नागपुर: नागपुर जिला स्थानीय स्वराज्य संस्था निर्वाचन क्षेत्र की विधान परिषद चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे राजनीतिक माहौल गर्म होता जा रहा है। कांग्रेस उम्मीदवार और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अतुल लोंढे द्वारा मतदाताओं को कथित रूप से 10 लाख रुपये तक का प्रलोभन दिए जाने के आरोप ने चुनावी चर्चा को नया मोड़ दे दिया है। लेकिन इस पूरे मामले में सबसे अधिक चर्चा आरोपों की नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर दिखाई दे रही असहमति की हो रही है।
अतुल लोंढे ने दावा किया है कि कुछ मतदाताओं को अज्ञात नंबरों से फोन कर कहा जा रहा है कि वे अभी 5 लाख रुपये स्वीकार करें और शेष 5 लाख रुपये बाद में दिए जाएंगे। उन्होंने इस मामले की जांच कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की है।
हालांकि, कांग्रेस के ही वरिष्ठ नगरसेवक और नागपुर महानगरपालिका में विपक्ष के नेता संजय महाकालकर ने सार्वजनिक रूप से इन आरोपों पर सवाल खड़े कर दिए। महाकालकर ने कहा कि यदि आरोपों में तथ्य हैं तो उनके समर्थन में ठोस सबूत सामने लाए जाने चाहिए। उन्होंने बिना प्रमाण ऐसे आरोप लगाने को उचित नहीं बताया।
यहीं से राजनीतिक चर्चा का केंद्र बदल गया। सवाल उठने लगे कि जब कांग्रेस का अधिकृत उम्मीदवार स्वयं गंभीर आरोप लगा रहा है, तब पार्टी के एक वरिष्ठ नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से उसी पर संदेह व्यक्त करना आखिर क्या संकेत देता है?
कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं अतुल लोंढे
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अतुल लोंढे केवल स्थानीय नेता नहीं हैं। वे कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं और उनकी उम्मीदवारी को पार्टी हाईकमान की पसंद माना जा रहा है। ऐसे में यदि उनके आरोपों पर पार्टी के भीतर से ही सवाल उठ रहे हैं, तो यह केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि संगठनात्मक स्थिति पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
कई कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि उम्मीदवार के आरोपों से पार्टी सहमत नहीं थी, तो इस पर प्रतिक्रिया शहर अध्यक्ष या आधिकारिक संगठनात्मक स्तर से आनी चाहिए थी। लेकिन विपक्ष के नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से उम्मीदवार के दावे को चुनौती देने से पार्टी के भीतर चल रही खींचतान की चर्चा तेज हो गई है।
पहले भी थे मतभेद, लेकिन पार्टी पहले थी
नागपुर कांग्रेस में गुटबाजी कोई नई बात नहीं है। वरिष्ठ नेताओं विलास मुत्तेमवार, सतीश चतुर्वेदी, नितिन राऊत और अन्य नेताओं के बीच राजनीतिक मतभेदों की चर्चा वर्षों तक होती रही। लेकिन पुराने कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के समय सभी नेता अपने व्यक्तिगत मतभेद भुलाकर पार्टी उम्मीदवार के लिए एकजुट होकर काम करते थे।
उस दौर में आंतरिक प्रतिस्पर्धा जरूर थी, लेकिन सार्वजनिक रूप से पार्टी उम्मीदवार को कमजोर करने वाली स्थिति शायद ही कभी देखने को मिलती थी। यही कारण है कि वर्तमान घटनाक्रम की तुलना पुराने दौर से की जा रही है।
2014 के बाद बदला राजनीतिक समीकरण?
कांग्रेस के भीतर एक वर्ग का मानना है कि 2014 के बाद संगठन की राजनीतिक संस्कृति में बड़ा बदलाव आया है। पार्टी के कई कार्यकर्ता निजी बातचीत में आरोप लगाते रहे हैं कि कुछ नेता सत्ता पक्ष से टकराव की राजनीति के बजाय संबंध बनाए रखने की रणनीति अपनाते हैं।
इसी वजह से समय-समय पर कुछ नेताओं पर “टीम भाजपा” की तरह व्यवहार करने के आरोप भी लगते रहे हैं। हालांकि, संबंधित नेताओं ने हमेशा ऐसे आरोपों को खारिज किया है और स्वयं को कांग्रेस की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध बताया है।
प्रफुल्ल गुडधे के बयान की फिर चर्चा
हाल ही में नागपुर शहर कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभालने के बाद प्रफुल्ल गुडधे ने दावा किया था कि वे संगठन में चल रही “भाजपा की दुकान” बंद करेंगे। उनके इस बयान को कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच संगठनात्मक सुधार और अनुशासन के संदेश के रूप में देखा गया था।
अब जब कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के आरोपों पर पार्टी के ही एक वरिष्ठ नेता सवाल उठा रहे हैं, तो गुडधे के उस बयान की फिर चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि यदि संगठन पूरी तरह एकजुट है तो फिर सार्वजनिक रूप से अलग-अलग संदेश क्यों दिखाई दे रहे हैं।
मनपा के कुछ फैसलों पर भी उठे थे सवाल
हाल के महीनों में नागपुर महानगरपालिका से जुड़े कुछ राजनीतिक फैसले और नामांकन भी कांग्रेस के भीतर चर्चा का विषय बने रहे हैं। पार्टी के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं ने निजी तौर पर इन निर्णयों पर असहमति जताई थी। यहां तक कि कुछ मामलों में प्रदेश नेतृत्व के स्तर पर भी आश्चर्य व्यक्त किए जाने की चर्चा राजनीतिक गलियारों में होती रही है।
इन घटनाओं ने संगठनात्मक नेतृत्व, निर्णय प्रक्रिया और स्थानीय राजनीति की दिशा को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।
चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए बड़ा संदेश
फिलहाल, अतुल लोंढे के आरोपों की सत्यता को लेकर कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई है। लेकिन इस पूरे विवाद ने कांग्रेस के सामने एक अलग चुनौती जरूर खड़ी कर दी है। यह चुनौती विपक्षी दलों से मुकाबले की नहीं, बल्कि संगठनात्मक एकजुटता की है।
विधान परिषद चुनाव से पहले सामने आए इस घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या नागपुर कांग्रेस पूरी तरह एकजुट होकर अपने उम्मीदवार के पीछे खड़ी है, या फिर अंदरूनी मतभेद अब सार्वजनिक मंचों तक पहुंच चुके हैं।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले दिनों में कांग्रेस नेतृत्व की प्रतिक्रिया इस बात का संकेत देगी कि यह केवल एक अस्थायी विवाद है या फिर संगठन के भीतर गहरे असंतोष की झलक।
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