Published On : Mon, Aug 12th, 2019

देश के 90 प्रतिशत से ज्यादा लाइब्रेरी अभी भी मुलभुत तकनिकी विकास से कोसो दूर: डॉ. प्रितम गेडाम

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नागपुर: पुस्तके मानवी जीवन का अभिन्न अंग है वह जीवन के हर पल मे यह साथ निभाती है। पुस्तकालय आज के युग मे बहुत उन्नत हुए है घर बैठे इंटरनेट द्वारा एक किल्क पर पुस्तके, नियतकालिकाएॅं व अन्य दस्तावेज उपलब्ध होते है इस सेवा मे सबसे महत्वपुर्ण रोल पुस्तकालयाध्यक्ष का है जिसके द्वारा यह जरूरी सेवाएॅं प्राप्त होती है। पुस्तकालयो का स्वरूप लगातर बदल रहा है उसी रूप मे पुस्तकालयाध्यक्ष की भूमीका भी बदल रही है, आज यांत्रीकी, डिजीटल व वर्चुअल पुस्तकालयो का दौर है इसीलिए पाठको तक उन्नत सेवाएॅं प्रदान करने की जिम्मेदारी भी पुस्तकालयाध्यक्ष की बढ गयी है। भारत मे पुस्तकालय विज्ञान के जनक डाॅ. एस. आर. रंगनाथन का जन्मदिन 12 अगस्त को पुरे देश मे ”राष्ट्रिय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस“ के रूप मे मनाया जाता है उन्होने पुस्तकालय के प्रत्येक क्षेत्र मे बडी बारीकी से कार्य किया है।

पुस्तकालयो मे कर्मचारीयो की भारी कमी
समाज मे शैक्षणीक, व्यावसायीक, सार्वजनीक जैसे अनेक पुस्तकालय मौजूद है लेकीन इनमे से कुछ प्रतिशत ही पुस्तकालय अपने ध्येय व उद्देश को सही ढंग से पुरा कर पाते है आज के आधुनिक युग मे पुस्तकालयो का महत्व काफी बढ गया है पारंपारीक पुस्तकालयो से लेकर आज के व्हर्चुअल पुस्तकालयो तक का सफर तय हुआ है पर देश के 90 प्रतिशत से ज्यादा पुस्तकालय अभी भी अद्यावत तकनिकी विकास से कोसो दूर है पुस्तकालयो के विकास मे कर्मचारीयो की कमी सबसे बडा रोडा और उसमे भी कुशल कर्मचारी। बडी संख्या मे विश्वविद्यालय, महाविद्यालय, सार्वजनीक पुस्तकालयो मे पुस्तकालयाध्यक्ष व संबंधित कर्मचारीयो के पद रिक्त पडे है। हर साल पुस्तकालय विभाग से बडी संख्या मे कर्मचारी निवृत्त हो रहे है। सरकारी स्कूलो मे बडी तादाद मे पुस्तकालय विभाग के सालो से पद खाली पडे है। स्थानिक प्रशासन द्वारा संचालीत पुस्तकालयो की भी ऐसी ही स्थिती है अधिकतर पुस्तकालय तो कंत्राटी पद्धती या चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारीयो के भरोसे चल रही है तो फिर किस प्रकार यहा डाॅ. एस. आर. रंगनाथन द्वारा दर्शाये गये फाईव लाॅ का पालन किया जाता होगा? दुर्गम स्थानो की परिस्थिती तो और भी खराब है।

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पुस्तकालय सुचना विज्ञान क्षेत्र मे बढती बेरोजगारी चिंताजनकः-

