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    Published On : Wed, Aug 1st, 2018
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    RBI ने ब्याज दरों में की 0.25% की बढ़ोतरी

    भारतीय रिजर्व बैंक ने ब्याज दरों में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर दी है. इस बढ़ोतरी के साथ रेपो रेट 6.50 फीसदी पर पहुंच गया है. विशेषज्ञों ने भी यह अनुमान जताया था कि इस बार आरबीआई ब्याज दरों में बढ़ोतरी करेगा.

    ब्याज दरों में हुई इस बढ़ोतरी का सीधा असर आपकी जेब पर पड़ेगा. रेपो रेट के बढ़ने से बैंकों से आपके लिए होम लोन और ऑटो लोन समेत अन्य कर्ज लेना महंगा साबित होगा. इसकी वजह से अब आपकी जेब पर ज्यादा ईएमआई का बोझ पड़ेगा.

    आरबीआई की मौद्रिक नीति समित‍ि ने वित्त वर्ष 2019 की दूसरी त‍िमाही में महंगाई के 4.6 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है. वहीं, वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही में इसके 5 फीसदी पर पहुंचने का अनुमान लगाया गया है.

    भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतो में पिछले कुछ दिनों में थोड़ी नरमी आई है. लेक‍िन अभी भी इसकी कीमतें काफी ज्यादा हैं.

    मौद्र‍िक नीति समित‍ि ने कहा कि घरेलू स्तर पर महंगाई को लेकर अनिश्च‍ितता का दौर है. इसलिए आने वाले महीनों में इस पर करीब से नजर बनाए रखने की जरूरत है.

    मॉनसून पर है नजर रखने की जरूरत

    एमपीसी ने कहा कि वैश्व‍िक स्तर पर वित्तीय बाजार में जारी उतार-चढ़ाव के असर के चलते इंफ्लेशन आउटलुक अनिश्च‍ित बना हुआ है. समिति ने मॉनसून को लेकर कहा कि फिलहाल मॉनसून देश भर में सामान्य रहा है. लेक‍िन आने वाले दिनों में इसके क्षेत्रीय वितरण पर नजर बनाए रखने की जरूरत है. धान के मामले पर ज्यादा नजर बनाए रखना होगा.

    मौद्रिक नीति समिति ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य का महंगाई पर क्या असर पड़ता है, इसका असर अगले कुछ महीनों में ही सामने आ पाएगा, जब प्राइस सपोर्ट स्कीम लागू की जाएगी.

    ये है जीडीपी अनुमान

    वित्त वर्ष 2018-19 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) ग्रोथ को 7.4 फीसदी पर ही रखा गया है. एमपीसी के मुताबिक इसके पहली छमाही में 7.5 से 7.6 के बीच रहने का अनुमान है. वहीं, दूसरी छमाही में यह 7.3 से 7.4 फीसदी के बीच रह सकता है.

    निवेश हुआ है बेहतर

    आरबीआई गवर्नर ने बताया कि वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही के लिए महंगाई का अनुमान पहली बार लगाया गया है. वहीं, एमपीसी ने कहा कि हाल के महीनों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ने का और घरेलू स्तर पर पूंजी बाजार की बेहतर स्थ‍ितियों ने निवेश को बेहतर करने में मदद की है.

    केंद्रीय बैंक के डेप्यूटी गवर्नर विरल आचार्य ने कहा कि महंगाई पर एमएसपी का असर एक चुनौतिपूर्ण टास्क है. विरल आचार्य ने कहा कि वह रेजिडेंट्स के लिए फॉरेन एक्सचेंज डेरीवेटिव्ज की समीक्षा करेंगे और हेजिंग ट्रांजैक्शन को प्रोत्साहन देंगे.

    उन्होंने बताया कि सभी शेयर बाजारों के टाइमिंग की समीक्षा करने की खातिर एक इंटरनल ग्रुप बनाया जाएगा. यह ग्रुप न सिर्फ मार्केट की टाइमिंग्स को रिव्यू करेगा. इसके साथ ही यह पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर को भी बेहतर करने पर फोकस करेगा.

    आरबीआई के डेप्यूटी गवर्नर एनएस विश्वनाथन ने कहा कि आरबीआई प्राथम‍िक (शहरी) को-ऑपरेटिव बैंकों को सेकंडरी मार्केट में अध‍िग्रहण और नॉन-एसएलआर निवेश को लेक‍र म्युचुअल फंड्स, पेंशन/प्रोविडेंट फंड्स और इंश्योरेंस कंपनियों के साथ डील कर सकते हैं.

    बता दें कि इससे पहले जून में भारतीय र‍िजर्व बैंक ने रेपो रेट की दरों में बढ़ोतरी की घोषणा की थी. आरबीआई ने इस दौरान 25 बेस‍िस प्वाइंट की बढ़ोतरी की थी. रेपो रेट में हुई इस बढ़ोतरी के बाद रेपो रेट 6 फीसदी से बढ़कर 6.25%. फीसदी हो गया था. मोदी सरकार के 4 साल के कार्यकाल में यह पहली बार हुआ था, जब आरबीआई ने रेपो रेट की दरें बढ़ाईं.

    आरबीआई के इस फैसले के बाद कई बैंकों ने लोन की दरें बढ़ा दी थीं. इस दौरान आरबीआई ने रेपो रेट को बढ़ाने के साथ ही रिवर्स रेपो रेट को भी 6 फीसदी कर दिया था.

    भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति हर दो महीने में बैठक करती है. इस बैठक में अर्थव्यवस्था के हालातों को देखकर ब्याज दरें बढ़ाने, घटाने या उनमें कोई बदलाव न करने का फैसला लिया जाता है.

    इस बार आरबीआई के सामने कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी और रुपये के कमजोर होने की सबसे बड़ी चुनौती थी. इसके अलावा सरकार की तरफ से किसानों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाए जाने की घोषणा के बाद रेपो रेट में बदलाव करने को लेकर आरबीआई के सामने चुनौती खड़ी थी.

    आरबीआई के फैसले से पहले कुछ विशेषज्ञों ने अनुमान लगाया था कि आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाएगा. हालांकि कुछ का कहना था कि आरबीआई इस बार रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं करेगा.

    क्या होता है रेपो रेट?

    रेपो रेट वह दर होती है, जिस पर बैंक आरबीआई से लोन उठाते हैं. जब भी बैंकों के पास फंड की कमी होती है, तो वे इसकी भरपाई करने के लिए केंद्रीय बैंक से पैसे लेते हैं. आरबीआई की तरफ से दिया जाने वाला यह लोन एक फिक्स्ड रेट पर मिलता है. यही रेट रेपो रेट कहलाता है. इसे हमेशा भारतीय र‍िजर्व बैंक ही तय करता है.


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