Published On : Sat, Mar 30th, 2019

डमी कैडिंडेट देने की तोहमत, झेल रही है राकांपा

गोंदिया: राजनीति के मंझे हुए धुरंधरों के बिना ही गोंदिया-भंडारा संसदीय क्षेत्र का लोकसभा चुनाव इस मर्तबा संपन्न होने जा रहा है। जो 14 उम्मीदवार मैदान में डटे है, उनमें 11 भंडारा जिले के निवासी है तथा महज 3 निर्दलीय गोंदिया जिले से तालुख रखते है।

दोनों जिलों की पब्लिक को उम्मीद थी कि, प्रफुल पटेल चुनावी मैदान में ताल ठोकेंगे लेकिन हॉ- ना करते-करते एैसा हो न सका?
जिन 3 प्रमुख पार्टियों के बीच त्रिकोणीय मुकाबला होने की संभावना दिखायी दे रही है, हमने लोकसभा क्षेत्र का दौरा कर इन दलों के कार्यकर्ताओं का ही मन टटोला। गोंदिया-भंडारा के कांग्रेस-राकांपा कार्यकर्ताओं का मानना है कि, नाना पंचबुद्धे के बजाय प्रफुल पटेल खुद चुनाव लड़ते तो बेहतर परिणाम की उम्मीद थी।

65 वर्षीय उम्रदराज अस्वस्थ्य नाना पंचबुद्धे आज के वक्त में चुनावी रैली और प्रचार सभाओं के लिए दौड़-भाग नहीं कर सकते? क्योंकि उनकी सेहत यह गंवारा नहीं करती? पार्टी के नेता द्वारा उसके नाम पर मुहर लगाने से लोगों में यह भ्रम की स्थिती बनी हुई है कि, कहीं न कहीं यह भाजपा से अंदरूनी सांठगांठ तो नहीं? क्योंकि पहले गुजरात के विधानसभा चुनाव में उन्होंने भाजपाईयों की मदद की है इसलिए वहां 17 सीटों पर कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा और कांग्रेस गुजरात में सरकार बनाने के जादूई आंकड़े से पिछड़ गई

इसलिए जो राजनीति में रूची रखते है, वे बुद्धिजीवी भी यहीं कहते है कि, अगर प्रफुल पटेल इस बार लोकसभा का चुनाव हार जाते तो उनकी राष्ट्रवादी में नंबर टू की पोजिशन पर असर पड़ता और उनकी कद्दावर नेता की कुर्सी पर खतरा मंढराता? वो छबि पार्टी के अंदर बरकरार रहे इसलिए उन्होंने खुद चुनाव लड़ने से इंकार करते हुए अस्वस्थ्य प्यादे को चुनाव मैदान में उतारा है? लिहाजा कांग्रेस और राष्ट्रवादी के कार्यकर्ता उस उत्साह के साथ पब्लिक में जा नहीं पा रहे है जिससे चुनावी रण जीतने में ओर भी मुश्किलें आ रही है। आने वाले समय में अगर बड़े नेताओं की सभाएं लगी तो ही कार्यकर्ताओं में उर्जा का संचार होगा?

 

 

 

 

 

 

रवि आर्य