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    Published On : Tue, May 1st, 2018

    आरएसएस की शस्त्र पूजाः नागपुर पुलिस को नहीं पता, संघ के पास हैं कितनी बंदूकें और तलवारें

    RSS Arms Puja

    नागपुर: नागपुर पुलिस इस बात से भी अनजान है कि आरएसएस की शस्त्र पूजा में दिखने वाली बंदूकों, तलवारों के खुलेआम प्रदर्शन के लिए आरएसएस किसी की इजाजत लेता भी है या नहीं।

    हर साल दशहरे के मौके पर शस्त्रों की पूजा करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की तस्वीरें ज्यादातर लोगों ने देखी होंगी।  कंधे पर बंदूक ताने हजारों स्वयंसेवकों का पथ-संचालन भी हम में से ज्यादातर लोगों ने कभी-न-कभी जरूर देखा होगा। लेकिन हैरत की बात ये है कि नागपुर, जहां कि आरएसएस का मुख्यालय स्थित है, वहां की पुलिस को इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि आरएसएस की शस्त्र पूजा में दिखने वाले हथियारों का लाइसेंस किसके पास है? और उनका लाइसेंस लिया भी गया है या नहीं? इतना ही नहीं, नागपुर पुलिस इस बात से भी अनजान है कि आरएसएस की शस्त्र पूजा में दिखने वाली बंदूकों, तलवारों के खुलेआम प्रदर्शन के लिए आरएसएस किसी की इजाजत लेता भी है या नहीं।

    इस बात का खुलासा सूचना अधिकार अधिनियम-2005 के तहत अगस्त 2017 में नागपुर पुलिस आयुक्त मुख्यालय में दायर आरटीआई आवेदन के जवाब से हुआ है। याचिका दायर करने वाले मोहनिश जबलपुरे का कहना है कि याचिका दायर करने के बाद पुलिस की ओर से उन्हें जो जवाब मिला वो हैरान करने वाला था। जबलपुरे खुद नागपुर के ही रहने वाले हैं और उनका घर आरएसएस मुख्यालय से ज्यादा दूर नहीं है। मोहनिश का दावा है कि उन्होंने आरएसएस की शस्त्र पूजा को बचपन से देखा है। मीडिया से बातचीत के दौरान मोहनिश ने कहा, “हर साल रेशमबाग मैदान महल में होने वाली हथियार और शस्त्र पूजा में देश भर से हजारों की तादात में लोग शामिल होते हैं। संघ प्रमुख की पूजा के बाद आम लोगों को शस्त्रों की पूजा के लिए मौका दिया जाता है। शस्त्र पूजा का कार्यक्रम दिन भर चलता है।” रेशमबाग मैदान महल से आरएसएस मुख्यालय की दूरी तकरीबन 2 किलोमीटर है।

    जबलपुरे ने अगस्त 2017 में दायर अपने आवेदन में नागपुर पुलिस से पूछा था, “दशहरे के दिन आरएसएस शस्त्र पूजा करता है। इन शस्त्रों का लाइसेंस सरकार ने किसके नाम से जारी किया है? चुनाव के वक्त पुलिस हर तरह के हथियारों और अस्त्र-शस्त्र को अपने कब्जे में ले लेती है, तो क्या आरएसएस के हथियारों को भी कहीं जमा कराया जाता है? अगर हां, तो इस बारे मे जानकारी दी जाए।”नागपुर पुलिस ने जबलपुरे के आवेदन का जवाब अक्टूबर 2017 में दिया। पुलिस ने अपने जवाब में लिखा, “आपने जो जानकारी मांगी है, उस तरह के किसी भी अस्त्र-शस्त्र के लाइसेंस जारी करने के बारे में कोई भी जानकारी हमारे रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है।”आरएसएस से हथियारों के बारे में पूछताछ करने वाली याचिका का जवाब देने में नागपुर पुलिस ने लगभग एक महीने से ज्यादा का वक्त लिया। ये देरी हैरान करने वाली है। सूचना का अधिकार अधिनियम-2005 के मुताबिक पूछे गए किसी भी सवाल का जवाब एक महीने के अंदर देना होता है।

