Published On : Sat, May 26th, 2018

मोदी सरकार के 4 साल के राजपाठ के सिरमौर हैं ‘नितिन गडकरी’

Nitin Gadkari
नागपुर: मोदी सरकार के चार साल पूरे हो चुके हैं. इस ख़ुशी के मौक़े पर बहुत ज्यादा तो नहीं लेकिन वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में 14 रुपए इंधन की दरों में इजाफा देखने मिल रहा है. ये दरें रोज देश के नागरिकों को चौंका रही हैं. नागपुर में तो पेट्रोल के दाम 85.71 रुपए जा पहुंचे हैं. जैसा कि हम पहले ही बता चुके हैं, चलिए ईंधन के बढ़ते दाम के दौर में अतिरिक्त दर वसूलने की मजबूरी विकास की विभिन्न परियोजनाओं को पूरा करने में लग रहे हैं.

मोदी सरकार का चार साल का रिपोर्ट कार्ड
किसी स्टुडेंट का रिपोर्ट कार्ड इसलिए बनाया जाता है ताकि उसे यह बताया जा सके कि पहले के मुकाबले वह कहां पहुँचा है, ताकि भविष्य में वह और बेहतर प्रदर्शन कर सके. लेकिन कोई व्यक्ति, संस्था या फिर सरकार अगर अपना रिपोर्ट कार्ड ख़ुद बनाकर अपनी उपलब्धियाँ गिनाने लगे, तो समझिये वह फिर चुनाव में अपने प्रति वोटरों को रिझाकर दोबारा निर्वाचित होना चाह रही है. ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि उनकी उपलब्धियों का अांकन किया जा सके. तो पहले सरकार के दावेवाली बड़ी उपलब्धियों को जाना जाए.

लेकिन यहां विरोधाभास इसलिए भी पैदा हो रहा है क्योंकि विभिन्न अख़बारों में विज्ञापन के मार्फ़त उपलब्धियों के जो दावे किए जा रहे हैं, विरोधी उन्हें असफलता करार दे रहे हैं.

इनमें से कुछ हैं :
मसलन नोट बंदी. जिस नोटबंदी को सरकार कालेधन का लड़ाई के लिए जरूरी क़दम बताती रही वह असंगठित क्षेत्रों जैसे कृषि, टेक्सटाइल इंडस्ट्रीज़ और कुटीर उद्योगों पर बुरा असर छोड़ा. इसी तरह जीएसटी ने संघर्षरत औद्योगिक जगत का अंतिम संस्कार कर डाला.

युवा शक्ति का विघटन
देश के कई अर्थशास्त्रियों ने राष्ट्र के युवाओं के बीच बढ़ती बेरोज़गारी के मुद्दों पर गहरी चिंता जताई है. चुनाव पूर्व दावा किया गया था कि हर साल तकरीबन 2 करोड़ रोज़गार पैदा किए जाएंगे. इस लिहाज़ से चार साल में तकरीबन 8 करोड़ रोज़गार, लेकिन हक़ीक़त में 80 भी रोज़गार इस दौरान नहीं सृजित किए जा सके हैं. इसमें भी इ चार सालों में कितनों के रोज़गार खत्म हुए इसके आँकड़े खुलकर कभी नहीं गिनाए गए.

भ्रष्टाचार निर्मूलन
मोदी सरकार भ्रष्टाचार खात्में के बड़े वादे के साथ आई थी, लेकिन इसके दौर में ही बैंकों में एक के बाद एक उजागर हुए घोटालों ने दावों की पोल खोल कर रख दी.

ढाँचागत विकास का दावा
हां, सरकार द्वारा तेज विकास की गति को बनाए रखने का एक मात्र वादा लगातार सही साबित हो रहा है. ढाँचागत विकास के वेदों को पूरा करनेवाले कोई और नहीं बल्कि नागपुर ओके ही केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गड़करी हैं. चार साल पहले जब उन्हें यह मंत्रालय दिया गया था तब चर्चा यह थी कि उनके पार्टी और संघ ते भीतर कद को देखते हुए यह पद छोटा है. जबकि भाजपा पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह को गृह और पेशे से वक़ील वह भी लोक सभा चुनाव सीधे न लड़नेवाले अरुण जेटली को फ़ायनांस मंत्री बनाया गया. यहां तक की अपनी सीट गँवानेवाली स्मृति ईरानी तक को मानव संसाधन जैसे विभाग दिए गए. और गड़करी को रोड, पुल और पोर्ट बनाने जैसा अपमानजनक जिम्मेदारी थमा दी गई. लेकिन इस शख़्स ने दिन रात मेहनत कर ऐसा विकास मॉडल पेश किया कि देश के हर अख़बार और चैनलों में छा गए.

देखिए नागपुर टुडे द्वारा २०१६ में प्रकाशित लेख: Nagpur Man of the Year 2016 – Nitin Gadkari without doubt

गडकरी ने 3-4 किलोमीटर प्रति दिन की दर से बनाई जानेवाली सड्कों को 27 किलो मीटर प्रति दिन की ऊँचाइयों तक पहुंचाया. अब लक्ष्य 80 किलोमीटर प्रति दिन की दर पाने का रखा है. सीधे बताए तो 27 किलो मीटर प्रति दिन का मतलब है कि बैंगलुरु से चेन्नई जितनी दूरी की सड़क को इन्होंने मात्र 10 दिन में पूरा कर दिखाया.

यही नहीं इन्होंने बंदरगाहों का आधुनिकीकरण कर उन्हें दोबारा लाभदायी बनाया. इसी तरह सी प्लेन को नदियों में उतारने से लेकर गंगा सफ़ाई अभियान तक को उन्होंने सफलता पूर्वत निभा रहे हैं.

ऐसे में अब आश्चर्य नहीं कि मोदी सरकार में अच्छे काम का प्रदर्शन कर वे नंबर वन स्थिति में पहुंच गए हैं.

यही वजह है कि वे पहले ऐसे मंत्री के रूप में देखे जा रहे है जिनका रिपोर्ट कार्ड पहली श्रेणी का हो चुका है. उन्हें 70 प्रतिशत अंक एक सर्वे में दिए गए. जबकि सरकार के दूसरे मंत्रियों को 50 प्रतिशत न अधिक मिले हैं. याने गडकरी पहले स्थान पर चल रहे हैं. ऐसे में यह कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं कि मोदी सरकार के चार साल के राजपाठ में सिरमौर के रूप में दिखाई दे रहे हैं.

जैसा कि वे तीन भाषाओं में टीवी चैनलों को इंटरव्यू देते अकसर दिखाई देते हैं. मराठी समाचार चैनल टीवी9 को दिए एक इंटरव्यू के आख़री सवाल जिसमें महाराष्ट्र में उनकी वापसी को लेकर पूछा गया था, के जवाह में में वे कहते हैं कि वे दिल्ली में रहना पसंद कर रहे हैं. इसका क्या अंदाज़ा लगाया जाए, कि वे विदर्भ के गठन को लेकर फिर सक्रीय हो सकते हैं, जैसा कि हमेशा वे इसके लिए प्रयासरत रहे हैं. ऐसे में कोई संदेह नहीं कि आनेवाले समय में वे विदर्भ के सीएम के रूप मेॉ वापसी करें. उनके राजनीतिक कैरियर का इससे अच्छा अंत नहीं हो सकता कि वे कैपिटन के रूप में रहे चाहे फिर वह नागपुर हो या फिर दिल्ली .