Published On : Thu, Aug 10th, 2017

जो थे कभी रेमंड के राजा, आज खटखटा रहे कोर्ट का दरवाजा!

Vijaypath Singhania

Vijaypath Singhania (File Pic)


नई दिल्ली:
कहते हैं वक्त से बड़ा बादशाह कोई नहीं होता… वक्त ऐसी शह है जिसकी मात से कोई नहीं बच सका. इतिहास गवाह है कि वक्त की बेरहम मार ने बड़े से बड़े राजाओं के सिंहासन हिला दिए और वहीं वक्त जब मेहरबान हुआ तो रंक को भी राजा बना दिया. लेकिन आधुनिक संदर्भों में अब न राजा रहे न राजपाठ. अब तो अरबों की कंपनियां हैं और उनके दिग्गज मालिक, लेकिन वक्त का पहिया अपनी जगह बरकरार है. इन दिनों एक ऐसी शख्सियत वक्त की मार झेल रही है जो देश की जानी-मानी कंपनी रेमंड के कर्णधार रहे हैं. जी हां हम बात कर रहे हैं उद्योगपति विजयपत सिंघानिया की, जिन्होंने अपनी मेहनत से रेमंड को सींचकर आज विशाल वटवृक्ष बनाया है. लेकिन आज वे इतने तंगहाल हैं कि पाई-पाई को मोहताज हो गए हैं. जी हां, 12000 करोड़ की कंपनी के मालिक आज अपने बेटे की बेरुखी के चलते मुफलिसी की जिंदगी जीने को मजबूर हो गए हैं. आज आलम यह है कि वे अपने ही बेटे के खिलाफ लगातार कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं.

छिन गया घर, आए सड़क पर
एक जमाना था जब विजयपत सिंघानिया कभी ब्रिटेन से अकेले प्लेन उड़ाकर भारत आ जाते थे. मुकेश अंबानी के एंटीलिया से भी ऊंचे घर जेके हाउस में रहा करते थे. आज स्थिति ये है कि उन्हें उसी जेके हाउस में अपने ड्यूपलेक्स घर के पजेशन के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा है. उनका दावा है कि बेटे ने उनसे गाड़ी और ड्राइवर भी छीन लिया है और उनके पास पैदल चलने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. वह फिलहाल दक्षिणी मुंबई में एक किराए के मकान में रहने को मजबूर हैं.

2015 में बेटे को दे दी थी कंपनी
तब तक सबकुछ अच्छा था जब तक कि विजयपत सिंघानिया ने कंपनी की बागडोर खुद संभाल रखी थी। लेकिन 2015 में अपनी कंपनी के सारे शेयर अपने बेटे गौतम सिंघानिया को देने के बाद धीरे-धीरे उन्हें बेटे का असली रंग दिखने लगा. इन शेयर की कीमत उस वक्त 1000 करोड़ रु पये थी. विजयपत के वकील दिनयार मडोन के मुताबिक मालाबार हिल स्थित जेके हाउस 1960 में बना था. उस वक्त उसमें 14 फ्लोर थे. कुछ दिनों के बाद जेके हाउस में 4 ड्यूपलेक्स रेमंड की सिब्सडरी कंपनी पश्मिना होल्डिंग्स को दे दिए गए. 2007 में कंपनी ने इस बिल्डिंग को फिर से बनवाने का फैसला लिया. फिलहाल इसमें 37 फ्लोर हैं. डील के मुताबिक विजयपत सिंघानिया, गौतम सिंघानिया, विजयपत के भाई अजयपत की पत्नी वीना देवी के अलावा वीना के दो बेटों अनंत और अक्षयपत को एक-एक ड्यूपलेक्स मिलने थे. सभी लोगों ने अपने-अपने हिस्से की जमीन के लिए याचिका दायर कर रखी है. सिंघानिया का आरोप है कि गौतम ने कंपनी का सीएमडी होने का गलत फायदा उठाते हुए चारों ड्यूपलेक्स अपने नाम कर लिए हैं.

वो संघर्ष का सफर, नतीजा सिफर
दुनियाभर में अपने कपड़ों की वजह से अलग पहचान रखने वाली रेमंड कंपनी 1925 में बनी थी. इसका पहला रिटेल शो रूम 1958 में मुंबई में खुला था. कपड़ों के अलावा कंपनी टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग और एविएशन के क्षेत्र में भी काम कर रही थी. विजयपत सिंघानिया ने 1980 में रेमंड कंपनी की कमान संभाली और उसके बाद इसका स्वरूप आधुनिक हो गया. 1986 में सिंघानिया ने रेमंड का प्रीमियम ब्रांड पार्क एवेन्यु लॉन्च किया. फैशनेबल कपड़ों की नई रेंज लॉन्च की और 1990 में देश के बाहर ओमान में कंपनी का पहला विदेशी शो रूम खोला. 1996 में सिंघानिया ने देश में एयर चार्टर सेवा शुरू की. उन्होंने 1988 में लंदन से भारत के बीच अकेले उड़ान भरी.

पाए बहुत सम्मान, बस घर में न मिला मान
उन्हें भारत सरकार की ओर से 2006 में उन्हें पद्म भूषण से भी नवाजा जा चुका है. सिंघानिया ने ‘ऐन एंजल इन अ कॉकपिट’ नाम से किताब भी लिखी है, जो लंदन से भारत के बीच उनकी उड़ान पर लिखी गई है. 67 साल की उम्र में हॉट एयर बलून से सबसे अधिक ऊंचाई पर उड़ान भरने का विश्व रिकॉर्ड भी सिंघानिया के नाम है. उनके पास पांच हजार से अधिक घंटे तक उड़ान भरने का अनुभव है. 1994 में फेडरेशन एयरोनॉटिक इंटरनेशनल की ओर से आयोजित एयर रेस में 24 दिनों में 34000 किलोमिटर की यात्रा कर उन्होंने गोल्ड मेडल जीता था. उनकी इस उपलिब्ध पर इंडियन एयरफोर्स की ओर से उन्हें एयर कोमोडोर की उपाधि से नवाजा गया था. 2005 में उन्हें रॉयल एयरो क्लब की ओर से गोल्ड मेडल दिया गया था. वो 20 दिसंबर 2005 से 19 दिसंबर 2006 तक मुंबई के शेरिफ भी रहे हैं.

22 अगस्त को अगली सुनवाई
सिंघानिया अब अपने ही बेटे के खिलाफ कोर्ट पहुंच गए है. उन्होंने बेटे से घर से अलावा हर महीने 7 लाख रु पये की मांग की है जो कंपनी के नियमों के तहत है. हालांकि रेमंड कंपनी की ओर से कोर्ट में पेश हुए वकील जनक द्वारकादास ने बताया कि इस साल जून में हुई कंपनी की एनुअल जनरल मीटिंग में सिंघानिया को ड्यूपलेक्स और सात लाख रु पये हर महीने देने की मांग शेयरहोल्डर्स ने ठुकरा दी है. कोर्ट में यह केस जस्टिस गिरीश कुलकर्णी के पास है. उन्होंने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद यह मामला कोर्ट के बाहर ही हल हो जाना चाहिए था. हालांकि जस्टिस कुलकर्णी ने दोनों पक्षों को 18 अगस्त से पहले अपना पक्ष रखने को कहा है. इस मामले की अगली सुनवाई 22 अगस्त को होनी है, जिसपर सबकी निगाहें टिकी हैं.