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    Published On : Thu, Nov 26th, 2020

    बस ऑपरेटरों की लालफीताशाही से यात्री परिवहन सेवाएं बेहाल

    – परिवहन निगमो का दिवाला निकला, बिना टिकट मनमाना किराया वसूली,जी एस टी की चोरी,मप्र-महाराष्ट्र सीमावर्ती नागरिक परेशान

    नागपुर: मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र राज्य परिवहन निगम द्वारा प्रदत्त यात्री बसों मे आवश्यक सुविधाओं के अभाव में मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र सीमावर्ती शहर व ग्रामीण भागों के व्यवसायी,कृषि मजदूर व किसान यात्रीगण बुरी तरह से हैरान एवं परेशान दिखाईैं दे रहे हैं। सड़कों पर यात्री वाहन परिचालकों द्वारा यात्रियों से मनमाना किराया वसूला जाता है परंतु यात्रियों को टिकट नहीं दिया जा रहा है। वैसे कानून के मुताबिक़ बिना टिकट यात्रा करने अपराध माना गया है।उसी तरह यात्रिओं से पैसा लेना और उन्हे टिकट न देना भी तो अपराध की श्रेणी में आता है।यह अन्याय बस आपरेटरों की मनमानी का नतीज़ा बताया जा रहा है। परंतु क्या करें बिना टिकट यात्रा करना उनकी मजबूरी है।क्योंकि नागरिकों के पास आने जाने के साधन का कोई विकल्प नहीं है। सबसे अधिक परेशानियों का सामना नागपुर से छिन्दवाडा,सिवनी बैतूल व नागपुर से बालाघाट आने जाने वाली परिवहन सेवाओं का बुरा हाल है। वर्तमान परिवेश में किसान बोवनी के लिए बाजार जाकर खाद, बीज, कीटनाशक लाने के लिए या तो अपने ट्रैक्टर का सहारा ले रहे हैं या बाइक का। डीजल पेट्रोल की आसमान छूती कीमतों के चलते यह नया संकट किसानों की कमरतोड़ रहा है। सबसे अधिक संकट का सामना विदर्भ महाराष्ट्र सीमा से लगे मध्यप्रदेश के कृषि मजदूर, किसानो और फुटकर व्यवसायियों को भुगतना पड़ता रहा है क्योंकि सी पी एण्ड बेरार(मध्यप्रांत) के शासनकाल से मध्यप्रदेश सीमावर्ती किसानो का खाधान्न, साग-सब्जी-भाजी बिक्री फल फ्रुड व्यवसाय और कृषि यंत्र सामग्रियों की खरीदी बिक्री नागपुर के बाजारों पर ही निर्भर रहा है । किसानों के अलावा गरीबों और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के सामने यथावत लोक परिवहन सेवा के आभाव ने रोजमर्रा के तमाम संकट खड़े कर दिए हैं।

    बताया जाता है कि मध्यप्रदेश के प्राइवेट बस ऑपरेटरों ने लाकडाउन की वजह से विगत 22 मार्च 2020 से ही मध्य प्रदेश में बसें बन्द कर रखी थी जो शासनादेशानुसार गत अक्टूबर 2020 से अपनी परिवहन सेवाएं शुर कर दी गई है।बताते हैं कि सभीऑपरेटर लॉकडाउन अवधि का टैक्स माफ करने की मांग पर अड़े हुए थे जो व्यवहारिक रूप उनकी मांगे ठीक भी थी।वैसे मध्यप्रदेश में अफ़सरशाही और नेताओं के गठजोड़ द्वारा जनता को दिया गया एक दर्दनाक दंश भी माना जा रहा है। बताते हैं कि मप्र में 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने सड़क परिवहन निगम को बंद करने का एकतरफा निर्णय लिया था। दावा किया गया था कि निगम का घाटा लगातार बढ़ता ही जा रहा है जबकि हकीकत यह थी कि लोक परिवहन के धंधे पर नेताओं की बुरी नजर काफी लंबे समय से थी और वे इसे सरकारी नियंत्रण से पूरी तरह मुक्त कराकर इस पर एकाधिकार चाहते थे। आज मध्यप्रदेश में लगभग हर जिले में प्रभावशाली नेता बस ऑपरेटर है। पंजाब में ऑर्बिट बस सेवा बादल परिवार चलाता है जो पूरे पंजाब में सबसे बड़ी ट्रांसपोर्ट कम्पनी है। बिहार में भी परिवहन निगम को बन्द करके दबंग नेताओं के लिए यह धंधा उन्मुक्त किया जा चुका है। राजस्थान में पिछली सरकार ने तो राजकीय निगम को बंद करने का निर्णय ले ही लिया था। दावा किया जाता है कि राजस्थान में निगम 2700 करोड़ के घाटे में है वहाँ 20 हजार कर्मचारियों द्वारा इसे चलाया जाता है। दिल्ली परिवहन निगम का यह घाटा 3991 करोड़ और केरल का 755 करोड़ है। कुछ समय पूर्व देश के 54 में से 46 परिवहन निगमों के प्रदर्शन पर जारी रिपोर्ट में ओडीसा, पंजाब, उत्तर प्रदेश को छोड़कर शेष सभी निगमों के घाटे को रेखांकित किया गया है। उत्तर प्रदेश का बस निगम 72 साल पुराना है और देश के आठ राज्यों के लिए यहां से बसें चलाई जाती हैं। हिमाचल, कर्नाटक के निगम भी अपने दूरवर्ती इलाकों तक सेवाएं उपलब्ध कराते हैं।