देश मे पुस्तकालयो की खस्ता हालत के लिए कुशल कर्मचारीयो की कमी तो बडी समस्या तो है लेकीन पर्याप्त मात्रा मे इस क्षेत्र मे खाली पडे पदो पर नियुक्ती ना होने के कारण देश के युवाओ को बेरोजगारी की मार झेलनी पड रही है। एक ओर हम आधुनिक व सुचना के युग मे विश्वस्तरीय शिक्षाप्रणाली की ओर अग्रसर होने के लिए प्रयत्नशिल है और दूसरी ओर शिक्षा का आधार अर्थात पुस्तकालयो मे ये गंभीर समस्या नजर आती है। ऐसा नही की देश मे पुस्तकालय विज्ञान मे उच्चशिक्षीत तज्ञ कुशल मनुष्यबल की कमी है बल्कि उल्टे उच्चशिक्षीत युवावर्ग मे बेरोजगारी समय के साथ चिंताजनक रूप मे बढ रही है। कई-कई संस्थानो मे तो देहाडी मजदूर से भी कम वेतन पर पुस्तकालय कर्मचारी कार्य करने को मजबूर है यह देश की सुदृढ होती शिक्षाव्यवस्था की वास्तविक स्थिती को दर्शाती है। विदेशो मे पुस्तकालयो के क्षेत्र मे उल्लेखनीय प्रगती हुई है हर ओर व्हर्चुअल पुस्तकालयो का नेटवर्क फैला हुआ है एंवम पुस्तकालय सेवा मे प्रतीव्यक्ती पर अधिक मात्रा मे निधी खर्च किया जाता है उस मुकाबले हम अत्यधिक पिछडे हुए है उदाहरण के लिए देखा जाए तो अमेरीका के मुकाबले हम पुस्तकालय मे प्रतीव्यक्ती सेवा के लिए 1 प्रतिशत निधी भी खर्च नही करते है। सरकार एंवम संस्थाओ ने इस गंभीरता को जल्दी समझना अत्यावश्यक है।

पुस्तकालयो का महत्व समझना अत्यावश्यक

पुस्तकालय ज्ञान का केंद्र होता है और गुणवत्तापुर्ण मनुष्यबल व शिक्षीत समाज के निमार्ण मे पुस्तकालय की महत्वपुर्ण भूमिका होती है। निधी की कमी, जनजागृती की कमी, संस्थापको व प्रशासकीय अधिकारीयो द्वारा उपेक्षा, उचीत प्रबंधन की कमी, उच्चशिक्षीत तज्ञ कर्मचारीयो की कमी व अन्य कारणो से आज भी हमारे देश मे पुस्तकालय की स्थिती संतोषजनक नही है। आज वास्तवीक रूप से देखा जाए तो पुस्तकालय संपन्न तरीके से समाज के विकास मे भागीदार होने चाहिए। समाज मे सभी ओर यांत्रीक पुस्तकालय, डिजीटल व्र्हचुअल पुस्तकालय होने चाहीए अर्थात पुस्तकालय मे आॅनलाईन सेवा, नवनवीन यांत्रीकी संसाधन, उच्चशिक्षीत कर्मचारी, कौशल्य प्रशिक्षण, योग्य प्रबंधन, उचित बजट, सरकार की भागीदारी व अन्य बातो से पुस्तकालय का विकास विश्वस्तरीय रूप मे सफल होगा। विकास के नाम पर लिपापोती नही होनी चाहीए। सरकार ने पुस्तकालय भरती पर विशेष ध्यान केंद्रित करना चाहीए साथ ही पर्यात निधी की भी आवश्यकता पुर्ती जरूरी है।

स्थानीक प्रशासन द्वारा संचालीत अधीकतर सार्वजनिक पुस्तकालयो की वर्तमान स्थिती की समस्याएॅं निम्न प्रकार से है।

सार्वजनिक पुस्तकालयो मे कार्यरत कर्मचारीयो के शिक्षा संबंधी निती बहुत निम्नस्तर की है। यहा के कर्मचारी पुस्तकालय शिक्षासंबंधी निती से अवगत तक नही होते है। पुस्तकालयो के भवन खंडहर होते जा रहे है, उसकी दिवारे, रंगरोगन बहुत खस्ताहाल मे है बरसात के समय इन दिवारो से पानी टपकता है। पुस्तकालयो के फर्निचर टूटे-फूटे व बद्तर हालत मे है एंवम आवश्यक फर्निचरो की कमी भी है। अधीकतर पुस्तकालयो मे तो बिजली भी उपलब्ध नही है इस कारण वहां उचित रोशनी और हवा की कमी होती है। ये पुस्तकालय सिर्फ दिन के समय ही खूले रहते है जबकी पुस्तकालय का समय सुबह और शाम दोनो वक्त का होता है।

