Published On : Fri, Oct 28th, 2016

भाजपा को ‘चुनावी चुनौती’ देने की तैयारी में संघ?

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क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, अर्थात आरएसएस, अर्थात संघ भविष्य में चुनावी दंगल में सीधे-सीधे ताल ठोंकने की तैयारी में है? क्या संघ भाजपा को चुनावी चुनौती देने की तैयारी कर रहा है? इस जिज्ञासा के खरीदार फिलहाल शायद ही मिलें, इसे दूर की कौड़ी निरुपित कर लोग-बाग खारिज भी कर देंगे। किंतु, दूर की कौड़ी ही सही, जिज्ञासा है तो निराकरण पर दिमागी कुश्ती तो होगी ही। और वैसे भी प्रत्येक जिज्ञासा के पीछे कोई ना कोई कारण-घटना अवश्य होती है। संघ को लेकर यह ताजा जिज्ञासा भी अकारण नहीं है।

S N Vinod Editor in Chief, Media Sarkar

S N Vinod

संघ और भाजपा के ‘अंत:पुर’ तक की खबर रखने वाले एक वरिष्ठ नेता के अनुसार संघ का एक खेमा ऐसे ‘प्रयोग’ को आतुर है। भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत के साथ केंद्रीय सत्ता पर आसीन करने के पश्चात संघ के कुछ नेताओं की वर्षों सुसुप्त इच्छाएं अब करवट लेने लगी हैं। इस सच के बावजूद कि संघ के एजेंडे को केंद्रीय सत्ता लागू करने के प्रति सक्रिय तो है, संघ को अभी सत्ता पर संपूर्ण वर्चस्व प्राप्त नहीं हो सका है। संघ के इस वर्ग को यह स्थिति नागवार है। अपने चरित्र के अनुसार ये अपनी आदेशिक शब्दों का बगैर किसी रोकटोक के तत्काल क्रियान्वयन चाहते हैं। दूसरी ओर, विशाल जनसमर्थन से गर्वान्वित, आल्हादित सत्ता का शीर्ष नेतृत्व ऐसे ‘आदेशों’ से असहज है। संघ के एजेंडे को वह लागू तो कर रहा है, किंतु सत्ता की अपनी निष्कंटक भूमिका में कोई ‘घुसपैठ’ नहीं चाहता। इस राष्ट्रीय धारणा से भी ये विचलित हैं कि सत्ता की चूल नागपुर के हाथों में है। फिर, द्वंद्व तो होना ही था।

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मुझे याद है 2014 में नई भाजपा सरकार की स्थापना के बाद ही राजधानी स्थित सत्ता के गलियारों में प्रधानमंत्री मोदी को भविष्य में मिलने वाली आंतरिक चुनौतियों पर फुसफुसाहट शुरू हो गई थी। भाजपा संगठन से इतर सत्ता नेतृत्व नवअर्जित लोकप्रियता के दबाव में था। आम जनता की हिलोरें मारती आकांक्षाओं की पूर्ति की मांग जब बढऩे लगी, तब वह चिंतित हो उठा। संघ, पार्टी संगठन व इनकी अनुषंगी इकाइयों के दबाव, सभी केंद्रीय नेतृत्व को विचलित कर रहे थे। परस्पर सामंजस्य और सर्वइच्छापूर्ति संभव नहीं थी। अंतत: सत्ता नेतृत्व ने स्वतंत्र निर्णय लेने शुरू किए-नीतियों, नियुक्तियों और योजनाओं के संबंध में। यही वह मुकाम था, जब असहमति के स्वर सत्ता, संगठन और संघ के साथ-साथ आम लोगों के बीच से भी निकलने शुरू हो गए। सत्ता शीर्ष ने जब स्वतंत्र रूप से कुछ कठोर कदम उठाए, तब यह पूछा जाने लगा कि आखिर प्रधानमंत्री चाहते क्या हैं? पूछा यह भी गया कि आने वाले दिनों में क्या आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री मोदी निर्णय करेंगे कि संघ का सरसंघचालक कौन हो? हां, यह ठीक है कि प्रधानमंत्री मोदी की व्यापक लोकप्रियता और निर्णायक कार्यशैली के कारण वह बहस, आशंका मुखर नहीं हो सकी। लेकिन, अब केंद्रीय सत्ता के ढाई साल पूरे होने के बाद, वे सभी दबी हुई संभावनाएं धीरे-धीरे प्रकट होने लगी हैं। वर्चस्व की आकांक्षाएं मोटी लकीरों से चिह्नित की जाने लगी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह व उनके निकट के सहयोगी तो मुखर हैं, परंतु अपने चरित्र के अनुकूल संघ मौन ताजा स्थितियों का गहन अध्ययन कर रहा है। केंद्रीय सत्ता, नेतृत्व की निरंकुशता उसे भा नहीं रही। संघ के कतिपय बड़े अधिकारियों व स्वयंसेवकों की उपेक्षा व अपमान इसे स्वीकार्य नहीं। द्वंद्व की दुदुंभी तो नहीं बजी किंतु, दीवारों के अंदर प्रतिध्वनित शोर से हल्की-हल्की दरारें दृष्टिगोचर होने लगी हैं। तटीय प्रदेश गोवा ज्वलंत उदाहरण है।