    एक दौर में मध्यप्रदेश परिवहन निगम भी फायदे का कारोबार कर नागरिकों को सस्ती और सुदूर तक सेवाएँ उपलब्ध कराता था। मध्यप्रदेश की कहानी असल नेताओं और अफसरों की मिलीभगत की शिकायत बहुत है जिसका अनुसरण अधिकतर राज्य कर रहे हैं या कर चुके हैं। 1990 तक मध्यप्रदेश में निगम को अफसर चलाते थे लेकिन बाद में सरकार ने इसमें नेताओं को मंत्री दर्जा देकर बिठाना शुरु कर दिया। 1994 में आईएएस भगीरथ प्रसाद ने 450 कर्मचारियों की भर्ती कर ली जबकि उस समय 1500 कर्मी अतिशेष यानी सरप्लस थे। इनमें से अधिकतर नेताओं, अफसरों के नजदीकी थे। 1995 से 1997 के बीच आईएएस यूके शामल ने गोवा की एक कम्पनी से 400 बसें दोगुनी से ज्यादा कीमत पर खरीदीं रखी थी जबकि एसी बसें निगम की तीन सर्वसुविधायुक्त कर्मशालाओं में आसानी से निर्मित हो सकती थीं।

    इस तरह के स्वेच्छाचारी निर्णयों से निगम का दिवाला निकलना सुनिश्चित हो गया। जिस समय निगम में तालाबंदी की गई तब मासिक घाटा लगभग साढ़े तीन करोड़ ही था। हालांकि इसे बंद करने की प्रक्रिया तो 1993 से ही शुरू हो गई थी लेकिन दिग्विजय सिंह कैबिनेट में यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका था। 2005 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने इसे बगैर केंद्र सरकार की अनुमति से बंद कर दिया था। जबकि 29.5 फीसदी केंद्रीय भागीदारी इन निगमों की रहती है।

    एक बार निगम के बन्द करने से आम आदमी किस तरह परेशान हो रहा है इसका भान इसे बंद करने वाले सुविधा सम्पन्न लोगों को कभी नहीं हो सकता है। भोपाल से 500, इंदौर से 400 और ग्वालियर, जबलपुर जैसे शहरों से लगभग 300 बसें औसतन 500 किलोमीटर तक की दूरी सफर करती थीं। सुदूर गांव देहातों को कवर करतीं इन बसों से क़स्बाई औऱ ग्रामीण लोकजीवन और आर्थिकी चला करती थी। आज ग्रामीण रूटों पर कोई बसें नहीं है और केवल फायदे के राष्ट्रीय राजमार्गों पर ही बसें चल रही हैं। 2013 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने निजी ऑपरेटरों के लिए अनुदान की घोषणा की थी लेकिन उस पर कोई अमल नहीं हुआ। 23 जून 2018 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सूत्र बस सेवा का उद्घाटन किया। दावा किया गया कि नगरीय निकाय इनके संचालन को पूर्ववर्ती निगम से भी बेहतर करेंगे। केंद्र सरकार की अमृत और स्मार्टसिटी योजनाओं से फंड दिलाये गए। इंटीग्रेटेड कमांड सेंटर खड़े किए गए लेकिन जिन 1600 बसों के संचालन का दावा था उनमें से आज 160 भी सड़कों पर नहीं हैं। मजबूर नागरिक निजी ऑपरेटर की मनमानी और लूट का शिकार हैं।

    मिलावटी पेट्रोल से जन स्वास्थ्य को खतरा

    हालकि मध्यप्रदेश सहित अन्य राज्य जिसमे उत्तरप्रदेश, ओडीसा, कर्नाटक, हिमाचल के मॉडल को अपना कर अपने निगमों को पुनर्जीवित करने का प्रयास शुरु है क्योंकि तमाम निम्नमध्यवर्गीय और गरीब आदमी के लिए आज सड़क तो है लेकिन परिवहन की सुविधा बरावर नहीं रहने की वजह से नागरिकों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।वैसे भी डीजल-पेट्रोल की बढ़ती खपत एवं आसमान छूती मंहगाई और मिलावटीे डीजल-पेट्रोल की वजह से दुर्गंधित धुंआ व वायु प्रदूषण के चलते नागरिक यात्रियों के जन स्वास्थ्य पर भी खतरा मंडरा रहा है.

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