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    Published On : Wed, Jan 11th, 2017
    nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

    बाघ से ज्यादा उसके शिकार का संरक्षण जरूरी : के. उल्लास कारंथ

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    नागपुर:
    बाघों के संरक्षण से बड़ा मसला उसके शिकारों के संरक्षण का है। शिकार अर्थात पशुधन का अनुपात कम होने से बाघों की संख्या कम होगी। क्योंकि उनके द्वारा किए गए अध्ययन में देखने में आया है कि प्रत्येक बाघ हफ्ते में एक बार हिरण या चिंकारा जैसे बड़े जानवर का शिकार करता है। अर्थात एक बाघ को तकरीबन 500 पशुधन की आवश्यकता होती है। इसी तरह पशुधन की सघनता क्षेत्र में कितनी है यह भी एक बड़ा कारण हो सकता है। यह बात मशहूर बाघ संरक्षक जीवविज्ञान शास्त्री पद्मश्री पुरस्कार प्राप्तकर्ता के. उल्हास करांथ ने बुधवार को सेमिनरी हिल्स परिसर में वन सभागृह में आयोजित पत्रकारों से बातचीत कार्यक्रम के दौरान कही।

    इस दौरान प्रधान मुख्यवन्यजीव संरक्षक(वन्यजीव)श्री भगवान, अतिरिक्त प्रधआन मुख्य वनसंरक्षक सुनीता सिंह, गिरीष वशिष्ठ, एम.एस. रेड्डी, शेषराव पाटील, पक्षी विशेषज्ञ गोपाल थोसर व अन्य एनजीओ प्रतिनिधि व पत्रकार मौजूद थे। उन्होंने आगे कहा कि देश में बाघों के शिकार कर उसकी तस्करी का बड़ा कारण पहले चीन में आया आर्थिक उछाल था। तब चीन के मध्यमवर्ग से उच्च वर्ग में पहुंचे चीनी परिवार बाघ का मांस भक्षण और अंग खरीदी अपने स्टेटस को दर्शाने के लिए किया गया। इसके लिए भारत में बाघों के शिकार के मामले कई हुए।

    उन्होंने कहा कि 1960 के दशक में जब मैने वन्यजीवों पर काम करना शुरू किया तो बाघों की संख्या बहुत कम हो गई थी। शिकार के मामले कई बढ़ गए थे। लेकिन आज लोगों के बीच जागरुकता और संरक्षण और संवर्धन को प्रोत्साहन देने का ही यह नतीजा है कि बाघों की आज देश में संख्या बढ़ते जा रही है। मेरे अनुमान से आज देश में तकरीबन 10 हजार से अधिक बाघ हैं।

    उन्होंने बताया कि बाघों की मौत को लेकर किए गए अध्ययन में पाया गया कि सबसे बाघों की मौत अक्सर भूख से तड़प तड़प कर होती है। वह शिकार के चक्कर में अपने अंतिम दिनों में घायल हो जाता है और घाव ठीक ना हो पाने के कारण वह कमजोर हो जाता है और मौत का शिकार हो जाता है। बाघों की मौत में अज्ञात कारण का प्रमाण अधिक है। इसके बाद प्राकृतिक ढंग से होनेवाली मौत का प्रमाण दूसरा है जबकि शिकार आज सबसे कम हो रहे हैं। इसकी संख्या भी घटते जा रही है। बाघों के संरक्षण के लिए आरक्षित वनों के योगदान को लेकर पूछे गए सवाल पर उन्होंने कहा कि वे इससे असहमत हैं।

    वन विभाग द्वारा जो आरक्षित वन घोषित किए गए हैं उनमें से कईयों में कहीं ना कहीं किसी ना किसी क्षेत्रीय और राजनीतिक दल का दबाव होने के कारण आरक्षण लाया जाना दिखाई पड़ता है। वन क्षेत्र आरक्षित भर कर देने से काम नहीं चलता वन्यजीवों के िलए प्रचुर भोजन पशुधन की उपलब्ध संख्या भी मायने रखती है। आरक्षित वनों के भीतर लाइव स्टॉक की सघनता की उपलब्धता को ध्यान में नहीं रखा गया। ऐसे में बाघ जैसे वन्यजीव ऊपरी तौर पर संरक्षित क्षेत्र में सुरक्षित दिखाई पड़ते हैं लेकिन शिकार के आभाव में वे सबसे ज्यादा असुरक्षित होते हैं।


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