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    Published On : Wed, Oct 2nd, 2019

    पत्रकारिता ईमानदारी से करने के लिए आपको निडर बनने की जरुरत- वरिष्ठ पत्रकार और विचारक एस.एन.विनोद

    मूल्यानुगत मीडिया -संभावना और चुनौतियां व गीतांजलि के हिंदी अनुवाद का हुआ लोकार्पण

    नागपुर: सृजन बिंब प्रकाशन की ओर से महात्मा गांधी की 150वी जयंती के अवसर पर लेखक प्रो. कमल दीक्षित की किताब मूल्यानुगत मीडिया -संभावना और चुनौतियां और रवीन्द्रनाथ टैगोर की किताब गीतांजलि के हिंदी अनुवाद का लोकार्पण सिविल लाइन्स स्थित प्रेस क्लब में किया गया. इस दौरान अध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ पत्रकार और व् विचारक एस.एन.विनोद, सीएसआईआर-नीरी के भूतपूर्व वैज्ञानिक डॉ.तपन चक्रवर्ती, गांधी विचारक और चिंतक लीलाताई चितले, प्रेस क्लब के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप मैत्रेय, आकाशवाणी के निदेशक डॉ.हरीश पाराशर, सुजृन बिंब की रीमा दीवान चड्ढा और ग्राम सभा मेल के राजेश नामदेव मौजूद थे.कार्यक्रम की शुरुवात दिप प्रजव्लन से की गई. कार्यक्रम में रविंद्रनाथ टैगोर के एकला चलो कविता को भी गाया गया. इस दौरान वरिष्ठ पत्रकार एस.एन.विनोद ने अभी हाल ही के पत्रकारों पर और संस्थानों पर अपने विचार रखे.

    इस दौरान उन्होंने कहा की गीताजंलि का प्रकाशन लगभग सभी भाषाओ में हो चूका है. उन्होंने खबरों के वर्तमान काल को अँधा युग कहा है. उन्होंने कहा की जब पहला स्तंभ ही संदिग्ध है तो चौथे स्तंभ की बात ही छोड़िए. उन्होंने कहा की आजादी की पूरी लड़ाई ही पत्रकारों के माध्यम से हुई है. आज की स्थिति में शब्द और शब्दकार दोनों ही कैद की अवस्था में है. विश्वसनीयता के संकट से अभी मीडिया गुजर रहा है.

    मीडिया से जुड़े छात्र जो अपने भविष्य को लेकर इसमें आते है वह भी अब भ्रम की स्थिति में है. पत्रकारिता ईमानदारी से करने के लिए आपको निडर बनने की जरुरत है. उसके लिए कुर्बानी की जरुरत होती है. जब तक आप निडर नहीं होते तब तक सच सामने नहीं आ सकता. उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार पुण्यप्रसून वाजपेयी जब नागपुर में लोकमत में थे. उस दौर की बात बताई . गड़चिरोली में एक घटना हुई थी और वह पुण्यप्रसून ने कवर की थी. दुष्कर्म की खबर थी. हमारे यहां पहले पेज पर खबर छपी. उस समय मुंबई में अधिवेशन था जिसके बाद विधानसभा में यह मुद्दा उठाया गया.

    इस दौरान उन्होंने एक बॉक्स में दिया की हम आज भी अपनी चुनौती पर कायम है. उस समय शरद पवार मुख्यमंत्री थे. जांच कमेटी बैठी इस मामले पर और खबर सच निकली और इसके बाद कई लोगों की गिरफ्तारियां हुई. पुण्यप्रसून और केजरीवाल के इंटरव्यू में जो हुआ उसको एक मुद्दा बनाया गया. जब की वह एक सामान्य बात है. पुण्यप्रसून ने रामदेवबाबा से सवाल किया तो उन्हें आज तक से जाना पड़ा और एबीपी में भी उनके साथ वही हुआ. आजादी के समय पत्रकारिता मिशन के जैसे थी. लेकिन अब वह नहीं है. पत्रकारों को प्रताड़ित किया जा रहा है उनके साथ अभी हाल ही में मारपीट भी हुई है. 92 प्रतिशत संस्थानों में खबरो में मालिक का हस्तक्षेप होता है. अभी जरुरत है की वे पाठको के साथ ईमानदारी से पेश आए. यह हमारा कर्तव्य है की उन्हें सच दिखाए. आपातकाल में भी ऐसा वातावरण नहीं था जो अब है. उन्होंने पत्रकारिता के पेशे को पवित्र पेशा बताया.

    इस दौरान 89 वर्ष की लीलाताई ने भी अपने अनुभव बताएं. उन्होंने कहा की बापू टैगोर को गुरु मानते थे. उन्होंने कहा की स्वातंत्रता सेनानी अरुणा असफ अली के साथ उन्होंने काम किया वह वे उनकी नेता थी. एक दिन के लिए वे भी जेल गई थी. उन्होंने कहा की पहली इमेरजैंसी अंग्रेजो के समय थी, दूसरी इंदिरा गांधी के समय और अब तीसरी एमरजेंसी है.

    इस कार्यक्रम में आकाशवाणी के निदेशक डॉ.हरीश पाराशर ने कहा की मोबाइल और टीवी के जमाने में किताब लिखना काफी कठिन काम है.रचना की अपनी अहमियत होती है. उस समय जब रेडिओ आए थे. तो लोगों का कहना था की अब अखबार कौन पड़ेगा. लेकिन अखबार तेजी से बढे. उन्होंने कहा की किताब ही प्रमाणिकता है.

    कार्यक्रम में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप मैत्रेय ने इस समय कहा की पत्रकार अगर किताब लिखता है तो वह बड़ी बात है.आज के पत्रकार पढ़ते ही नहीं है.लेकिन जो पत्रकार पढ़ते है उन्हें दूसरे पत्रकार बुरा भला कहते है. इस दौरान उन्होंने टैगोर के नोबल पुरस्कार से जुडी एक बात भी मौजूद मेहमानो को बताई.

    प्रो. कमल दीक्षित ने इस समय कहा की वे नागपुर 1967 में आए थे. उन्होंने उनको देखा है जिन्होंने महात्मा गांधी को कवर किया था. उन्होंने 1967 के बाद से पत्रकारिता बिजनेस के रूप में उभरी है. उन्होंने कहा की ईमानदारी को हमेशा कसौटी से गुजरना पड़ता है. उन्होंने इस दौरान सुजृन बिंब की रीमा दीवान चड्ढा को धन्यवाद भी दिया.

    इस समय मौजूद डॉ. तपन ने कहा की गीतांजलि को लिखने से पहले मैंने गीतांजलि फिर पढ़ी. उन्होंने कहा की इसमें टैगोर की 103 कविताएं है. उन्होंने कहा था की ईश्वर हमारे मन में है. टैगोर जब जिन्दा थे तो गांधी कई बार शांतिनिकेतन आए थे. उन्होंने कहा की गीतांजलि पढ़ने के बाद गीता और उपनिषद पढ़ने की जरुरत नहीं. इस समय मंच संचालन सुजृन बिंब की रीमा दीवान चड्ढा ने किया.

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