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    Published On : Sun, Aug 13th, 2017

    …..भय, भयभीत, भयावह !

    नागपुर: योग गुरू बाबा रामदेव ने आज हामिद अंसारी पर हल्ला बोलते हुए कहा कि,”..बड़े आदमी कोआग लगाना नहीं, बुझाना चाहिए!”जाहिर है,रामदेव उपराष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म होने के मौके पर हामिद अंसारी के उस वक्तव्य पर चुटकी ले रहे थे जिसमें अंसारी ने कहा था कि,”देश में अल्पसंख्यक(मुसलमान)स्वयं को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।”अंसारी की इस पर,मर्यादा की सीमा पार कर आलोचना हुई।अभी आग शांत ही हो रही थी, कि रामदेव ने आज पेट्रोल डाल भड़का दिया।

    अनेक मित्रों के आग्रह के बावजूद मैंने तय किया था कि इस अत्यधिक संवेदनशील मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।लेकिन, अब कुछ सचाई रखना निहायत जरूरी!

    हामिद अंसारी पर चौतरफा हमले हुए।वे मौन रहे।10वर्षों तक भारत के उपराष्ट्रपति रहे अंसारी को देश छोड़ कहीं किसी अन्य देश चले जाने तक की सलाह दे दी गई।स्वयं प्रधानमंत्री मोदी ने अंसारी की विदाई के अवसर पर कह डाला कि,”अब आप मुक्त हो,अपनी”आस्था”,अपनी सोच के अनुसार फैसले लेने को।”अंसारी से उपराष्ट्रपति पद का कार्यभार ग्रहण करने वाले वेंकैया नायडू ने भी अंसारी पर व्यंग्यात्मक,बल्कि आपत्तिजनक प्रहार किए।अनेक केंद्रीय मंत्री और सत्तारुढ़ भाजपा के बड़े नेता भला पीछे कैसे रहते!उन्होंने भी देश के निवर्तमान उपराष्ट्रपति को “चाबुकिया” विदाई दे डालीं।

    देश के उपराष्ट्रपति की ऐसी विदाई! अभूतपूर्व,अकल्पनीय!! शर्मशार हुआ भारतीय लोकतंत्र का इतिहास।

    ईमानदारीपूर्वक एक टिप्पणी करूँ? कर देता हूँ!

    -‘प्रधानमंत्री, उपराष्ट्रपति एवं अन्य नेताओं ने हामिद अंसारी को”चोट”नहीं पहुंचाई,स्वयं को और धर्मनिरपेक्ष भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को”चोटिल”किया है।’

    क्या गलत कहा था हामिद अंसारी ने?बाबा रामदेव जी, हामिद अंसारी आग नहीं लगा रहे थे, बल्कि धू-धू करती आग को मोटी रेखाओं से चिन्हित कर रहे थे ताकि आग बुझाने के उपक्रम शुरू किए जा सकें।ताकि आग बुझाई जा सके।ताकि धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत का चेहरा विद्रूप ना हो!

    सभी को तो नहीं, कुछ लोगो को बुरा लग सकता है कड़वा सच जान कर।और, कड़वा सच है कि हाँ, कुछ अपवाद छोड़,भारत का मुसलमान स्वयं को असुरक्षित महसूस करता है।और सचाई कि ये अवस्था कोई आज निर्मित नहीं हुई है, विभाजन के बाद से ही, अर्थात आज़ाद भारत में आरंभ से ही इस “अवसाद” का प्रवेश हो चुका था।प्रवेश दिया गया एक अत्यंत ही कुत्सित मंशा के तहत! विभाजन के वक्त की भयावह त्रासदी के घेरे में इन्हें रखा गया।कौम अथवा समुदाय का समझदार वर्ग सभी के लिए भयमुक्त समाज का आकांक्षी था।

    संविधान सभा में जब कश्मीर के लिए विशेष दर्ज़े का प्रावधान किया जा रहा था, मोहम्मद करीम छागला ने ये कहते हुए आपत्ति प्रकट की थी कि”हमें राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग क्यों किया जा रहा है?”लेकिन, तब सत्ता-प्राप्त कांग्रेस ने, प. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में, इस समुदाय में अपना और पार्टी का भविष्य देखा। आज़ादी के जुनून में भविष्य के लिए खतरनाक, साजिश रूपी “मंशा” की अनदेखी हो गई।भयभीत मुस्लिम समुदाय का बड़ा वर्ग कांग्रेस पर आश्रित होने मजबूर कर दिया गया।कांग्रेस ने इन्हें अपने”वोट बैंक” के रूप में संरक्षित कर लिया।संसार में अपनी धर्मनिरपेक्षता का प्रचार करने मुस्लिम समुदाय से राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति बनाये गए। समय-समय पर बड़े पद भी दिये जाते रहे।लेकिन, कड़वा और अत्यंत ही कड़वा सच कि समुदाय के बीच निरंतर भय व्याप्त कर इन्हें दोयम दर्ज़े का नागरिक बना कर रखा गया!भय और अविश्वास के साये में रहने को ये विवश किए जाते रहे। समुदाय का विचारवान वर्ग समय-समय पर विचलित-परेशान तो दिखा,किन्तु अपनी नगण्य संख्या के कारण कोई निर्णायक, सकारात्मक कदम नहीं उठा सका।

    केंद्रीय सत्ता में परिवर्तन और कट्टरपंथी विचारधारा के प्रवेश ने आज़ादी के बाद से चली आ रही स्थिति को और भी विषम बना डाला।अब’मुस्लिम वोट बैंक’के मुकाबले’हिन्दू वोट बैंक’ खड़ा किया जा रहा है।साम्प्रदायिक आधार पर अनेक ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया गया जिस कारण अबतक धर्मनिरपेक्ष हिन्दू समाज का एक तबका अंगड़ाई ले उठा।हिन्दू-ध्रुवीकरण की एक नई प्रक्रिया शुरू हुई।समय की मांग ?नहीं ! राजनीति की बिसात पर पारंपरिक प्रतिद्वंद्वियों की जगह नये गणवेश में,नई चालों के साथ,नई फ़ौजें आमने-सामने।ऐसे में पारंपरिक शुचिता, नैतिकता, आचरण बलिवेदी पर तो चढ़ेंगी ही!

    हामिद अंसारी प्रकरण में यही सबकुछ तो हुआ। हो रहा है।

    हामिद अंसारी गलत नहीं थे।उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व अन्य नेताओं की प्रतिक्रियाएं भी परिवर्तित राजनीति, परिवर्तित समाज परिवर्तित सोच और परिवर्तित जरूरत के अनुरूप रहीं।

    और, जब परिवर्तन की आंधी चलती है तब अनेक मजबूत किले धराशायी हो जाते हैं।आंधी पश्चात के दृश्य की कल्पना सहज नहीं होती।उन्हें स्वीकारना तो और भी कठिन।

    देश आज एक वैचारिक युद्ध से रूबरू है।

    परिणाम की भविष्यवाणी फिलहाल संभव नहीं।बस, प्रार्थना कि देश-समाज विरासत के अनुरूप संयम न खोएं।सुनिश्चित करें कि मंदिर-मस्जिद कायम रहें!


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