
नागपुर – बिना किसी न्यूनतम कार्यकाल की शर्त के महाराष्ट्र के पूर्व विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को प्रतिमाह ₹50 हजार आजीवन पेंशन दिए जाने की व्यवस्था को बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में चुनौती दी गई है। अदालत ने इस जनहित याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास की खंडपीठ ने 23 सितंबर को मामले में आदेश जारी किया।
याचिकाकर्ता चारुदत्त विनायक सहजे ने महाराष्ट्र विधानमंडल पेंशन अधिनियम, 1976 की धारा 3(1) को असंवैधानिक बताते हुए इसे रद्द करने अथवा इसमें आवश्यक संशोधन करने की मांग की है।
शपथ लेते ही पेंशन का अधिकार
याचिका में दावा किया गया है कि मौजूदा व्यवस्था के तहत कोई व्यक्ति विधायक या विधान परिषद सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद पेंशन का हकदार हो जाता है। इसके लिए किसी न्यूनतम सेवा अवधि या सदस्य द्वारा पेंशन के लिए अंशदान की अनिवार्यता नहीं है।
याचिकाकर्ता ने इसी व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि एक दिन विधायक रहने वाला व्यक्ति और पांच वर्ष का पूरा कार्यकाल पूरा करने वाला सदस्य—दोनों को शुरुआती तौर पर समान ₹50 हजार मासिक पेंशन मिलती है।
पांच साल बाद हर साल ₹2 हजार अतिरिक्त
मौजूदा प्रावधान के अनुसार पांच वर्ष से अधिक की सेवा होने पर प्रत्येक अतिरिक्त वर्ष के लिए ₹2 हजार प्रतिमाह अतिरिक्त पेंशन का प्रावधान है। याचिका में इस व्यवस्था को कानून की आंतरिक विसंगति बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार के संदर्भ में चुनौती दी गई है।
सेवा अवधि के आधार पर तय हो पेंशन
याचिकाकर्ता ने सरकारी कर्मचारियों की पेंशन व्यवस्था का हवाला देते हुए कहा है कि वर्ष 2005 के बाद नियुक्त कर्मचारियों के लिए अंशदायी पेंशन व्यवस्था लागू की गई है। इसके विपरीत पूर्व विधायकों के लिए बिना न्यूनतम सेवा अवधि और बिना अंशदान के पेंशन का प्रावधान है।
याचिका में हाईकोर्ट से मांग की गई है कि धारा 3(1) को रद्द किया जाए अथवा उसमें संशोधन कर न्यूनतम सेवा अवधि निर्धारित की जाए और पेंशन को सदस्य के वास्तविक कार्यकाल के अनुपात में तय किया जाए।
दोषसिद्धि पर पेंशन रोकने की भी मांग
जनहित याचिका में गंभीर अपराध या कदाचार के मामले में दोषसिद्धि होने पर पूर्व विधायक अथवा विधान परिषद सदस्य की पेंशन रोकने का प्रावधान करने की मांग भी की गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से एड. तुषार मंडलेकर ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से एड. कल्याणी मारपकवार ने पक्ष रखा।
हर साल ₹82.98 करोड़ का खर्च
याचिका में आरटीआई से प्राप्त जानकारी का भी हवाला दिया गया है। इसके अनुसार राज्य सरकार पूर्व विधायकों, विधान परिषद सदस्यों और उनके परिवारों को मिलने वाली पेंशन पर हर साल करीब ₹82.98 करोड़ खर्च कर रही है।
आरटीआई में 19 मई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार राज्य में 630 पूर्व विधायक, 144 पूर्व विधान परिषद सदस्य और 596 परिवार पेंशनधारक होने की जानकारी सामने आई है।




