Published On : Sun, Oct 24th, 2021
nagpurhindinews | By Nagpur Today Nagpur News

खबर जरा हटके : एक ग्रामीण आदिवासी की अनोखी कहानी

– जीवित अवस्था मे बनवायी स्वयं की व पत्नियों की मूर्तियां व समाधि। आज भी है जस के तस

गडचिरोली – गड़चिरोली जिला जिसका नाम लेते ही लोगों के मन मे नक्सली , पिछड़ेपन, घनघोर जंगल, विशालकाय पहाड़ें , वीरान सड़कें याद आते है। मगर इन सब से हट कर आज जिले में ऐसे अनेकों विषय है। जो आज भी बाहरी दुनिया के लोगों के आज अनकही किस्से व अनदेखी दास्तां बन कर है। आज हम एक ऐसे विषय पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहे है। जो आज भी कुछ हद तक अनकही व अनदेखी दास्तां बन कर है।

एक ऐसे आदिवासी ग्रामीण रामा कुढमेथे की जो अपने जीवित अवस्था मे ही अपने समाधि के अलावा अपने पत्नीयों के मुर्तियों को अपने गांव के प्रवेश द्वार पर बनवाया है। जो आज 6 दशक के बाद भी ज्यों का त्यों बने हुए है। आज के समय मे बाकायदा वहाँ के आसपास के ग्रामीणों के द्वारा एक विशेष अवसर पर पूजा अर्चना भी की जाती है।


जिले के सिरोंचा तहसील में वनाचंल गांव वडदेली में 60 के दशक में वहाँ के एक आदिवासी ग्रामीण रामा कुढ़मेथे ने अपने गांव के प्रवेश द्वार पर जिन पत्थरों पर अपनी व अपनी तीन पत्नियों मासी कुढ़मेथे, रामी कुढ़मेथे, जोगी कुढमेथे सभी का जीवित अवस्था मे ही पुथले बनवाकर पूरे इलाके में एक अनोखी प्रथा की शुरुवात की थी । बताया गया है कि 1960 के अविभाजित चंद्रपुर (चांदा) जिले में पेशे से किसान रामा कुढमेथे किसी शासकीय कार्य के चलते गए हुए थे। उस दौरान रामा ने देखा कि चांदा शहर में भिन्न भिन्न जगहों पर पुथले बने हुए है।

उनके मन मे ख्याल आया कि क्यों ना हम भी अपने गांव में इसी तरह का पुथलों का निर्माण कर गांव में लगाये। तब गांव लौट कर उन्होंने सोचा किसके लगाए जाएं तब कुछ नही सूजा तो उन्होंने अपने एवं अपने तीन पत्नियों के पुथले लगाने का ठानी। इसके उसने अपने आस पास के क्षेत्र में शिल्पकार की खोज में बहुत प्रयास किया। अंत मे उससे तहसील के ही आसरल्ली गांव में एक शिल्पकार पुरुषोत्तम के होने की जानकारी मिली। तब रामा ने उनसे संपर्क कर 1200 रुपियों के लागत से चारों पुथलों को बनवाकर गांव वडदेल्ली के प्रवेश द्वारा पर स्थापित कर वायी।

बताया गया है कि रामा के तीन पत्नियां थी। जिनसे परिवार में 11 संतानों का आगमन हुआ। परिवार के एक संतान व रामा के नाती पेंटा चिंतामन कुढ़मेथे जो कि सेना में 15 वर्षों तक नौकरी करने के बाद रिटायर्ड हुआ है। इसके अलावा रामा समाज मे व्याप्त कुरूतियों को लेकर भी अपने जीवित अवस्था मे मुखर हो कर विरोध करते थे। इसी का उदाहरण उनकी तीसरी पत्नी है। जो विवाह के उपरांत पति के स्वर्गवास के बाद विधवा के रूप में जीवन यापन कर रही थी। जबकि उन दिनों में एक विधवा को बड़े ही हीन भावना से देखा जाता था। इसको संज्ञान में लेते हुए उसने समाज में व्याप्त इस हीन भावना व कुरुति को समाप्त करने के उद्देश्य से उस विधवा महिला से ब्याह रचाई थी।जो बाद में रामा की तीसरी पत्नी बनी।

वर्तमान समय मे वडदेल्ली गांव में रामा कुढ़मेथे के वर्तमान पीढ़ी निवासरत है। जो उनकी तीसरी पीढ़ी बतायी गयी है। गांव में रामा के द्वारा 1960 में बनाई गयी सीमेंट की पक्की मकान आज भी मौजूद है। जहाँ आज की पीढ़ी गुजर बसर कर रही है। रामा की दूर दृष्टि के बारे में वर्तमान पीढ़ी बताते हुए कहती है कि परिवार के सदस्यों में जमीन के बटवारे को लेकर कोई विवाद ना हो इसको लेकर रामा ने अपने जीवित रहते हुए ही बटवारा कर दिया था। इस तरह की जानकारी रामा कुढमेथे के परिवारजनों ने दी है।

रामा के परिवार को जानने वाले एवं उनके करीबी लोग राम कुढ़मेथे को लेकर बताते है कि रामा कुढ़मेथे का उन दिनों में गांव में काफी दबदबा होता था। गांव में उ है लोग गांव प्रधान के तौर पर मानाते थे। इस न सबके बावजूद रामा के मन मे एक सवाल अक्सर उठता था। मेर बाद मेरे परिवार का भी गांव में मान सम्मान बने रहे। इसको लेकर रामा ने उनके बाद परिवार में जायदाद को लेकर कोई फुट ना पड़े। रामा ने गांव के बुजुर्गों के बीच परिवार में अपने जायदाद का बटवारा करा दिया। साथ मे उसके मृत्यु के बाद कि जाने वाला कर्म कांड से जुड़ी हुई रिवाज की खर्च भी परिवार पर ना पड़े इसके उसने अपने जीवित अवस्था मे ही समाधि बनवाकर मृत्यु उपरांत की जाने वाली रिवाज को भी रामा ने जीवित अवस्था मे ही कर डाली। इसके अलावा रामा ने अपने समाधि के साथ साथ अपने तीन पत्नीयों की शिला आकृतियां बीबी बनवायी। परिवार के प्रति प्यार , आदर, समाज में प्रतिष्ठा की चिंता ने एक तरह से रामा के द्वारा ऐसा अनोखा , अब तक का अनसुना किस्सा करवा दिया। जिससे आज भी लोग अलग अंदाज में देखते है।

सतीश कुमार पडमाटिंटी गड़चिरोली।