हुआ था कि बकाया राशि का भुगतान नागपुर के जिलाधिकारी से अवार्ड प्राप्त होने के बाद किया जाएगा, मगर वह दिन कभी नहीं आया. तय तो यह भी हुआ था कि 60 दिनों के भीतर सभी 262 प्रकल्पग्रस्त किसानों के परिवार में एक 7/12 पर एक व्यक्ति को नौकरी भी दी जाएगी. मगर वह दिन भी कभी नहीं आया. आज 21 साल से अधिक समय बीतने के बाद भी गोंडेगांव के प्रकल्प पीड़ित अपनी जमीन के कानूनी मुआवजे और नौकरी के लिए दर-दर की ठोंकरे खा रहे हैं. नेताओं और अधिकारियों के दरवाजे खटखटा रहे हैं.

पैरों तले जमीन खिसकी
प्रकल्पपीड़ितों का झंडा उठाए संघर्ष कर रहे प्रकल्पपीड़ित भगवान रच्छोरे बताते हैं-जब उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत प्रकल्पपीड़ितों को नौकरी देने के संबंध में जानकारी मांगी तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. पता चला कि वेकोलि में सात-बारह के आधार पर खूब फर्जीवाड़ा हुआ है और इन प्रकल्पपीड़ितों के बदले में उन लोगों नौकरी दे दी गई है, जिनकी जमीन ली भी नहीं गई थी.

भगवान रच्छोरे की 2.74 हेक्टेयर यानी करीब 7 एकड़ के आसपास जमीन इस परियोजना में ली गई थी. भगवान तीन बेटों के पिता हैं और उन्होंने अपनी जमीन अपने तीनों बेटों के नाम कर दी है. मगर इसमें से किसी भी बेटे को नौकरी नहीं मिली. कहा गया कि नियमानुसार 2 एकड़ से कम जमीन धारकों को नौकरी नहीं दी जा सकती, जबकि भगवान रच्छोरे की कोई 7 एकड़ के आसपास जमीन अधिग्रहित की गई थी और यह बाकायदा रिकॉर्ड में दर्ज है.

क्या कहता है सरकारी कानून
महाराष्ट्र सरकार के जीआर दिनांक 22.08.2012 और वेकोलि के पितृ संस्थान सीआईएल की वर्ष 2012 की आरआर नीति के अनुसार वेकोलि द्वारा अधिग्रहित सिंचित जमीन के लिए प्रति एकड़ 10 रुपया के हिसाब से मुआवजा दिया जाना चाहिए. गोंडेगांव के मामले में लगभग सभी किसानों की सिंचित जमीन ली गई थी, मगर 35,000 रुपए हेक्टेयर के अलावा और कोई पैसा नहीं दिया गया. राष्ट्रीय पुनर्वास नीति 2007 और महाराष्ट्र पुनर्वास अधिनियम 1999 के अनुसार सभी परियोजना पीड़ितों का उचित पुनर्वास करना और उनके परिजनों को नौकरी देना अनिवार्य होता है.

वेकोलि कर्मी को मिला अधिक मुआवजा
फर्जीवाड़े की एक और दास्तान सुनाते हुए भगवार रच्छोरे बताते हैं कि सूर्यभान कुंभलकर वेकोलि के कर्मचारी हैं. उन्होंने पटवारी और वेकोलि के अधिकारियों से मिलीभगत कर अपनी जमीन का मुआवजा बढ़वा लिया. उसके पास 2 एकड़ 6 आर जमीन थी. कुंभलकर ने अपने खेत सर्वे नं. 217/1 में दो कुओं के साथ ही 84 जंगली पेड़, 499 संतरे के पेड़, 49 नींबू के पेड़, 8 छोटे संतरे के पेड़, 49 नीम के पेड़, 5 जाम के पेड़, 2 आम के पेड़, एक इमली का पेड़, मिलाकर कोई 600 पेड़ होने की जानकारी दी थी. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार 2 एकड़ भूखंड में 200 से अधिक संतरे के पेड़ नहीं हो सकते. उनके खेत में कुआं भी एक ही था. रच्छोरे के खेत में संतरे के 600 पेड़ थे, जो सर्वे में नहीं दिखाए गए. बताया जाता है कि कुंभलकर को जिस सर्वे नंबर के खेत के आधार पर मुआवजा दिया गया, दरअसल वह उनका था ही नहीं. उनके खेत का सर्वे नंबर तो 203 था. कुंभलकर के उत्तराधिकारी को वेकोलि में नौकरी भी दे दी गई.