पुस्तकालयो मे खुद का वाचन साहित्य संग्रह नही के बराबर है। वाचन साहित्य के नाम पर सिर्फ कुछ अखबार आते है।नितीनीयम, सुव्यवस्था प्रणाली, पढने के लिए सही वातावरण इत्यादी बातो का पुस्तकालयो मे अभाव नजर आता है।पुस्तकालयो के समस्याओ के प्रती उत्तरदायी अधीकारीयो की उदासीनता, लालफिताशाही, पार्षदो द्वारा उपेक्षा, पुस्तकालयो के विकास के लिए प्रशासन की उदासीनता, वित्त की कमी।महानगरपालिका के सार्वजनिक पुस्तकालयो मे इलेक्ट्रानिक संसाधनो के उपयोग की नितांत आवश्यकता है परंतु सार्वजनिक पुस्तकालयो मे इनका उपयोग नही के बराबर है।शहर की जनसंख्या की तुलना मे सार्वजनिक पुस्तकालयो की संख्या बेहद कम है। शहर के विकास के साथ सार्वजनिक पुस्तकालयो का भी विकास लगाातार होना चाहिए।पुस्तकालयो के मध्य संसाधन सहभागीता व समन्वय की कमी। नेटवर्कींग, चर्चासत्र, संगोष्टी, कार्यशाला, प्रदर्शनी, इत्यादी क्रियाकलापो मे कभी भी सार्वजनिक पुस्तकालयो का सहभाग नजर नही आता है।

कई बडे-बडे शहरो का हजार करोड के आस-पास का महानगरपालिका का बजट होता है फिर भी वहा के सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थिती बहुत खराब नजर आती है। सार्वजनिक पुस्तकालयो मे इन चिन्हीत समस्याओ को दुर कर देंगे तब ये ही सभी समस्याएॅं गुणो मे बदलकर सार्वजनिक पुस्तकालयो को प्रगतीपथ पर ले जायेंगे और समाज के विकास मे अहम रोल निभायेंगे।

पुस्तकालय सूचना विज्ञान व्यवसायीको के क्षेत्र मे सुअवसर के लिए निम्न सुझाव एंवम सिफारिशः

डिजीटल पर्यावरण मे कार्य करने के लिए तकनिकी कौशल, यांत्रीक तंत्रज्ञान कौशल, प्रबंधकीय कौशल एंवम संचारण कौशल को आत्मसात करना। राष्ट्रिय एंवम अंतराष्ट्रिय संघो ने महत्वपुर्ण प्रशिक्षण पाठ्यक्रमो की व्यवस्था के लिए सिफारिश करना चाहिए। पुस्तकालय सूचना विज्ञान पाठयक्रम की पुनःरचना करना चाहिए ताकी इस तकनिकी डिजीटल युग के अनुसार नौकरी की ज्यादा से ज्यादा अवसर प्राप्त हो सके। नये अधिनियम एंवम ऊचे दर्जे के प्रत्यंायन समीती का गठन करना चाहीए ताकी पुस्तकालय सूचना विज्ञान शिक्षण क्षेत्र मे गुणवत्तापुर्ण शिक्षा प्राप्त हो सके। प्रत्येक पुस्तकालय सूचना विज्ञान महाविद्यालयो एंवम विभागो मे तकनिकी सुविधाएं अनिवार्य कर देना चाहिए।

पुस्तकालयध्यक्षो को पुस्तकालय मे इस डिजीटल पर्यावरण अनुसार तकनिकी कौशल, तंत्रज्ञान को बनाये रखने मे हमेशा निजी महाविद्यालयो के संस्थापको एंवम प्राचार्य ने विशेष रूप से तत्परता दिखानी चाहिए। निजी महाविद्यालयो के संस्थापको ने पुस्तकालय मे आवश्यक कर्मचारीयो की व्यवस्था करनी चाहिए ताकी उपयोक्ता को उचित समय पर उचित सेवाएं प्रदान की जा सके, ना की उलटे पुस्तकालय के ही कर्मचारीयो को पुस्तकालय के बाहर के अन्य कार्यो मे लगाना चाहिए।

महाविद्यालयो के संस्थापको ने पुस्तकालय मे यांत्रीक तंत्रज्ञान एंवम विकास के लिए आवश्यक निधी की व्यवस्था करनी चाहिए।महाविद्यालयो के संस्थापको ने महाविद्यालयो के गुणवत्तापुर्ण विकास के लिए यु.जी.सी. जैसे आयोग व नॅक द्वारा बनाये गये नियमो का कडाई से पालन करना चाहिए।

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