गोवा संघ प्रमुख सुभाष वेलिंगकर को पदमुक्त किए जाने के बाद संघ के इतिहास में तब एक नया अध्याय जुड़ गया, जब वेलिंगकर ने बगावत करते हुए संघ के ज्ञात चरित्र के विपरीत एक राजदल का निर्माण कर डाला। पूरे देश को चौंकाते हुए वेलिंगकर ने प्रदेश की भाजपा सरकार के खात्मे की घोषणा कर डाली। लगभग पांच दशक तक संघ से जुड़े रहने वाले वेलिंगकर ने क्या ये सब कुछ अचानक अकेले कर लिया? संदेह है! ध्यान रहे, वेलिंगकर को तब हटाया, जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का अपमान करने का आरोप उन पर लगा। क्षुब्ध वेलिंगकर ने जब गोवा में भाजपा सत्ता और संगठन को राजनीतिक चुनौती दी, तभी राजनीतिक पंडितों के कान खड़े हो गए। अमित शाह के लिए वेलिंगकर की बलि? वह भी संघ नेतृत्व के द्वारा! किसी के गले नहीं उतरा। जानकार पुष्टि करेंगे कि संघ कभी भी अपने किसी अदने स्वयंसेवक का भी अपमान न तो भूलता है, न बर्दाश्त करता है। समय-समय पर संघ अपने इस चरित्र का प्रदर्शन भी करता रहा है।

2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में संघ के मजबूत गढ़ कृष्णनगर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा की घोषित मुख्यमंत्री उम्मीदवार किरण बेदी की पराजय लोग आज भी नहीं भूले हैं। और संबंधित यह भी नहीं भूले हैं कि अब किरण बेदी को मोदी सरकार ने उपराज्यपाल बना डाला है। वेलिंगकर को अगर हटाया गया तो ‘दबाव’ में। वही वेलिंगकर अब अपने नए ध्वज के साथ भाजपा को गोवा में परास्त कर हाशिये पर फेंक देने को कटिबद्ध हैं, जब समीक्षकों का एक वर्ग यह कहने लगा है कि ताजा वेलिंगकर-प्रयास वस्तुत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ही एक प्रयोग है। बिल्कुल दूर की कौड़ी! लेकिन, परिस्थितिजन्य साक्ष्य चुगली कर रहे हैं कि हां, गोवा संघ का एक ‘प्रयोगस्थल’ बनने जा रहा है। एक ऐसा प्रयोग जिसकी सफलता पूरे देश की राजनीति को बदल डालेगी। क्योंकि, तब एक नहीं अनेक सुभाष वेलिंगकर देश के विभिन्न भागों में अवतरित हो जाएंगे। और, उन सभी के निशाने पर केंद्रीय सत्ता होगी। दिलचस्प होगा तब यह देखना कि प्रत्युत्तर में भाजपा सत्ता और संगठन कौन से कदम उठाता है? संघ इसकी प्रतीक्षा करेगा…


सौजन्य : मीडिया सरकार

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