पूर्व विधायक के परिवार पर वेकोलि मेहरबान
अंकुश मधुकर पाटिल की जमीन भी गई थी, मगर उनके परिवार के किसी सदस्य को नौकरी नहीं मिली. लेकिन वेकोलि में उनके नाम पर ही कोई अंकुश पाटिल नौकरी कर रहा है. जूनी कामठी के किसान और पूर्व विधायक देवराव आसोले सर्वे नंबर 128 /1 के नाम ढाई एकड़ सूखी जमीन थी. इस परिवार के 3 सदस्यों को वेकोलि ने नौकरी दी. गांव के किसानों ने बताया कि ये महाशय पूर्व विधायक हैं. इनका काम जनता की मदद करना है, मगर वे खुद के बारे में ही सोचने में लगे हैं.

रिपब्लिकन भीमशक्ति के नेता चंद्रशेखर भिमटे ने आरोप लगाते हुए कहा था कि नौकरी के लिए कम-सेक म 3 एकड़ की शर्त रखी गई थी, लेकिन पूर्व विधायक देवराव आसोले के परिवार के लीना देवराव आसोले, वैशाली देवराव आसोले और नंदा आसोले को नौकरी दी गई. भगवान रच्छोरे ने कोई दो साल पहले नागपुर के तहसीलदार को लिखे एक पत्र में आरोप लगाया था कि अब तक कुल 500 लोगों को नौकरी दी गई है, जिनमें 250 बोगस कागजात के आधार पर नौकरी कर रहे हैं. ये नौकरी रिश्वत लेकर दी गई है.

उनका आरोप है कि इस मामले में करोड़ों रुपयों का भ्रष्टाचार किया गया है. उनका आरोप है कि पूरा घोटाला पटवारी और वेकोलि के अधिकारियों की मिलीभगत से ही अंजाम दिया गया है. गोंडेगांव परियोजना में जमीन गंवाने वाले भगवान दामोदर रच्छोरे के अलावा डॉ. मनोहर नारायण पाठक, महादेव विट्ठल लिलारे, मूलचंद देवाजी सिंदेकर, देवचंद यशवंत टिक्कम, प्रवीण देवचंद टिक्कम, मीराबाई यशवंत टिक्कम, मोहन भगवान रच्छोरे, सुंदरलाल भगवान रच्छोरे, गेंदलाल भगवान रच्छोरे, रिंकेश गजानन चवरे ने भी नौकरी और मुआवजा देने की मांग वेकोलि प्रशासन और सरकार से की है. इनका आरोप है कि अब तक सिर्फ 5 से 6 लोगों को मुआवजा दिया गया है.

आरटीआई में मिले दस्तावेज
बताते हैं कि नौकरियों के आवंटन में न सिर्फ भ्रष्टाचार का बोलबाला रहा, बल्कि नियमों को ताक पर रखा गया. उन्होंने जो लिस्ट जारी की है वह बताती है कि ऐसे कई लोग हैं जिनके पास काम जमीन नहीं थी उन्हें भी नौकरी दी गई. अधिग्रहण के वक्त हुए समझौते के मुताबिक 2 एकड़ सिंचित या 1 एकड़ असिंचित जगह के बदले एक नौकरी का प्रावधान किया गया था. पर इसमें जमीन का दायरा अलग – अलग था, इसलिए एक परिवार को एक ही नौकरी का प्रावधान किया गया था. एक ही परिवार के अलग – अलग व्यक्तियों के नाम जमीन होने पर वह नौकरी पाने के लिए योग्य होते. पर नौकरी हासिल कर चुके लोगों की लिस्ट बताती है कि इसमें कई ऐसे लोगों को नौकरी दी गई, जिनके पास करार के विपरीत कम जमीन थी. उन्हें न सिर्फ नौकरी दी गई, बल्कि एक ही परिवार के कई लोगों को नौकरी का लाभ मिला. भगवान के मुताबिक पैसे लेकर नियमों को ताक पर रखकर यह भर्तियां की गई हैं.

