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    Published On : Thu, May 17th, 2018

    सुरक्षा के नाम पर घोटाले की प्लान

    Emta Coal Mines

    File Pic

    नागपुर: कोयला मंत्रालय अंतर्गत कोल् इंडिया ने हाल ही में एक पत्र जारी कर वेस्टर्न कोल्फ़ील्ड्स लिमिटेड की कार्यशैली को सबसे आखरी पायदान पर रखा. जिसकी वजह भी एकदम साफ है कि यहां काम कम और काम तमाम ( घोटाले, धांधली, हेराफेरी ) चरम सीमा पर पहुंच गई है. इसे व्यवस्थित करने के बजाय यहां का मुखिया मुख्य सतर्कता विभाग को पक्ष में लेकर कोल इंडिया के चेयरमैन बनने का सपना देख रहा है. नागपुर टुडे ने स्कूल बस ठेका प्रकरण को प्रमुखता से प्रकाशित किया. इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी और ठेकेदार पर कार्रवाई के बजाय लीपापोती का काम किया जा रहा है. इसी क्रम में वेकोलि खदानों में सुरक्षा के लिए आपूर्ति की जाने वाली सिल्ली और बल्ली घोटाले का मामला प्रकश में आया.

    वेकोलि खदान में सुरक्षा की दृष्टि से कई दशकों से लकड़ी की बल्ली और सिल्ली का इस्तेमाल किया जाता है. वैसे लोहे के खम्बों का भी इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन लकड़ी की बल्ली-सिल्ली काफी लाभप्रद सिद्ध हुए हैं. बल्ली पर भार पड़ने से टेढ़ी या मुड़ने लगती और या फिर टूटने की कगार पर पहुंची तो खदान में काम करने वाले सतर्क हो जाते हैं. इसलिए कोल इंडिया के निर्देश के बाद वेकोलि में सालाना २० से २५ करोड़ की बल्ली-सिल्ली खरीदी का ठेका निकलता है.

    ओपन टेंडर नहीं निकाला जाता
    वेकोलि शुरुआत से ही बल्ली-सिल्ली की खरीदी हेतु ओपन टेंडर निकालने के बजाय ‘लिमिटेड क्लास’ के लिए टेंडर जारी करता है. तर्क यह दर्शाया जाता है कि ओपन टेंडर जारी करने से हज़ारों आपूर्तिकर्ता टेंडर में भाग लेंगे और कीमत के साथ गुणवत्ता से समझौता करना पड़ेगा. जबकि मूल कारण यह है कि गिने-चुने ही भाग लें और हेराफेरी सीमित लोगों तक ही रहे.

    चुनिंदा में से चुने हुए को देते हैं तरजीह
    इस टेंडर प्रक्रिया में महाराष्ट्र स्टेट स्मॉल इंड्रस्ट्रीज डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एमएसएसआईडीसी), एनएसआईसी,एफडीसीएम सहित मध्यप्रदेश व आंध्रप्रदेश सह अन्य राज्यों के अर्ध सरकारी एजेंसी/विभाग को ही भाग लेने दिया जाता है. टेंडर प्रक्रिया में एमएसएसआईडीसी के अलावा कोई सफल हुआ तो इनसे ‘सैंपल आर्डर’ दिया जाता है. इस ‘सैंपल आर्डर’ में खोट-खराबी निकाल कर उसे ‘रिजेक्ट’ कर दिया जाता था. ‘सैंपल आर्डर’ का माल ‘रिजेक्ट’ होने के बाद मॉल छोड़ देते थे, क्यूंकि उसे ले जाने में लगने वाला खर्च नुकसानदेह होता था. इसके बाद वेकोलि का सम्बंधित विभाग पुनः टेंडर निकालता है, इसमें न्यूनतम दर सार्वजानिक होने से एमएसएसआईडीसी को ही तय रणनीति के तहत अंततः ठेका मिलता रहा है.

    एमएसएसआईडीसी में धांधली
    एमएसएसआईडीसी में २० से २५ टिंबर वाले पंजीकृत हैं. फिर भी सिर्फ आधा दर्जन खास टिंबर वाले को अनुभव आदि के आधार दर्शाकर बल्ली-सिल्ली आपूर्ति का काम दिया जाता रहा है. इनमें सीएम बगड़िया, खंडूजा शॉ मिल, चंद्रपुर का इकबालसिंह सोनी, चंद्रपुर का सफेदपोश चंदेल, मोहनलाल-किशनलाल, परासिया का हर्षद भाई लाभार्थियों में शामिल है. सभी आपूर्तिकर्ता वेकोलि के क्षेत्र का बंटवारा भी कर सक्रिय है. फिलहाल कुछ साल से हर्षद के साथ अन्य दो ने आपूर्ति करने का काम बंद कर दिया है.

