Published On : Mon, Jan 8th, 2018

मनपा स्कूलों के विद्यार्थीयो को लेकर गए निजी स्कूल


नागपुर:नागपुर महानगर पालिका की स्कूलों की बदहाली विद्यार्थियों के भविष्य को खतरे में डालने का काम कर रही है. प्रभाग 24 के हजारी पहाड़ की एकलव्य मराठी उच्च प्राथमिक शाला में नर्सरी से लेकर आठवीं तक कुल मिलाकर 58 विद्यार्थी ही पढ़ते हैं. जबकि यहां पढ़ानेवाले शिक्षकों की संख्या स्कूल इंचार्ज को मिलाकर 8 है. स्कूल में 1 सफाईकर्मी भी हैं और एक चपरासी है. 11 बजे से लेकर 5 बजे तक स्कूल शुरू रहती है. शौचालय की हालत काफी खराब है तो विद्यार्थियों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था भी खराब ही दिखाई दी. एक वाटरकूलर लगाया गया है. लेकिन वह भी ख़राब हो चुका है. स्कूल भले ही छोटी है. लेकिन स्कूल का मैदान करीब 15 हजार चौरस फीट में फैला हुआ है. स्कूल परिसर में कंपाउंड बनाया गया है, लेकिन चारों तरफ से स्कूल के कंपाउंड को लोगों ने अपनी सुविधा के लिए गिरा रखा है. पेड़, पौधों के नाम पर दो छोटे पेड़ दिखाई दिए. कुल मिलाकर स्कूल की व्यवस्था कुछ ख़ास नहीं है. लेकिन इससे भी गंभीर बात यह है कि अगर क्लास के अनुसार विद्यार्थियों की संख्या की बात करें तो वह भी चिंताजनक ही है.

विद्यार्थियों की संख्या क्लासनुसार
नर्सरी में 10 बच्चे ही हैं. पहली कक्षा में 9 विद्यार्थी, दूसरी में 5, तीसरी में 6, 4थी कक्षा में 11 विद्यार्थी है. 5वी में 6 विद्यार्थी है. 6वी में 4 विद्यार्थी है. 7 वी में 4 विद्यार्थी है और 8वी में केवल 3 विद्यार्थी है. कुल मिलाकर केवल 58 विद्यार्थी यहाँ पढ़ते है. नर्सरी के 10 बच्चे अलग कर दिए जाएं तो केवल 48 बच्चे ही यहां के विद्यार्थियों की संख्या है. शिक्षकों की माने तो पहले स्कूल में 350 के करीब विद्यार्थी पढ़ते थे. लेकिन आसपास के 3 किलोमीटर के दायरे में कई स्कूलों के शुरू होने की वजह से इस मनपा स्कूल के बच्चों की संख्या घटती गई. शिक्षकों के अनुसार विद्यार्थी बढ़ाने के उद्देश्य से घर घर जाकर बच्चों के अभिभावकों को मनाया जाएगा.


क्यों है विद्यार्थियों की संख्या कम
शिक्षकों के अनुसार आसपास में कई इंग्लिश मीडियम स्कूले हैं. उन स्कूलों की ओर से यहां के बच्चों के अभिभावकों को बहकाया जाता है और उनसे कहा जाता है कि इस मनपा की स्कूल में पढ़कर कोई फायदा नहीं है. स्कूलों की ओर से इनके अभिभावकों को यह भी कहा जाता है कि स्कूल में अगर यह प्रवेश करे तो इन्हें डोनेशन नहीं देना होगा और स्कूल की तरफ से बच्चों को ड्रेस भी दिया जाएगा. महीने की फीस भी नहीं ली जाएगी. जिसके कारण विद्यार्थियों के अभिभावक अपने बच्चों को इन मनपा स्कूलों में पढ़ाने से बेहतर इन निजी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ाने का विचार करते हैं. शिक्षकों ने बताया कि कुछ वर्ष पहले इन्होने दूर से आनेवाले करीब 50 बच्चों के लिए स्कूलों बस लगायी थी. जिसका पैसा स्कूल के शिक्षकों की ओर से ही दिया जाता था. लेकिन इन निजी स्कूल के प्रबंधन की ओर से स्कूल बस के ड्राइवर से बात की गई और स्कूल बस के विद्यार्थियों के अभिभावकों से मुलाक़ात कर सभी बच्चों को उनकी निजी स्कूलों में एडमिशन दिया गया. जिसकी शिकायत भी मनपा के वरिष्ठ अधिकारियों से की गई थी. लेकिन फिर भी कोई ठोस कदम मनपा के शिक्षा विभाग की ओर से नहीं उठाया गया. अब यह सवाल उठता है कि निजी स्कूल के इतने बड़े प्रयास के बाद भी मनपा के अधिकारियों ने सम्बंधित स्कूलों पर कार्रवाई क्यों नहीं की.

विद्यार्थियों के लिए क्या सुविधाएं हैं
विद्यार्थियों को सुविधा देने के नाम पर स्कूलों में शिक्षा, शौचालय और साफ़ पानी मुख्य होता है. लेकिन शौचालय और पीने के पानी की व्यवस्था ठीक नहीं है. विद्यार्थियों को बैठने के लिए बेंच ठीक ठाक है. लेकिन कई वर्गों में विद्यार्थियों की संख्या कम होने की वजह से शिक्षक भी कम दिखाई दिए. बच्चों को खेलने के लिए मैदान तो है लेकिन वहां पर कोई भी खिलौना नहीं दिखाई दिया. नर्सरी होने की वजह से परिसर में छोटे बच्चों के लिए खिलौने होने चाहिए थे. लेकिन ऐसा कुछ भी एकलव्य मराठी उच्च प्राथमिक शाला में नहीं दिखाई दिया. स्कूल के शिक्षकों ने बताया कि पहले मनपा की ओर से किसी को कंप्यूटर से सम्बंधित ठेका दिया गया था. कुछ दिनों तक कंप्यूटर स्कूल में थे. जिससे विद्यार्थी भी कंप्यूटर सीख रहे थे. लेकिन मनपा की ओर से कंप्यूटर भी वापस ले लिए गए हैं. स्कूल में अब एक भी कंप्यूटर नहीं है. स्कूल के शिक्षकों को भी स्कूल से सम्बंधित काम करवाने के लिए बाहर जाना पड़ता है.


क्या कहते हैं स्कूल के शिक्षक
स्कूल की इंचार्ज मालती बगले हैं. हालांकि वह अपने कक्ष में मौजूद नहीं थी. जिसके बाद स्कूल के शिक्षकों ने स्कूल से संबंधित जानकारी दी. शिक्षकों ने बताया कि मनपा की ओर से शिक्षको को अन्य काम भी करने पड़ते हैं. चुनाव का काम साल भर दिया जाता है. जिसके कारण विद्यार्थियों की पढ़ाई का नुक्सान होता है. विद्यार्थियों की संख्या कम होने को लेकर सभी शिक्षकों ने निजी स्कूलों को जिम्मेदार ठहराया है.



—शमानंद तायडे