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जमीन किसी की, नौकरी किसी और को
अव्यवस्था का आलम सिर्फ यही नहीं था कि पैसा लेकर नौकरियां दी गई, बल्कि कई ऐसे भी मसले सामने आए, जिसमें जमीन किसी और के नाम पर थी और नौकरी किसी और को मिली. इसमें बड़े पैमाने पर ऐसे लोगों की भर्ती की गई जो न गांव के हैं और न ही राज्य के. इससे साफ होता है कि वेकोलि के कई कर्मचारियों ने अपने रिश्तेदारों को दूसरे रास्ते अपनाकर नौकरी दिलवाई और गांव के जो लोग सही मायने में नौकरी पाने के हकदार थे वे अपना हक पाने से वंचित रह गए. इसमें कई ऐसे भी हैं, जिनके एक 7/12 पर कई लोगों को नौकरियां दी गई. इस मसले को उठाने वालों का आरोप है कि इस काम के लिए ‘नो आॅब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ का भी सहारा लिया गया.

मंत्रियों की भी नहीं सुनते अधिकारी
गौरतलब है कि गोंडेगांव में हुए इस गोरखधंधे के लिए नेता, समाजसेवक, कई केंद्रीय मंत्री और कोयला मंत्रियों तक इस मसले को पहुंचाया गया, पर अधिकारियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्होंने किसी के भी आदेश को मानना जरूरी नहीं समझा. खुद भगवान रच्छोरे ने तत्कालीन कोयला मंत्री प्रहलाद पटेल, श्रीप्रकाश जैसवाल को खत लिखा, जिसका जवाब देते हुए मंत्रालय ने इस मामले को सुलझाने का आदेश दिया, पर अब तक मामला हल होना तो दूर, गोरखधंधा जारी ही है. भगवान ने पूर्व सांसद दत्ता मेघे, हंसराज अहीर को भी पत्र लिखा पर कुछ नहीं हुआ. अब उन्होंने नागपुर के सांसद और केंद्रीय मंत्री नितीन गडकरी से सहायता की गुहार लगाई है.

जनप्रतिनिधियों की उदासीनता
गोंडेगांव के विस्थापितों के मुताबिक उनका मसला कई सालों से प्रलंबित है. कई बार अपनी फरियाद लेकर स्थानीय जनप्रतिनिधियों के पास भी गए, पर फायदा नहीं हुआ. पिछली सरकार में इस इलाके के सांसद मुकुल वासनिक केंद्र में मंत्री थे. उन्हें भी समस्या बताई गई. अगर वे चाहते तो मसला सुलझ सकता था, पर उन्होंने कोई ठोस प्रयास किया ही नहीं. शिवसेना से आशीष जैसवाल दो बार विधायक रहे. इस बार विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने गोंडेगांव का मसला सुलझाने का वादा किया था. अगर चाहते न्याय दिला सकते थे, मगर कुछ होना नहीं था, इसलिए हुआ भी नहीं.

नितिन गडकरी से बंधी है आस
अपने लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे लोगों की आस अब नागपुर के सांसद और केंद्र में खासा रुतबा रखने वाले नितिन गडकरी से लगी है. परियोजना के पीड़ितों को लगता है कि वे उनका हक जरूर दिला देंगे. गडकरी की पहचान न्याय दिलाने वाले नेता के तौर पर है. हाल ही में उन्होंने गोंडेगांव के विस्थापितों का मसला उठाया है और वेकोलि के अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक (सीएमडी) को पत्र लिखकर मसले को जल्द सुलझाने का आदेश दिया है. नितिन गडकरी के पत्र के बाद विस्थापितों की बैठक भी हुई है, जिसमें से कुछ लोगों का मामला सुलझाकर उन्हें नौकरी देने की हामी वेकोलि ने भरी है, पर अब भी करीब 150 लोगों को न्याय नहीं मिला है.

