
नागपुर – नागपुर शहर में साइबर ठगों ने पुलिस अधिकारी बनकर लोगों को डराने और उनकी मेहनत की कमाई लूटने का नया हथकंडा अपनाया है। ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर साइबर अपराधियों ने एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी और 74 वर्षीय बुजुर्ग महिला को आतंकवादियों से संबंध, मनी लॉन्ड्रिंग और संदिग्ध बैंक लेन-देन जैसे गंभीर मामलों में फंसाने की धमकी दी। फर्जी पुलिस अधिकारियों ने वीडियो कॉल के जरिए पीड़ितों पर दबाव बनाया और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उनसे लाखों रुपये वसूल लिए।
शहर में सामने आए इन दो मामलों में आरोपियों ने कुल 32 लाख 80 हजार रुपये की ठगी की। एक मामले में सेवानिवृत्त अधिकारी से 10 लाख रुपये ऐंठे गए, जबकि दूसरे मामले में बुजुर्ग महिला को 22.80 लाख रुपये का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। दोनों घटनाओं के सामने आने से साइबर अपराधियों के बढ़ते हौसले और उनकी धोखाधड़ी के तरीकों को लेकर चिंता बढ़ गई है।
साइबर ठगों ने पीड़ितों को इस तरह अपने जाल में फंसाया कि वे खुद को गंभीर आपराधिक मामले में घिरा हुआ समझने लगे। आरोपियों ने पुलिस की वर्दी और अधिकारियों की पहचान का सहारा लेकर अपनी बात को सच साबित करने की कोशिश की। डर और बदनामी की आशंका के चलते पीड़ितों ने आरोपियों की बातों पर भरोसा कर लिया और बड़ी रकम ट्रांसफर कर दी।
मंगलवार को नागपुर साइबर पुलिस थाने में दोनों मामलों में अज्ञात आरोपियों के खिलाफ शिकायतों के आधार पर प्रकरण दर्ज किए गए। पुलिस अब ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों और बैंक खातों के आधार पर आरोपियों तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।
पहला मामला: कश्मीर में आतंकी घटना से जोड़कर रिटायर्ड अधिकारी से 10 लाख ऐंठे
इस साइबर ठगी का पहला मामला वर्धा रोड स्थित वृंदावन सिटी निवासी संजय लोंदेकर (57) के साथ हुआ। वे एक सरकारी विभाग से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। जानकारी के अनुसार, 1 से 10 अक्टूबर 2026 के बीच उनके मोबाइल पर व्हाट्सऐप के माध्यम से वीडियो कॉल आया।
कॉल करने वाले आरोपियों ने खुद को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताया। इनमें एक ने अपनी पहचान आईपीएस अधिकारी रणवीर सिंह के रूप में बताई, जबकि दूसरे ने खुद को मुंबई पुलिस मुख्यालय का अधिकारी केशव जाधव बताया। दोनों कथित तौर पर पुलिस की वर्दी में दिखाई दिए, ताकि पीड़ित को उनकी पहचान और दावों पर संदेह न हो।
आरोपियों ने संजय लोंदेकर को बताया कि कश्मीर में हुई एक आतंकी घटना के घटनास्थल से उनका पहचान पत्र मिला है। इसके साथ ही उनके बैंक खाते से सात करोड़ रुपये का संदिग्ध लेन-देन होने का दावा किया गया।
आतंकवाद जैसी गंभीर घटना का नाम सामने आते ही पीड़ित घबरा गए। आरोपियों ने कथित तौर पर उन्हें देशविरोधी गतिविधियों से जोड़ने की बात कही और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया। इस तरह उन्हें विश्वास दिलाने की कोशिश की गई कि वे किसी बड़े आपराधिक मामले में फंस चुके हैं और पुलिस की निगरानी में हैं।
कार्रवाई का डर दिखाकर बनाया दबाव
आरोपियों ने कथित तौर पर मामले की जांच, बैंक खातों के संदिग्ध लेन-देन और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े आरोपों का हवाला देकर संजय लोंदेकर पर दबाव बनाया। इस दौरान उन्हें मामले की गंभीरता समझाकर डराया गया और कथित तौर पर डिजिटल अरेस्ट की स्थिति में रखा गया।
‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर ठगों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला ऐसा तरीका है, जिसमें आरोपी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी अन्य जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ित को वीडियो कॉल पर लगातार संपर्क में रखते हैं। उन्हें गिरफ्तारी, पूछताछ और जेल भेजने की धमकी दी जाती है। कई बार पीड़ित को परिवार या परिचितों से बात नहीं करने के लिए भी कहा जाता है, ताकि वह किसी से सलाह न ले सके।
संजय लोंदेकर के मामले में भी आरोपियों ने कथित तौर पर इसी तरह भय का माहौल बनाया। शिकायत के अनुसार, मामला रफा-दफा करने के नाम पर उनसे 10 लाख रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर करवा लिए गए।
बाद में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर साइबर पुलिस से शिकायत की गई। पुलिस ने मामला दर्ज कर ठगी के पीछे शामिल लोगों की पहचान करने की जांच शुरू कर दी है।
दूसरा मामला: 74 वर्षीय महिला को आतंकियों को फंडिंग के आरोप में फंसाने की धमकी
दूसरी घटना पार्वती नगर निवासी कामिनी गुलाबराव शेगांवकर (74) के साथ हुई। इस मामले में साइबर ठगों ने कथित तौर पर कोलाबा क्राइम ब्रांच के अधिकारी बनकर बुजुर्ग महिला को निशाना बनाया।
जानकारी के मुताबिक, 26 अगस्त से 12 अक्टूबर 2026 के बीच उनके पास व्हाट्सऐप के माध्यम से कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने खुद को पुलिस अधिकारी बताया और अपनी पहचान संदीपराव के रूप में दी।
आरोपी ने कामिनी शेगांवकर को बताया कि उनके नाम पर केनरा बैंक में खोले गए एक खाते से बेनामी लेन-देन हुआ है। इस खाते का इस्तेमाल कथित तौर पर आतंकवादियों को आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए किए जाने का आरोप लगाया गया।
आतंकवादियों को फंडिंग जैसे गंभीर आरोप का नाम सुनकर बुजुर्ग महिला घबरा गईं। आरोपी ने उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि मामला बेहद गंभीर है और इसमें उनके खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
संपत्ति और परिवार की जानकारी भी हासिल की
शिकायत के अनुसार, आरोपी ने पूछताछ के नाम पर कामिनी शेगांवकर से उनकी संपत्ति, परिवार और अन्य व्यक्तिगत जानकारियां हासिल कीं। इसके बाद कथित तौर पर उन्हें कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया गया।
साइबर ठगों का तरीका ऐसा था कि पीड़ित को लगे कि वह किसी वास्तविक पुलिस जांच का सामना कर रहा है। आरोपी ने कथित तौर पर महिला को किसी अन्य व्यक्ति से इस मामले में चर्चा नहीं करने की सख्त चेतावनी भी दी।
बुजुर्ग महिला को डर था कि यदि आरोप सही साबित हुए तो उन्हें पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इसी भय का फायदा उठाकर आरोपी ने उन्हें कथित तौर पर मामले को सुलझाने और जांच से राहत दिलाने का भरोसा दिया।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान महिला आरोपियों के दबाव में आ गईं। शिकायत के मुताबिक, मामले को निपटाने के नाम पर उनसे 22 लाख 80 हजार रुपये ट्रांसफर करवा लिए गए।
बड़ी रकम गंवाने के बाद ठगी का मामला सामने आया और साइबर पुलिस को इसकी जानकारी दी गई। पुलिस ने इस प्रकरण में भी अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
फर्जी वर्दी, बड़े आरोप और गिरफ्तारी का डर: ठगी का नया तरीका
दोनों मामलों में ठगों का तरीका काफी हद तक एक जैसा दिखाई देता है। आरोपियों ने पहले खुद को पुलिस अधिकारी बताकर पीड़ितों से संपर्क किया। इसके बाद आतंकवाद, संदिग्ध बैंक लेन-देन और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे गंभीर मामलों का हवाला देकर उन्हें डराया।
फर्जी पहचान के साथ वीडियो कॉल करना, पुलिस की वर्दी में दिखाई देना और जांच एजेंसी का नाम लेना इस तरह की धोखाधड़ी में लोगों का विश्वास जीतने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तरीके हैं।
