Published On : Fri, Oct 23rd, 2026
By Nagpur Today Nagpur News

हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तपन जायसवाल के खिलाफ FIR, चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही रद्द

साहूकारी कानून के तहत दर्ज मामले में पुलिस की जांच प्रक्रिया पर उठे सवाल; पांच साल से अधिक की देरी और मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना जांच को अदालत ने माना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग
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हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: तपन जायसवाल के खिलाफ FIR, चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही रद्द

नागपुर – नागपुर के चर्चित साहूकारी प्रकरण में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए व्यापारी तपन जायसवाल को बड़ी कानूनी राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर, दाखिल चार्जशीट और निचली अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने संबंधित कानून के प्रावधानों, अपराध दर्ज करने में हुई देरी और पुलिस द्वारा अपनाई गई जांच प्रक्रिया पर विचार किया। अदालत के आदेश में स्पष्ट किया गया कि वैधानिक प्रावधानों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना जारी रखी गई आपराधिक कार्यवाही कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

इस मामले में शिकायतकर्ता विमल दिनेश कालमेघ की शिकायत के आधार पर प्रतापनगर पुलिस थाने में महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था। तपन जायसवाल ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर और उसके आधार पर दाखिल चार्जशीट को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। याचिका में आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने की मांग की गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुबोध धर्माधिकारी और अधिवक्ता समीर सोनवने ने पैरवी की। बचाव पक्ष ने अदालत के सामने मामले के तथ्यों के साथ संबंधित कानून के प्रावधानों और आपराधिक प्रक्रिया में मौजूद कानूनी खामियों को प्रस्तुत किया। सुनवाई के बाद अदालत ने मामले की कार्यवाही निरस्त करने का आदेश दिया।

पांच साल से अधिक की देरी से दर्ज हुई थी एफआईआर
मामले में शिकायतकर्ता विमल दिनेश कालमेघ ने आरोप लगाया था कि दिसंबर 2013 में उनके बेटे राहुल कालमेघ ने मकान निर्माण के लिए तपन जायसवाल से 2 लाख 50 हजार रुपये उधार लिए थे। शिकायत के अनुसार, इस लेन-देन पर 17.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज तय किया गया था। आरोप था कि मूल रकम में से 35 हजार रुपये ब्याज के रूप में काटकर 2 लाख 15 हजार रुपये दिए गए थे।

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शिकायतकर्ता ने आगे आरोप लगाया था कि बाद में मूल रकम और ब्याज की वसूली के लिए दबाव बनाया गया। इसके अलावा मारपीट, पिस्टल दिखाकर धमकाने और जबरन प्लॉट की रजिस्ट्री करवाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए थे। इन आरोपों के आधार पर शुरुआत में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की गंभीर धाराओं और आर्म्स एक्ट के तहत कार्रवाई की थी।

हालांकि, उपलब्ध मामले के विवरण के अनुसार, जांच के दौरान पुलिस ने इन गंभीर आरोपों के संबंध में पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के बाद संबंधित धाराएं हटा दी थीं। इसके बाद महाराष्ट्र साहूकारी अधिनियम के प्रावधानों के तहत चार्जशीट दाखिल की गई।

याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में मामले की समयसीमा और जांच की वैधानिकता का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। अदालत ने इन पहलुओं पर विचार करते हुए पाया कि कथित अंतिम घटना 21 मार्च 2015 की बताई गई थी, जबकि एफआईआर 31 जुलाई 2020 को दर्ज की गई। इस प्रकार शिकायत दर्ज करने में पांच साल से अधिक की देरी हुई थी।

साहूकारी का वैध लाइसेंस होने का मुद्दा भी अहम
हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र साहूकारी (विनियमन) अधिनियम, 2014 की धारा 39 के तहत लगाए गए आरोपों पर विचार करते हुए याचिकाकर्ता के लाइसेंस से संबंधित तथ्य को महत्वपूर्ण माना। अदालत के आदेश के अनुसार, संबंधित अवधि के लिए याचिकाकर्ता के पास सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध साहूकारी लाइसेंस मौजूद था।

ऐसी स्थिति में बिना लाइसेंस साहूकारी करने से संबंधित अपराध का मामला नहीं बनता था। अदालत ने संबंधित कानूनी प्रावधानों और उपलब्ध तथ्यों का परीक्षण करने के बाद इस आरोप के आधार पर आपराधिक कार्यवाही जारी रखने के औचित्य पर विचार किया।

इस निष्कर्ष का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि किसी व्यक्ति के खिलाफ साहूकारी कानून के तहत अपराध कायम करने के लिए केवल शिकायत में लगाए गए आरोप पर्याप्त नहीं होते। संबंधित अवधि में लागू कानून, लाइसेंस की स्थिति और अपराध के आवश्यक कानूनी तत्वों की जांच भी जरूरी होती है।

तीन साल की वैधानिक समयसीमा का भी सवाल
हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र साहूकारी अधिनियम की धारा 45 के तहत लगाए गए उत्पीड़न संबंधी आरोपों के संदर्भ में आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 468 पर भी विचार किया।

