Published On : Wed, Feb 1st, 2017

मानवता का अपमान है, ई अहमद की ‘आत्मा’ का अपमान !

E-Ahamed
अगर आजाद भारत के संसदीय इतिहास की यह पहली घटना है कि पंरपरा का त्याग कर फरवरी के अंतिम दिन की जगह फरवरी के प्रथम दिन देश का आम बजट, वह भी 92 वर्ष की स्थापित पंरम्परा से इतर रेल बजट को समाहित कर, पेश किया जा रहा है, तो संसदीय इतिहास की यह पहली घटना है जब बजट सत्र के प्रथम दिन राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान ही संसद के अंदर किसी सांसद को घातक दिल का दौरा पडा हो.

31 जनवरी 2017 को ऐसी ही घटना हुई. राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी सेंट्रल हॉल में दोनों सदनो के सांसदो को संबोधित कर रहे थे. तभी अचानक देश के एक पूर्व विदेश राज्य मंत्री, केरल के निर्वाचित सांसद ई अहमद को गंभीर दिल का दौरा पडा, संसद भवन से अस्पताल ले जाया गया, और आज बुधवार की अल सुबह उनके निधन की धोषणा की गई. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. जब संसद भवन से श्री अहमद को स्ट्रेचर पर लिटा ऐम्बुलंस में रखा जा रहा था, तभी उनकी देखभाल कर रहे डॉक्टरों के हावभाव से स्पष्ट लग रहा था कि हद्याघात घातक है. डॉक्टर श्री अहमद के दिल का मसाज कर उनके हदय की घडकन को जारी रखने/ वापस लाने की कोशिश करते देखे गए. चौंकाने वाली खबर ये भी है कि अस्पताल में परिवार के सदस्यों को उनसे मिलने नहीं दिया गया. दिल्ली की सुख्यात सामाजिक कार्यकर्ता शबनम खान ने इसकी पुष्टि की है.

बहरहाल, जब बुधवार की सुबह श्री अहमद के निधन की घोषणा की गई तब ऐसी आशा व्यक्त की जा रही थी की बजट की प्रस्तुति को एक दिन टाल, सांसद श्री अहमद को श्रद्धांजलि देने के बाद, संसद की कार्यवाही स्थगित कर दी जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि इससे पूर्व 1954 और 1994 में सत्र के दौरान सांसदों की मुत्यु के बाद भी संसद की कार्यवाही स्थगित नहीं की गई थी. इसे मैं कुतर्क मानूंगा. तब और अब की दुखद घटना में बहुत अंतर है. तब सांसदो को राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान , अर्थात सत्र के आरंभ में ही, सदन के अंदर घातक दिल के दौरे नहीं पडे थे. संसद की कार्यवाही को स्थगित न कर ना केवल सरकार बल्कि संसद ने एक वरिष्ट सांसद के प्रति संवेदनहीनता का परिचय दिया है. जब बजट परंपरा का त्याग का एक माह पहले पेश किया जा सकता है, तब एक दिन के लिए स्थगित क्यों नहीं किया जा सकता था? कोई मानव – मन इतना संवेदनशून्य कैसे हो सकता है? अपने ही एक सहयोगी को जिन परिस्थितियों में सदन के अंदर गंभीर दिल का दौरा पडता है, अंतत: मुत्यु हो जाती है, उनके सम्मान में संसद की कार्यवाही एक दिन के लिए स्थगित कर बजट प्रस्तुति एक दिन के लिए टाल देने से कोई पहाड नहीं टूट पडता!

सरकार या लोकसभा अध्यक्ष अपने फैसले के पक्ष में चाहे जितनी दलीलें दे लें, देश की जनता मर्माहत है. विस्मित है कि उसके द्वारा निर्वाचित जन प्रतिनिधि इतने क्रूर-निर्मम कैसे हो सकते है? लोकसभा अध्यक्ष व सरकार संभवत: भूल गई कि ई अहमद को संसद के अंदर पडे घातक दिल के दौरे के पश्चात और अंतत: मुत्यु को प्राप्त, के सम्मान मे संसद की कार्यवाही स्थगित नहीं करने से पूरे देश में एक: गलत संदेश गया है. आज नहीं तो कल, इसके दुष्परिणाम सामने आयेगें. ई अहमद का अपमान, देश की मानवता का अपमान है!