    बल्ली-सिल्ली आपूर्ति पद्दति
    १/- सिल्ली (स्लीपर) का आकर ४ फुट लम्बा,४ इंच मोटा और ४ इंच चौड़ा होता है. एक अन्य आकर ४ बाय ३ की सिल्ली खरीदी जाती है. निविदा के अनुसार ४ बाय ४ की ६०% और ४ बाय ३ की ४०% खरीदी की निविदा जारी की जाती है और एमएसएसआईडीसी के मार्फ़त आपूर्ति करने वालों से ४ बाय ४ की १०% और ४ बाय ३ की ९०% सिल्ली मंगवाई जाती है. जिसमें से ४ बाय ४ की सिल्ली स्टोर में ‘डिस्प्ले’ के लिए रखी रहती और ४ बाय ३ की सिल्ली खदान में उतार दी जाती है. क्यूंकि एक बार उतरी हुई सिल्ली का किसी भी प्रकार से अंकेक्षण नहीं किया जा सकता है.

    २/- बल्ली का आकार २ से ३ मीटर ,३ से ४ मीटर,४ से ५ मीटर, ५ से ६ मीटर लम्बी होती है. इसका ‘सेंटर गर्थ’ क्रमशः ३० से ६० के मध्य अलग-अलग होता है. वेकोलि के टेंडर में अंकित मांग के विपरीत जाकर वेकोलि के सम्बंधित विभाग ३ से ४ मीटर वाली बल्ली मंगवाई जाती है. दिखावे के लिए ५ से ६ मीटर वाली बल्ली ‘डिस्प्ले’ में रखी जाती है.

    माल जांचने वाला जिम्मेदार कोई नहीं
    आपूर्ति की गई सिल्ली-बल्ली की जांच खदान प्रबंधक भी नहीं करते, जबकि क्षेत्रीय कार्यालय के सम्बंधित अधिकारी को करना चाहिए. आपूर्ति की जाने वाले सिल्ली-बल्ली में अच्छे माल को खदान के ऊपर और निम्न दर्जे के माल को आनन फानन में खदान में ‘शिफ्ट’ कर दिया जाता है. फिर आपूर्ति किए गए माल का चालान खदान का स्टोर कीपर जब तक आपूर्ति की माल ठिकाने नहीं लगती तब तक रखते हैं. अंत में स्टोर कीपर से होते हुए चालान क्षेत्रीय कार्यालय पहुँचता है. दूसरी तरफ चालान की दूसरी प्रति आपूर्तिकर्ता ठेकेदार बिल के साथ एमएसएसआईडीसी को सौंपते हैं. फिर एमएसएसआईडीसी अपना फाइनल बिल बनाकर वेकोलि के वित्त विभाग को सौंपती है.

    कैसे होता है भुगतान का बंदरबांट
    एमएसएसआईडीसी समय-समय पर वेकोलि को बिल देती है, जिसका बिना आनकानी किए भुगतान भी समय पर होता रहा है. एमएसएसआईडीसी अपने आपूर्तिकर्ता को उनके बिल का २% ( लीगल कमीशन ) काट कर भुगतान करती है. मिले कार्यादेश राशि का १० से १२ % वेकोलि मुख्यालय के दिग्गज अधिकारी से लेकर वित्त विभाग के सम्बंधित अधिकारी अग्रिम वसूल ले लेते हैं. भुगतान होने के बाद क्षेत्रीय कार्यालय के ऊपर से लेकर सम्बंधित आधा दर्जन अधिकारी १० से १२ %, जिस खदान में आपूर्ति की गई, उस खदान के प्रमुख सहित ३ से ४ अधिकारी-कर्मी ५ से ६ % कमीशन के लाभार्थी होते हैं. इतना ही नहीं और अंत में एमएसएसआईडीसी, जिन्होंने काम दिया, वहां के सम्बंधित अधिकारी ५ से ६ % कमीशन लेते हैं.

    अर्थात सिल्ली-बल्ली के आपूर्तिकर्ता मिले कार्यादेश की राशि का कम से कम ३५ से ४० % राशि कमिशन के रूप में बांटते हैं. इसके अलावा तीज-त्यौहार, पार्टी, किराये की गाड़ी, कीमती सामान अलग देने पड़ते हैं. याने सिल्ली-बल्ली के आड़ में सुरक्षा दाव पर लगा हज़ारों मजदूरों के जान से खिलवाड़ का क्रम कई दशकों से नियमित जारी है. समय रहते केंद्रीय कोयला मंत्री, डीजीएमएस, कोल् इंडिया ने मामले में हस्तक्षेप नहीं किया तो मोदी फाउंडेशन सह कुछ जागरुक मजदूर नेता न्यायालय की शरण में जाकर न्याय की गुहार लगाएंगे.


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