Published On : Wed, Oct 7th, 2026
By Nagpur Today Nagpur News

सेंट्रल जेल में बंदियों का तांडव, बाल्टी से साथी कैदी पर हमला

बीच-बचाव करने पहुंचे जेलकर्मी से भी भिड़ा बंदी; घटना ने जेल की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर खड़े किए सवाल
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नागपुर – नागपुर सेंट्रल जेल में बंदियों के बीच होने वाली मारपीट की एक और घटना ने जेल की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मंगलवार सुबह विचाराधीन बंदियों के बीच अचानक विवाद के बाद एक बंदी पर लात-घूंसों के साथ प्लास्टिक की बाल्टी से हमला कर दिया गया। हमले में बंदी के सिर में चोट आई। जेलकर्मियों ने मौके पर पहुंचकर स्थिति संभाली और घायल बंदी को जेल अस्पताल पहुंचाया।

मामला यहीं नहीं थमा। मारपीट शांत कराने और स्थिति को नियंत्रित करने पहुंचे जेलकर्मियों से भी एक अन्य बंदी ने बहस शुरू कर दी। समझाने का प्रयास करने पर उसने जेलकर्मी से हुज्जत करते हुए झपटने का प्रयास किया। सरकारी ड्यूटी में बाधा डालने और धमकाने के आरोप में अब मामला पुलिस तक पहुंचा है।

घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि जेल के भीतर बंदियों के बीच होने वाले विवादों पर प्रशासन का नियंत्रण कितना प्रभावी है? जेल में बंद कैदी सुरक्षित हैं या नहीं? और जिन कर्मचारियों पर सैकड़ों बंदियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, उनकी सुरक्षा कौन सुनिश्चित कर रहा है?

हनुमान मंदिर से लौटते समय घेरा
प्राप्त जानकारी के अनुसार, मंगलवार सुबह करीब 9.40 से 10.20 बजे के बीच सेंट्रल जेल के छोटी गोल विभाग में बैरक क्रमांक 7 और 8 के बीच यह घटना हुई।

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विचाराधीन बंदी विजय रहांगडाले हनुमान मंदिर में दर्शन करने के बाद अपनी बैरक की ओर लौट रहा था। इसी दौरान विचाराधीन बंदी दुर्गेश उर्फ लिटिल प्रमोद गुप्ता और अश्विन उर्फ अच्छी मुकुंद इंदुरकर ने उसका रास्ता रोक लिया। दोनों ने विजय के साथ मारपीट शुरू कर दी। लात-घूंसों से पिटाई करने के बाद उसके सिर पर प्लास्टिक की बाल्टी से भी हमला किए जाने की जानकारी सामने आई है।

अचानक हुई मारपीट से परिसर में हड़कंप मच गया। विजय की चीख-पुकार सुनकर ड्यूटी पर तैनात कारागृह कर्मचारी मनोज धनवट सहित अन्य कर्मचारी मौके पर पहुंचे। उन्होंने दोनों पक्षों को अलग किया और घायल बंदी को उपचार के लिए जेल अस्पताल भेजा।

बीच-बचाव करने पहुंचे जेलकर्मी से भी हुज्जत
मारपीट की घटना को शांत कराने की कार्रवाई चल ही रही थी कि एक अन्य विचाराधीन बंदी ने जेल कर्मचारियों से बहस शुरू कर दी। पुलिस शिकायत के अनुसार, सुरेंद्र उर्फ मोनू मनोज समुद्रे ने जेलकर्मियों के साथ विवाद किया।

उपनिरीक्षक निमजे ने उसे समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह शांत होने के बजाय उनके साथ बहस करने लगा और उन पर झपटने का प्रयास किया। इतना ही नहीं, सरकारी ड्यूटी निभा रहे कर्मचारी को डराने-धमकाने का भी प्रयास किए जाने का आरोप है।

घटना के बाद जेल प्रशासन की ओर से धंतोली पुलिस को शिकायत दी गई। पुलिस ने दुर्गेश उर्फ लिटिल गुप्ता, अश्विन उर्फ अच्छी इंदुरकर और सुरेंद्र उर्फ मोनू समुद्रे के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