20 बरस से अधिकारों के लिए जारी है भगवान का संघर्ष
New-Picture-(2)अधिकारियों की मिलीभगत से यह गोरखधंधा आज से नहीं बरसों से चल रहा है. पता सबको है पर मलाई मिल रही है इसलिए सब उसका स्वाद ले रहे हैं. सब खामोश है. जिन्हें वास्तव में हक मिलना चाहिए वे बेबस हैं. ऐसे ही एक बेबस शख्स हैं 70 की उम्र पार कर चुके भगवान दामोदर रच्छोरे, जो बीते 20 बरस से भी ज्यादा समय से अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं. उम्र भर अनपढ़ रहे भगवान को वक्त और हालात ने न सिर्फ काबिल बना दिया, बल्कि अब सरकारी दफतरों से लेकर कोर्ट-कचहरी की बारीकियों को समझकर वे खुद लड़ाई लड़ रहे हैं. इस लड़ाई को लड़ते-लड़ते उन्होंने कुछ ऐसे दस्तावेज इक्कठा किया है जो वेस्टर्न कोल्फील्ड्स लिमिटेड में व्याप्त अनियमितता और अधिकारियों की मनमानी को उजागर करते हैं.

1994 में नागपुर जिले के गोंडेगांव में वेकोलि ने खुली खदान के लिए जमीन का अधिग्रहण किया. इस अभिग्रहण में भगवान के तीन बेटों के नाम दर्ज 2.74 हेक्टेयर जमीन भी शामिल थी, जो इस प्रोजेक्ट में गई थी. कायदे से एक व्यक्ति के नाम 2 एकड़ से ज्यादा जमीन वाले को नौकरी देने की शर्त जमीन अधिग्रहण के साथ किए गए करार में थी. पर अब तक भगवान के बेटों को नौकरी नहीं मिली है. भगवान नेता से लेकर मंत्री और मंत्री से लेकर अधिकारियों के चक्कर काट कर हलकान हो गए, पर अब तक उन्हें न्याय नहीं मिला. आरटीआई से भगवान को मिली जानकारी चौंकाती है.

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पटवारी, वेकोलि अधिकारियों की मनमानी

रच्छोरे बताते हैं, 24 मई 1997 को यशवंत मंगल टिकम की मृत्यु हो गई थी. इसका मृत्यु-प्रमाणपत्र भी है, बावजूद इसके वेकोलि के रिकॉर्ड में मृतक यशवंत और उनकी 90 वर्षीय विधवा मिरियाबाई टिकम दोनों नौकरी पर हैं? 28 अगस्त 2007 को आरटीआई में मिली जानकारी के अनुसार वेकोलि ने 7 दिसंबर 1994 को उन्हें नौकरी पर रखा है. कर रहे है. देवचंद टिकम के परिवार में पौने 16 एकड़ जमीन थी, जिसमें से पौने 11 एकड़ जमीन मां मिरियाबाई के नाम और 5 एकड़ जमीन पिता यशवंत टिकम के नाम थी. कायदे से इस परिवार के दो सदस्य को नौकरी दी जानी चाहिए थी, मगर एक भी नहीं मिली. उनके परिवार के सदस्यों के नाम पर किसी और को नौकरी दे दी गई. मुआवजे और नौकरी के आज भी यह परिवार संघर्ष कर रहा है.

अपने हक के लिए लड़ाई लड़ रहे भगवान रच्छोरे ने ‘सेंट्रल टुडे’ को एक लिस्ट भी दी है, जिसमें नौकरी देने में बरती गई अनियमितता को उजागर किया गया है. इस लिस्ट की प्रति उन्होंने कई नेताओं और विभागों को भी दी है. भगवान द्वारा मुहैया कराई गई सूची में से कुछ नामों को यहाँ छापा जा रहा है. उनके मुताबिक यह लिस्ट उन्हें आरटीआई से मिली है, जिसके मार्फत वेकोलि की कारगुजारियों को सामने
लाया गया है.

