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    Published On : Wed, Jun 9th, 2021
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    भगवान की प्रतिमा कल्याण का मार्ग बताती हैं- आचार्यश्री गुप्तिनंदीजी

    नागपुर : भगवान की प्रतिमा कल्याण का मार्ग बताती हैं यह उदबोधन प्रज्ञायोगी दिगंबर जैनाचार्य गुप्तिनंदीजी गुरुदेव ने विश्व के सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय ऑनलाइन सर्वोदय धार्मिक शिक्षण शिविर में दिया.

    गुरुदेव ने कहा दूसरों के लिये सुख खोजते हो सुख नहीं मिलेगा, जब अपने आपके लिये सुख खोजोगे सुख मिलेगा. भगवान की मूर्ति के सामने रूपस्थ ध्यान करें. रूपस्थ ध्यान में भगवान के सामने चिंतन कर सकते हैं, रूपस्थ ध्यान करें. पंचपरमेष्ठी का चिंतन कर सकते हैं. रूपस्थ ध्यान से अपने आत्म स्वरूप की प्राप्ति होती हैं. ध्यान हमें आत्म स्वरूप की ओर लेकर जाता हैं. सिद्ध परमात्मा का मन, वचन, काय से रहित सिद्ध परमात्मा का ध्यान रूपतित ध्यान हैं. जैन परंपरा के अनुसार पुदगल द्रव्य आठ प्रकार के समूह में, वर्गणा में बंटा हुआ हैं.

    इनमें से एक समूह का नाम हैं शब्द वर्गणा, एक समूह का नाम हैं मनो वर्गणा और एक समूह का नाम हैं कर्म वर्गणा अंततः तो सब पुदगल हैं, जैसे जैसे लोहा लोहे का कांटता, उसी प्रकार यदि शब्दवर्गणा को संकल्प के साथ रूपबद्ध और पद्धति को आंदोलित किया जाये, तो मनोवर्गणा एवं कर्मवर्गणा के पुदगल भी आंदोलित होते हैं, कंपायमान होते हैं और प्रभावित भी. जैसे मंत्र शक्ति को हमारे आसपास सुरक्षा कवच निर्मित होता हैं, वैसे ही हम मन को लयबद्ध एवं पद्धति के अनुसार ध्यान में लीन कर के ध्वनि से भावित- प्रभावित कर सकते हैं. भारतीय संगीत में मस्तिष्क की सिकुड़ी हुई ग्रंथियां जागृत होती हैं. काफी मल्हार, सुहानी, ललित, केदार आदि रागों से तनाव, अनिद्रा, क्रोध, शांति आदि मस्तिष्क संबंधी रोग नष्ट होते हैं. माल कोप राग से हृदय संबंधी रोग दूर होते हैं.

    आसावरी राग से रक्त शुद्धि और आत्मविश्वास में वृद्धि होती हैं. फिल्मी गाने सुनकर मन कामुक हो जाता हैं और भक्ति गीत सुनकर मन भावुक हो जाता हैं. हम णमोकार महामंत्र का उच्चार मात्रा और छंद का ध्यान रखते हुए आरोह अवरोह के क्रम से लयबद्ध करें, तो मन अपने आप एकाग्र और स्थिर होकर अंतर्मुखी हो जाता हैं. जैसे- जैसे णमोकार महामंत्र से नासित शब्दवर्गणा के पुदगल मन के आसपास तीव्रता से आंदोलित होते हैं, वैसे वैसे मन विषय- वासना, कषायों से, विचार के प्रयासों से मुक्त होता जाता हैं, जिससे ध्यान सहजता से सिद्ध होगा एवं अध्यात्म भी.

    दसवें गुणस्थान धर्म ध्यान होता हैं, मन में ध्यान की ज्योत जलाते हुए जो ध्यान होता हैं वह पिंडस्थ ध्यान होता हैं. परमात्मा के स्वरूप का चिंतन करना हैं. पदस्थ ध्यान में बीजाक्षर अवलंबन कर के अपने सात चक्रों पर विशेष कर के हृदय, नाभि और मस्तक पर ध्यान करना पदस्थ ध्यान हैं. पदस्थ ध्यान को मंत्रों की शक्ति प्रकट करती हैं. मंदिर में घंटा बजाते हैं वह पदस्थ ध्यान के श्रेणी में हैं.

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