Published On : Mon, Oct 12th, 2026
By Nagpur Today Nagpur News

बीमार मां से मिलने की आस में कैदी को राहत, हाईकोर्ट ने नए सिरे से फरलो आवेदन की दी अनुमति

जेल से देरी से लौटने के आधार पर खारिज हुई थी अर्जी; चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश, फरलो नियमों की वैधता पर भी उठे अहम सवाल
Advertisement

नागपुर – बीमार मां से मिलने के लिए फरलो की मांग करने वाले आजीवन कारावास की सजा काट रहे कैदी को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ से राहत मिली है। अदालत ने कैदी विशाल लांजेवार को फरलो के लिए नए सिरे से आवेदन करने की अनुमति देते हुए संबंधित अपीलीय प्राधिकारी को इस पर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। इस मामले में अदालत ने फरलो से संबंधित नियमों और जेल से देरी से लौटने वाले कैदियों पर दोबारा फरलो पाने के लिए लागू प्रतीक्षा अवधि को लेकर भी महत्वपूर्ण कानूनी सवालों पर विचार किया।

न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फालके और न्यायमूर्ति राज वाकोड़े की खंडपीठ ने विशाल लांजेवार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अदालत ने अपने निर्णय में फरलो के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल कैदी को जेल से अस्थायी रूप से बाहर जाने की सुविधा देने तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे परिवार के संपर्क में रहने, पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने और लगातार कैद में रहने के मानसिक दुष्प्रभावों से राहत पाने का अवसर भी प्रदान करती है।

बीमार मां से मिलने के लिए किया था आवेदन

मामले के अनुसार, नागपुर सेंट्रल जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे विशाल लांजेवार ने 14 जनवरी 2026 को अपनी बीमार मां से मिलने के उद्देश्य से फरलो के लिए आवेदन किया था। कैदी की ओर से परिवार से मिलने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उसे कुछ समय के लिए जेल से बाहर जाने की अनुमति देने की मांग की गई थी।

Advertisement

हालांकि, पुलिस रिपोर्ट के आधार पर उसके आवेदन का विरोध किया गया। रिपोर्ट में बताया गया कि लांजेवार इससे पहले फरलो पर जेल से बाहर गया था, लेकिन निर्धारित समय पर वापस नहीं लौटा। वह निर्धारित अवधि से 35 दिन की देरी से जेल पहुंचा था। इस घटना के संबंध में उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 265 के तहत अपराध भी दर्ज किया गया था।

इसी आधार पर उसकी फरलो की अर्जी खारिज कर दी गई। इसके बाद कैदी ने संबंधित अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष भी राहत की मांग की, लेकिन वहां से भी उसे राहत नहीं मिली। परिणामस्वरूप, उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

कोल्हापुर खंडपीठ के फैसले का लिया सहारा

सुनवाई के दौरान नागपुर खंडपीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट की कोल्हापुर खंडपीठ के एक महत्वपूर्ण फैसले का संदर्भ लिया। यह फैसला दिलीप प्रेमनारायण तिवारी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिया गया था।

इस फैसले में फरलो के उद्देश्य और कैदियों के पारिवारिक जीवन से जुड़े पहलुओं पर विचार किया गया था। अदालत ने माना था कि फरलो कैदी को अपने परिवार के संपर्क में बने रहने, पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने और भविष्य के प्रति उम्मीद कायम रखने का अवसर देता है।

कोल्हापुर खंडपीठ ने यह भी विचार किया था कि फरलो पर रिहा होने के बाद निर्धारित समय से देर से जेल लौटने वाले कैदियों पर दोबारा फरलो पाने के लिए प्रतीक्षा अवधि लागू करने संबंधी नियमों को हर मामले में बिना परिस्थितियों पर विचार किए यांत्रिक तरीके से लागू करना उचित है या नहीं।

विशेष रूप से नियम 7(2) के तहत निर्धारित प्रतीक्षा अवधि के संदर्भ में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत प्राप्त अधिकारों से जुड़े सवाल उठाए गए थे। इन प्रावधानों का संबंध कानून के समक्ष समानता और जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण से है।

प्रतीक्षा अवधि बीतने के बाद नए आवेदन का रास्ता खुला

नागपुर खंडपीठ ने मामले की परिस्थितियों पर विचार करते हुए पाया कि लांजेवार ने पहले जो आवेदन किया था, वह निर्धारित एक वर्ष की अवधि पूरी होने से पहले दाखिल किया गया था। हालांकि, सुनवाई के समय तक वह प्रतीक्षा अवधि बीत चुकी थी।

ऐसे में अदालत ने कोल्हापुर खंडपीठ के पूर्व फैसले को ध्यान में रखते हुए कैदी को नए सिरे से फरलो के लिए आवेदन करने की अनुमति दी। साथ ही, संबंधित अपीलीय प्राधिकारी को निर्देश दिया कि वह नए आवेदन पर चार सप्ताह के भीतर उचित निर्णय ले।

इस आदेश के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया। हालांकि, अदालत के आदेश का अर्थ यह नहीं है कि कैदी को फरलो पर रिहा करने की अंतिम अनुमति मिल गई है। नए आवेदन पर निर्णय संबंधित प्राधिकारी को लेना है।

कैदियों के अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण मामला

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक ओर जेल से निर्धारित समय से देरी से लौटने के मामले को ध्यान में रखा गया, वहीं दूसरी ओर फरलो के मूल उद्देश्य और कैदी के पारिवारिक जीवन के महत्व पर भी विचार किया गया।

फरलो की व्यवस्था का उद्देश्य कैदी को अपने परिवार से जुड़े रहने और समाज के साथ संपर्क बनाए रखने का अवसर देना है। लंबे समय तक जेल में रहने वाले कैदियों के लिए पारिवारिक संपर्क मानसिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।

हाईकोर्ट के इस आदेश से फिलहाल विशाल लांजेवार के नए आवेदन पर विचार किए जाने का रास्ता खुला है। अब संबंधित अपीलीय प्राधिकारी को अदालत के निर्देश के अनुसार चार सप्ताह के भीतर आवेदन पर निर्णय लेना होगा।

Advertisement
GET YOUR OWN WEBSITE
FOR ₹9,999
Domain & Hosting FREE for 1 Year
No Hidden Charges
Follow Nagpur Today on Google
Add Nagpur Today to your Preferred Sources on Google to see our latest news more prominently in Search.