
नागपुर: मंगलवार को हुई कुछ घंटों की बारिश ने नागपुर महानगरपालिका (NMC) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहरभर में जलभराव के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब सीमेंट सड़कों की ऊंचाई बढ़ाई जा रही थी और ड्रेनेज सिस्टम प्रभावित हो रहा था, तब संबंधित जोन के इंजीनियर और अधिकारी आखिर कर क्या रहे थे?
शहर के कई इलाकों में बारिश का पानी घरों, दुकानों, स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंच गया। कुछ स्थानों पर बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना पड़ा। इस स्थिति ने 23 सितंबर 2023 की विनाशकारी बाढ़ की याद ताजा कर दी।
नागरिकों का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर सीमेंट सड़कें बनाई गईं, लेकिन वर्षा जल निकासी व्यवस्था को समान महत्व नहीं दिया गया। कई स्थानों पर नई सड़कों की ऊंचाई पहले की तुलना में काफी बढ़ा दी गई, जिससे बारिश का पानी नालियों में जाने के बजाय आसपास की बस्तियों और बाजारों में भरने लगा।
लोगों का कहना है कि सड़क निर्माण के दौरान यह सुनिश्चित करना संबंधित इंजीनियरों और अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि ड्रेनेज लाइनें बाधित न हों और जल निकासी व्यवस्था प्रभावित न हो। इसके बावजूद कई स्थानों पर नालियां बंद हो गईं या उनकी क्षमता कम हो गई, जिसके कारण मामूली बारिश में भी शहर जलमग्न हो गया।
यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब नागपुर में सीमेंट सड़कों के चार चरणों पर अब तक करीब ₹1,040 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं और मनपा बजट में ₹900 करोड़ की लागत वाले पांचवें चरण की घोषणा भी की जा चुकी है।
नियमों के अनुसार सड़क निर्माण के साथ वर्षा जल निकासी व्यवस्था को बनाए रखना या उसमें सुधार करना ठेकेदारों की जिम्मेदारी होती है। लेकिन नागरिकों का आरोप है कि कई परियोजनाओं में इस पहलू की अनदेखी की गई, जिसका खामियाजा अब पूरे शहर को भुगतना पड़ रहा है।
हर वर्ष मानसून से पहले चलने वाले नाला सफाई अभियान पर भी सवाल उठ रहे हैं। नागरिकों का कहना है कि 2023 की बाढ़ के बाद कई योजनाओं और सुधारों की घोषणाएं की गई थीं, लेकिन अधिकांश आज भी अधूरी हैं। वहीं नालों पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण भी लगातार जारी हैं।
सीमेंट सड़क परियोजना
चरण सड़कें लागत
पहला 30 ₹123 करोड़
दूसरा 51 ₹324 करोड़
तीसरा 42 ₹300 करोड़
चौथा 33 ₹300 करोड़
पांचवां* लंबाई तय नहीं ₹900 करोड़
*पांचवें चरण की घोषणा मनपा बजट में की गई है।
अब शहरवासियों की मांग है कि नए चरण पर करोड़ों रुपये खर्च करने से पहले यह जांच हो कि मौजूदा परियोजनाओं में कहां-कहां तकनीकी खामियां हुईं, किसकी जिम्मेदारी तय होगी और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे।
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