आमतौर पर साइबर ठग पीड़ित को बताते हैं कि उसके आधार कार्ड, पहचान पत्र, बैंक खाते या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किसी गंभीर अपराध में हुआ है। इसके बाद गिरफ्तारी और जेल जाने का भय दिखाकर उसे अपनी बातों में उलझा लेते हैं।
कुछ मामलों में ठग पीड़ित को घंटों वीडियो कॉल पर रहने के लिए मजबूर करते हैं। वे परिवार के सदस्यों से संपर्क नहीं करने देते और किसी को जानकारी देने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देते हैं। इस दौरान पीड़ित मानसिक दबाव में आकर आरोपियों के निर्देशों का पालन करने लगता है।
नागपुर में सामने आए दोनों प्रकरणों में भी इसी तरह के आरोप लगाए गए हैं। हालांकि, आरोपियों की वास्तविक पहचान और ठगी के पूरे नेटवर्क का खुलासा पुलिस जांच के बाद ही हो सकेगा।
साइबर पुलिस ने दर्ज किए मामले, बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की जांच
शहर में सामने आई इन दोनों घटनाओं को लेकर साइबर पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर लिया है। पुलिस ठगी में इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों और बैंक खातों की जानकारी जुटा रही है।
जांच के दौरान यह पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि पीड़ितों से संपर्क करने वाले लोग कौन थे, रकम किन बैंक खातों में ट्रांसफर हुई और इन खातों का इस्तेमाल करने वाले लोगों का साइबर अपराध से क्या संबंध है।
इसके साथ ही यह भी जांच का विषय है कि दोनों घटनाओं के पीछे एक ही गिरोह का हाथ है या अलग-अलग साइबर अपराधियों ने वारदातों को अंजाम दिया। फिलहाल, इस संबंध में पुलिस की जांच जारी है।
सावधान! पुलिस अधिकारी बनकर कोई मांगे पैसे तो तुरंत सतर्क हो जाएं
इन घटनाओं से एक बार फिर स्पष्ट होता है कि साइबर अपराधी लोगों को ठगने के लिए डर और मानसिक दबाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। पुलिस अधिकारी, जांच एजेंसी या सरकारी विभाग का नाम सुनकर घबराने के बजाय किसी भी दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है।
ध्यान रखें:
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराने वालों से सावधान रहें। वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस अधिकारी बताने वाला व्यक्ति वास्तविक अधिकारी ही हो, यह जरूरी नहीं है।
पुलिस या जांच एजेंसी के नाम पर पैसे ट्रांसफर न करें। किसी मामले को रफा-दफा करने या गिरफ्तारी से बचाने के नाम पर रकम मांगना गंभीर संदेह का विषय है।
परिवार और परिचितों से संपर्क न तोड़ें। कोई व्यक्ति आपको किसी से बात नहीं करने की धमकी दे, तो सतर्क हो जाएं।
बैंक खाते और व्यक्तिगत जानकारी साझा न करें। ओटीपी, पासवर्ड, बैंक विवरण और अन्य गोपनीय जानकारी अनजान लोगों को न दें।
ठगी होने पर तुरंत शिकायत करें। साइबर वित्तीय धोखाधड़ी की स्थिति में भारत की साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर संपर्क करें और आधिकारिक पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं।
32.80 लाख की ठगी ने बढ़ाई चिंता
नागपुर में सामने आए इन दोनों मामलों में एक सेवानिवृत्त अधिकारी और एक बुजुर्ग महिला को निशाना बनाया गया। दोनों पीड़ितों को गंभीर अपराधों में फंसाने का डर दिखाकर लाखों रुपये की रकम ऐंठने का आरोप है।
पहले मामले में 10 लाख और दूसरे मामले में 22.80 लाख रुपये की ठगी हुई। कुल रकम 32.80 लाख रुपये है। अब पुलिस जांच से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि इन वारदातों के पीछे कौन-से साइबर अपराधी सक्रिय हैं और ठगी की रकम कहां ट्रांसफर की गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस अधिकारी होने का दावा करने वाले साइबर ठगों ने पीड़ितों को किस हद तक भयभीत किया कि उन्होंने लाखों रुपये ट्रांसफर कर दिए। जांच के बाद ही इन मामलों की पूरी सच्चाई और आरोपियों के नेटवर्क का खुलासा हो सकेगा।