जिन्हें कम जमीन होने के बावजूद मिली नौकरी
मारोती मूलचंद ठाकरे, तेजराम मूलचंद ठाकरे, लीना देवराव असोले और नंदा असोले, जयंत शामराव आसोले, विवेक शामराव असोले, वैशाली शामराव असोले, सरीखा आसोले, सुनील काशीराम असोले, दीपक चारिया, राजेश प्रेमलाल सीरिया, नंदकिशोर प्रेमलाल सीरिया, किशोर हरिश्चंद्र मुस्खेरे, संजय मुस्खेरे, मनोहर मोहनलाल छानिकर, गजानन छानिकर, भगवान छानिकर, डॉ. कंचन वानखेड़े, विष्णु गोपाल लांडगे, कृष्णा दौलत जगताप, गंगाराम मारबते, कवडु मतिराम मेश्राम, नारायण सोनाबा ऊके, प्रकाश नामदेव ऊके, सेशराम डोमा ऊके, चन्द्रभान महादेव ऊके, नरेश गणपत तभाने, संजय लक्ष्मण कावले, अनिल कृष्णा झलपुरे, नीरज देवदास हाडके, चंद्रकांत मिट्टजी दधे, धनराज नीलु बल्कि, अब्दुल खालिक वाय. शेख, कैलाश दशरथ रंगारी, महादेव चैतु काडनायके, शेख मोहम्मद सलीम.

ये हैं एक खसरे पर कई नौकरी पाने वाले लोग
परसराम हरबाजी गोरले, देवराव हरबाजी गोरले, मनोज प्रहलाद गोंडाने, राजकुमार गोंडाने, रमेश यशवंत करंडे, विनोद गंगाधर करंडे, प्रेमदास पांडुरंग दाधे, गणेश माणिकराव वाटकर, राजेंद्र बलिराम ऊके, शिवशेखर लक्ष्मण निखाडे, कुमार बालकृष्ण निखाड़े, धीरज रमेश फुलझले, सचिन दीपक फुलझले.

वर्तमान में नौकरी कर रहे लोगों के कुछ नाम यह है
पंढरी तुलसीराम खंगाले, दलने शंकर पांडुरंग, जगदीश श्रवणकर, असुराज बापूराव कुरडकर, विजय पी. धावले, पुरषोत्तम लालजी हेटे, भारत गुरुदयाल हरने.

New-Picture-(4)पूरे विदर्भ की खदानों का हाल यही
गोंडेगांव में जमीन अधिग्रहण के बाद नौकरी आवंटन में वेकोलि द्वारा किये गये कारनामे बताते हैं कि वहाँ किस हद तक अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्टाचार जारी है. जायज लोगों का हक मारकर अधिकारियों ने अपने परिचितों और पैसे लेकर दूसरे लोगों की भर्ती की है.

यह मसला सिर्फ गोंडेगांव का ही नहीं है; बल्कि नागपुर और विदर्भ में कई जगह ऐसी खदानें हैं, जहां के लोगों की जमीन को ली गई, मगर उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला और न ही नौकरी ही. ग्रामीणों से जमीन लेकर ही खदानें शुरू की जाती हैं. ऐसे में न जानें कहां-कहां ऐसा ही गोरखधंधा चला होगा. मेरी मांग है कि कोयला मंत्रालय इस प्रकरण की जांच सीबीआई से कराए, ताकि इस मामले की सारी हकीकत बाहर आ सके.

मुझे यकीन है कि ऐसी जांच से सारा काला कारोबार सामने आ जाएगा. वैसे भी वेकोलि का जनता से सीधा संपर्क नहीं होता है, इसलिए वहां पर क्या कुछ और कैसे चल रहा है किसी को पता ही नहीं चल पाता. भगवान जैसे न जाने कितने लोग होंगे, जो अब भी न्याय की लड़ाई लड़ रहे होगे.

MLA Jaiswalलापरवाही बरत रहा डब्ल्यूसीएल
इलाके के पूर्व विधायक आशीष जैसवाल के मुताबिक डब्ल्यूसीएल गोंडेगांव के विस्थापितों की समस्याओं को लेकर लापरवाही बरत रही है.

फिर भी उन्होंने इस मसले को सुलझाने का प्रयास किया है.
नतीजा निकलने में देर ही सही, लोगों को न्याय तो मिल ही रहा है.