Published On : Wed, Sep 19th, 2018

संयम विहीन ज्ञान का कोई मूल्य नहीं-आचार्यश्री गुप्तिनंदी

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नागपुर: संयम विहीन जीवन ज्ञान का कोई मूल्य नहीं यह उदबोधन प्रज्ञायोगी आचार्यश्री गुप्तिनंदी ने पर्यूषण पर्व के छठें दिन इतवारी फूल ओली स्थित खंडेलवाल छात्रावास में उत्तम संयम धर्म पर बुधवार को दिया.

गुरुदेव ने ओजस्वी वाणी मे संबोधित करते हुए कहा, संयम शब्द सम्पूर्वक यम धातु से बना है. अर्थात् समीचीन श्रद्धापूर्वक सम्यक् व्रतों का पालन करते हुए स्वयं को पूर्णरूपेण संयमित करना संयम धर्म है. गाड़ी में यदि ब्रेक नहीं हो तो कभी भी दुर्घटना घट सकती है उसी प्रकार जीवन रूपी गाड़ी में संयम का ब्रेक अनिवार्य है. सर्वोत्तम गाड़ी होने पर भी यदि ड्रायवर अनाड़ी है तो गाड़ी अच्छे रास्तों से भटककर संकटाकीर्ण पथ पर जा सकती है और यदि ड्रायवर कुशल खिलाड़ी है तो दुर्गम रास्तों से विपत्ति ग्रस्त गाड़ी भी अपने गंतव्य तक अवश्यमेव पहुंच सकती है.

इसी प्रकार इन्द्रियों की प्रवृत्ति भी बहुमुखी है. यह संयम की रक्षा में साधक भी है और बाधक भी. यदि इन्हें विषय भोगों में छोड़ दिया जाए तो संयम में बाधक बन जाएंगे और यदि उन इन्द्रियों को ज्ञानार्जन तत्पश्चरणादि शुभ कार्यों में लगा दिया जाए तो संयम की सिद्धि में साधक बन जायेगी. अग्नि भोजन को पकाती है और जीवन का रक्षण भी करती है लेकिन यदि किसी की झोपड़ी में अग्नि लगा दी जाये तो वह प्रलयकारी बन जायेगी,घातक हो जायेगी।इसी प्रकार पाँचों इन्द्रियों का ज्ञान तत्पश्चरणादि में सदुपयोग किया जाए,नियुक्त किया जाये तो वे इन्द्रियाँ भी हमारे संयम की सुरक्षा की पुष्टि करती हैं.

जीवन के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है वैसे ही संयम भी आवश्यक है. कोई व्यक्ति ज्ञानी हो और साथ में असंयमी हो यह संभव नहीं है।ज्ञान व असंयम एक साथ कैसे संभव है. एक म्यान में दो तलवार नहीं समा सकती है.

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गांधी विचार दोहन नामक पुस्तक में लिखा है कि बहुत अधिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं है,संयम के साथ थोड़ा ज्ञान ही मूल्यवान है ज्ञानार्जन भी उसी से कीजिए जो संयमी है. एक व्यक्ति विद्वता के साथ असंयम युक्त है तो उसका जीवन बर्बाद है. गांधी जी के बहुत ही सुंदर विचार हैं यथार्थ में संयम विहीन ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है.

आचार्य श्री पूज्यपाद भगवंत ने सर्वार्थसिद्धि में लिखा है कि लोक व्यवहार में यदि कोई स्वेच्छाचार करते हैं तो सजा अथवा शासन उसे दंडित करता है जब मर्यादाविहीन दुराचरण स्वेच्छाचार के लिए लोक में भी दंड विधान है तो पारमार्थिक लोक में स्वेच्छाचार के लिए किस प्रकार व कितना अधिक दंड होना चाहिए आप स्वयं विचार करें जब लौकिक शासन भी संयमित जीवन का पोषक है तो आत्मा- नुशासन में संयम का उन्मूलन कौन कर सकता है.

आज मानव भौतिक विषयों का दास होता जा रहा है,मन का दास होता जा रहा है इन पर उसका बिल्कुल नियंत्रण नहीं है. मनमाने ढंग से कल्पना की उड़ान भर रहा है इसके परिणाम कि उसे तनिक भी चिंता नहीं है मन को नियंत्रित करने हेतु संयम की आवश्यकता है. संयमित जीवन ही निरापद है. यथार्थ में संयम वही है जहां दया है. दयाविहिन मानव असंयमी है.

संयम रत्नत्रय के परिवर्द्धन संरक्षण हेतु सर्वोत्तम टॉनिक है , तो हम भी आज अपनी जीवन सरिता को संयम के तट बंधों में सुरक्षित ले जाकर आनंद के महासागर में सम्मिलित होने का संकल्प लें ।संयम के बीजों में सिद्धत्व का सुफल पायें. आज श्री चंद्रकांत पलसापुरे, सुनीता पलसापुरे, सूरज पलसापुरे, श्वेता पलसापुरे परिवार ने सौधर्म इंद्र बनकर श्री तत्त्वार्थसूत्र विधान, श्री दशलक्षण विधान व सुगंध दशमी व्रत की पूजा संपन्न की।वहीं कांता एवं संजय मांडवगडे ने महाआरती का लाभ लिया. इससे पूर्व आचार्य श्री ने सहज ध्यान योग में सभी शिविरार्थियों को पिण्डस्थ, पदस्थ,रूपस्थ, रूपातीत ध्यान का अभ्यास कराया. साथ ही श्री सुकमाल मुनि का वैराग्य व उनके भीषण प्राणांतक उपसर्ग का वर्णन व ध्यान करवाया.

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