अदालत के समक्ष यह तथ्य था कि कथित अंतिम घटना मार्च 2015 की थी, जबकि शिकायत जुलाई 2020 में दर्ज हुई। आदेश में उल्लिखित कानूनी विश्लेषण के अनुसार, दो साल तक की सजा वाले अपराधों में संज्ञान लेने की सामान्य समयसीमा तीन वर्ष निर्धारित है।

इस मामले में एफआईआर दर्ज होने तक काफी समय बीत चुका था। ऐसे में अपराध की प्रकृति, लागू दंड प्रावधान और संज्ञान लेने की वैधानिक सीमा को ध्यान में रखना आवश्यक था। हाईकोर्ट ने इस कानूनी पहलू को भी कार्यवाही की वैधता पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना।

मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना जांच पर अदालत की टिप्पणी
इस प्रकरण का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू पुलिस की जांच प्रक्रिया से जुड़ा था। हाईकोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र साहूकारी अधिनियम की धारा 43, 44 और 46 के तहत संबंधित अपराध गैर-संज्ञेय श्रेणी में आते हैं।

गैर-संज्ञेय अपराधों में पुलिस को जांच शुरू करने से पहले CrPC की धारा 155(2) के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट की अनुमति लेना आवश्यक होता है। मामले में यह सवाल उठा कि क्या निर्धारित अनुमति प्राप्त किए बिना जांच की गई थी।

अदालत ने इस कानूनी आवश्यकता और जांच की प्रक्रिया का परीक्षण किया। कानून के अनुसार अनिवार्य अनुमति के बिना की गई जांच आपराधिक प्रक्रिया की वैधता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर सकती है। इस मामले में सामने आई कानूनी खामियों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने कार्यवाही जारी रखने के आधारों पर विचार किया।

‘हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल’ फैसले के कानूनी सिद्धांतों का संदर्भ
हाईकोर्ट के समक्ष सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित फैसले हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल में स्थापित कानूनी सिद्धांतों का भी संदर्भ आया। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने उन परिस्थितियों पर मार्गदर्शन दिया है, जिनमें एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही को अदालत द्वारा निरस्त किया जा सकता है।

सामान्य कानूनी सिद्धांत यह है कि जहां आरोपों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर अपराध के आवश्यक तत्व नहीं बनते, अथवा कार्यवाही कानून के स्पष्ट प्रावधानों के विपरीत हो, वहां उच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर सकता है। हालांकि, प्रत्येक मामले में निर्णय उसके विशिष्ट तथ्यों और लागू कानून के आधार पर किया जाता है।

तपन जायसवाल के मामले में लाइसेंस की स्थिति, एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी और जांच के लिए आवश्यक अनुमति जैसे मुद्दों पर विचार किया गया। अदालत ने इन कानूनी पहलुओं को समग्र रूप से देखते हुए आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने का आदेश दिया।

निचली अदालत में लंबित मामला भी निरस्त
हाईकोर्ट ने केवल एफआईआर और चार्जशीट तक आदेश सीमित नहीं रखा, बल्कि 11वें संयुक्त सिविल जज, कनिष्ठ स्तर तथा प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित आपराधिक मामले की कार्यवाही भी रद्द कर दी।

इस आदेश से तपन जायसवाल को संबंधित आपराधिक प्रकरण में बड़ी राहत मिली है। मामला लंबे समय से विवाद का विषय रहा था और इसमें शुरुआत में लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद अंततः साहूकारी अधिनियम की धाराओं के तहत चार्जशीट दाखिल की गई थी।

हाईकोर्ट के फैसले ने यह स्पष्ट किया कि किसी शिकायत के आधार पर आपराधिक कार्रवाई शुरू होने के बाद भी पुलिस और अभियोजन को कानून में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना अनिवार्य है। अपराध की प्रकृति, जांच की अनुमति, अभियोजन की समयसीमा और संबंधित कानूनी प्रावधानों की अनदेखी कर कार्यवाही को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं की पैरवी में कानूनी पहलुओं पर जोर
तपन जायसवाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुबोध धर्माधिकारी और अधिवक्ता समीर सोनवने ने अदालत में पक्ष रखा। बचाव पक्ष की ओर से साहूकारी कानून के प्रावधानों, वैध लाइसेंस, शिकायत दर्ज करने में हुई देरी और जांच की प्रक्रिया से जुड़े मुद्दों को सामने रखा गया।

इन कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए एफआईआर, चार्जशीट और लंबित आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

कानूनी प्रक्रिया के पालन पर महत्वपूर्ण संदेश
इस फैसले का प्रमुख संदेश यह है कि आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई करते समय केवल आरोपों की गंभीरता ही नहीं, बल्कि कानूनी प्रक्रिया का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पुलिस जांच और अभियोजन को वैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर काम करना होता है। जहां कानून किसी विशेष प्रक्रिया या अनुमति को अनिवार्य बनाता है, वहां उसका पालन किए बिना आगे बढ़ना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकता है।

नागपुर के इस चर्चित प्रकरण में हाईकोर्ट का आदेश इसी कानूनी सिद्धांत को रेखांकित करता है। तपन जायसवाल को राहत देते हुए अदालत ने संबंधित आपराधिक कार्यवाही समाप्त कर दी और यह स्पष्ट किया कि कानून की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मामला चलाना उचित नहीं है।

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