    जबलपुरे ने अक्टूबर 2017 में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत एक दूसरा आरटीआई आवेदन दाखिल किया, जिसमें उन्होंने नागपुर पुलिस से पूरे शहर में लगने वाली शाखाओं के बारे में जानकारी मांगी। जबलपुरे ने अपने आवेदन में पूछा, “आरएसएस की शाखा के माध्यम से लोग एक जगह जमा होते हैं। क्या आपने इसके लिए कोई इजाजत दी है। अगर हां, तो उसकी एक कॉपी उपलब्ध कराई जाए।” इसके जवाब में नागपुर पुलिस ने स्वीकार किया कि शहर के अलग-अलग कोनों में लगने वाली शाखा के लिए पुलिस से कोई इजाजत नहीं ली जाती है।जाहिर है, पुलिस का ये जवाब हैरान करने वाला है। जिन शाखाओं में डंडा चलाने से लेकर, निशानेबाजी और अस्त्र-शस्त्र चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है, उसके लिए आरएसएस के स्वयंसेवक पुलिस की इजाजत लेना भी जरूरी नहीं समझते। ऐसा नागपुर पुलिस ने लिखित में स्वीकार किया है।

    सूचना का अधिकार कानून के तहत पहला आवेदन दाखिल करने के बाद जबलपुरे ने नागपुर के पुलिस आयुक्त के समक्ष सितंबर, 2017 में एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने आरएसएस के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। 27 सितंबर, 2017 को दर्ज कराई गई लिखित शिकायत में जबलपुरे ने पुलिस से मांग की थी कि आरएएस की शस्त्र पूजा में लाए गए हथियारों को तुरंत जब्त किया जाए। आरएएस पर प्रतिबंध लगाने की मांग करते हुए जबलपुर ने अपनी शिकायत में मुख्य रूप से तीन बिंदुओं को रेखांकित कियाः

    1) आरएसएस संपूर्ण भारत में छोटे बच्चों को हथियारों का प्रशिक्षण देता है जो कि गैरकानूनी है।

    2) बिना सरकार की इजाजत के आरएसएस के स्वयंसेवक हथियारों के साथ पथ संचालन करते हैं जो कि कानून का उल्लंघन है।

    3) आरएसएस की शस्त्र पूजा में जो मंत्री या सरकारी अधिकारी शामिल होते हैं उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।

    जबलपुरे ने न सिर्फ नागपुर पुलिस आयुक्त कार्यालय बल्कि कोतवाली पुलिस स्टेशन में भी आरएएसएस के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन कहीं कोई कार्रवाई नहीं हुई। संघ मुख्यालय पुलिस स्टेशन कोतवाली के ही अंतर्गत आता है। मोहनिश जबलपुरे का दावा है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में पुलिस आयुक्त कार्यालय से जानकारी मांगने के बाद उन्हें धमकी भरे फोन आने लगे, जिसके बारे में उन्होंने 5 अक्टूबर, 2017 को पुलिस आयुक्त कार्यालय में लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में जबलपुरे ने मोबाइल नंबर- 7972557102 से धमकी मिलने का आरोप लगाया और कहा कि खुद नागपुर पुलिस ने उन्हें आरएसएस के खिलाफ आवाज न उठाने की नसीहत दी।

    अपनी शिकायत में जबलपुरे ने कहा कि किसी यादव नाम के शख्स ने उन्हें कॉल किया था और थाने में बुलाकर धमकी भरे अंदाज में पुलिस ने उनसे कहा, “तुम्हारी शिकायत पर कुछ नहीं होगा। तुन्हारा समय और मेहनत बेकार जाएगी। हिंदुस्तान में दशहरे के दिन लोग जैसे गाड़ियों की पूजा करते हैं वैसे ही आरएसएस दशहरे के दिन हथियारों की पूजा करता है। इसमें गलत क्या है? ”

    गलत-सही का फैसला अदालत में किया जाता है, लेकिन आरएसएस के बारे में सवाल उठाने वाली आवाज को डराने का पुलिस का ये रवैया जानकारों की निगाह में कानून और संविधान के खिलाफ है। पुलिस के रवैये और आरएसएस की ताकत का जिक्र करते हुए जब मोहनिश से ये पूछा गया कि क्या उन्हें किसी तरह का डर नहीं लगता? इस पर दार्शनिक अंदाज में उन्होंने जवाब दिया, “किसी दिन हो सकता है आपको मेरे बारे में भी खबर लिखनी पड़े कि ट्रक से कुचलकर या फिर गोली लगने से आरटीआई कार्यकर्ता मोहनिश की मौत हो गई। लेकिन मेरे सामने बड़ा सवाल ये है कि डरने से क्या हासिल होगा। आरएएसएस देश और संविधान के साथ जो खिलवाड़ कर रहा है उसके खिलाफ किसी न किसी को तो संघर्ष करना होगा।”


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