
नागपुर। एनआईटी की तीन महिला अधिकारियों के साथ कथित तौर पर अभद्र व्यवहार और सरकारी कामकाज में बाधा डालने के मामले में सामाजिक कार्यकर्ता सुनील मेश्राम को जिला एवं सत्र न्यायालय-3 के न्यायाधीश आर.एम. मिश्रा ने अग्रिम जमानत मंजूर कर दी है। अदालत ने मेश्राम को जांच में सहयोग करने तथा प्रत्येक मंगलवार दोपहर 1 से 4 बजे के बीच जांच एजेंसी के समक्ष उपस्थित रहने का निर्देश दिया है।
मामले के अनुसार, एनआईटी की एक महिला अधिकारी ने सदर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 21 अगस्त 2026 को सुनील मेश्राम अपने परिचित प्रॉपर्टी ब्रोकर नीरज दहिवाले के साथ एनआईटी कार्यालय पहुंचे थे। यहां एक प्लॉट के आरएल (RL) से संबंधित जानकारी को लेकर एक महिला अधिकारी से पूछताछ की गई। संबंधित अधिकारी ने उन्हें बताया कि वह इस मामले से संबंधित नहीं हैं।
शिकायत के अनुसार, इसके बाद दोनों आरोपी एक अन्य महिला अधिकारी की कुर्सी के पीछे पहुंचे। आरोप है कि सुनील मेश्राम ने कुर्सी पर हाथ रखा। महिला अधिकारी द्वारा वहां से हटने के लिए कहने पर कथित तौर पर उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखा और उसके सुंदर दिखने संबंधी टिप्पणी की। शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपियों के व्यवहार से महिला अधिकारियों को परेशानी हुई और उनके सरकारी कामकाज में भी बाधा उत्पन्न की गई।
इन आरोपों के आधार पर सदर पुलिस ने अपराध क्रमांक 430/2026 दर्ज किया। मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74, 75(2), 79, 221 और 352 के तहत कार्रवाई की गई।
बचाव पक्ष ने बताया झूठा और बदले की कार्रवाई
सुनील मेश्राम की ओर से अधिवक्ता कमल सतूजा, कैलाश डोडानी और अमोल लिंगायत ने अग्रिम जमानत के लिए अदालत में पक्ष रखा। बचाव पक्ष ने आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि कथित घटना 21 अगस्त को होने के बावजूद शिकायत 25 अगस्त को दर्ज कराई गई, यानी चार दिन की देरी हुई। अधिवक्ताओं ने इसे शिकायत की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने वाला तथ्य बताया।
बचाव पक्ष ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि मेश्राम ने इससे पहले एनआईटी की संबंधित महिला अधिकारी और एनआईटी के कार्यकारी अभियंता अनिल राठौर के खिलाफ विभिन्न शिकायतें एनआईटी अध्यक्ष, पुलिस आयुक्त, डीसीपी और पालकमंत्री के समक्ष की थीं। इन शिकायतों में कथित तौर पर प्लॉट के आरएल जारी करने के नाम पर आम नागरिकों से बड़ी रकम लिए जाने जैसे आरोप लगाए गए थे।
अधिवक्ताओं के अनुसार, ये शिकायतें वर्तमान एफआईआर से पहले की हैं और इसी कारण वर्तमान प्रकरण को मेश्राम की पूर्व शिकायतों के जवाब में की गई कार्रवाई बताया गया।
CCTV फुटेज का भी दिया हवाला
बचाव पक्ष ने अदालत को यह भी बताया कि कथित घटना के दिन नीरज दहिवाले के एनआईटी परिसर में प्रवेश करने का रिकॉर्ड CCTV फुटेज में नहीं दिखाई देता। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि इससे शिकायत में लगाए गए आरोपों पर सवाल उठते हैं और मेश्राम को मामले में गलत तरीके से फंसाया गया है।
अधिवक्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि मामले में लगाए गए आरोपों के आधार पर संबंधित धाराएं प्रथमदृष्टया लागू नहीं होतीं तथा इस संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला दिया गया। उन्होंने कहा कि मेश्राम जांच में पहले ही सहयोग कर चुके हैं, इसलिए उनकी हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।
अभियोजन और शिकायतकर्ता पक्ष ने किया विरोध
महिला अधिकारी की ओर से अधिवक्ता सुमित बोधलकर तथा सरकारी पक्ष की ओर से एपीपी वर्षा आगलावे ने अग्रिम जमानत का विरोध किया। उन्होंने अदालत के समक्ष कहा कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और मामले की जांच अभी प्रारंभिक चरण में है। उनका तर्क था कि आरोपी जमानत पर बाहर रहने की स्थिति में साक्ष्यों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अग्रिम जमानत आवेदन खारिज करने की मांग की गई।
कोर्ट ने शर्तों के साथ दी राहत
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जिला एवं सत्र न्यायाधीश क्रमांक-3 आर.एम. मिश्रा ने सामाजिक कार्यकर्ता सुनील मेश्राम को अग्रिम जमानत मंजूर कर दी। अदालत ने शर्त रखी कि मेश्राम प्रत्येक मंगलवार दोपहर 1 बजे से शाम 4 बजे तक जांच एजेंसी के समक्ष उपस्थित होकर जांच में सहयोग करेंगे।
मेश्राम की ओर से अधिवक्ता कमल सतूजा, कैलाश डोडानी और अमोल लिंगायत ने पैरवी की।