मारपीट की घटनाएं क्या सिर्फ ‘जेल के अंदर की बात’ बनकर रह जाती हैं?
सेंट्रल जेल जैसे अत्यधिक संवेदनशील परिसर में बंदियों के बीच विवाद होना कोई नई बात नहीं है। छोटी कहासुनी से शुरू होने वाला विवाद कई बार मारपीट तक पहुंच जाता है। कुछ घटनाएं जेल की चारदीवारी के भीतर ही शांत हो जाती हैं, जबकि मामला गंभीर होने पर पुलिस शिकायत दर्ज कराने की नौबत आती है।

यही स्थिति जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर कई सवाल खड़े करती है। क्या प्रत्येक मारपीट की घटना की गंभीरता से समीक्षा होती है? विवाद की असली वजह क्या थी? बंदियों के बीच तनाव क्यों बढ़ रहा है? और क्या संवेदनशील बंदियों की निगरानी के लिए पर्याप्त व्यवस्था है?

जेलकर्मी कितने सुरक्षित?
जेल में सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाले कर्मचारी भी कई बार बंदियों के गुस्से और हमलेच्या निशाने पर येतात. इस घटना में भी मारपीट रोकने पहुंचे कर्मचारी से ही विवाद और झपटने की कोशिश का आरोप सामने आया है।

यदि किसी बंदी को जेलकर्मी के साथ ही अभद्रता या हमला करने का साहस हो रहा है, तो यह जेल की अनुशासन व्यवस्था के लिए गंभीर प्रश्न है। जेलकर्मियों को हर समय बंदियों के बीच रहकर काम करना पड़ता है। ऐसे में उनकी सुरक्षा, पर्याप्त स्टाफ, निगरानी व्यवस्था और त्वरित हस्तक्षेप की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी बंदियों की सुरक्षा।

बैरक के भीतर क्या चल रहा है, इसकी निगरानी जरूरी
जेल में बंद कैदियों के बीच आपसी गुटबाजी, पुरानी रंजिश, दबदबा कायम करने की कोशिश या छोटी-छोटी बातों पर विवाद कई बार हिंसक रूप ले सकते हैं। ऐसे में केवल घटना के बाद पुलिस मामला दर्ज करना पर्याप्त है या नहीं, यह भी विचारणीय मुद्दा है।

जेल प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ बंदियों को बंद रखना नहीं, बल्कि उनके बीच अनुशासन बनाए रखना और संभावित हिंसक घटनाओं को पहले ही रोकना है। इसके लिए नियमित निगरानी, संवेदनशील बंदियों की पहचान, बैरकों के भीतर तनाव की जानकारी जुटाना और विवाद की जड़ तक पहुंचना आवश्यक माना जाता है।

बड़े हादसे से पहले जागेगा प्रशासन?
सवाल यह भी है कि जेल के भीतर होने वाली मारपीट को समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में कोई गंभीर घटना होने पर जिम्मेदारी किसकी होगी? आज प्लास्टिक की बाल्टी से हमला हुआ है; कल यही विवाद किसी धारदार वस्तु या अन्य खतरनाक तरीके से हिंसक रूप ले सकता है।

क्या जेल के भीतर बंदी वास्तव में सुरक्षित हैं?
क्या जेलकर्मी बिना डर के अपनी ड्यूटी कर पा रहे हैं?
क्या बैरकों में बंदियों के बीच चल रहे तनाव की नियमित समीक्षा होती है?
क्या हर मारपीट की घटना का रिकॉर्ड और कारणों की जांच होती है?
और सबसे अहम—क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार तो नहीं किया जा रहा?

मंगलवार की घटना ने इन तमाम सवालों को एक बार फिर सामने ला दिया है। अब निगाह जेल प्रशासन की ओर है कि वह इस घटना को महज एक आपराधिक प्रकरण मानकर आगे बढ़ता है या जेल की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की भी गंभीर समीक्षा करता है।

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